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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३९
प्रशस्तपादभाष्यम्
योगिनां च बहिरुद्वेचितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं प्रत्यागमनं च,
तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं कर्मादृष्टकारितम्।
एवमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण-
होता है । इस शरीर के साथ मन के संयोग को उत्पन्न करनेवाली मन
की क्रिया का नाम 'अपसर्पण' क्रिया है ।
एवं बाहर (विषय ग्रहण के लिए) निकला हुआ योगियों का मन
जो उनके अभिप्रेत देश में ही जाता है और वहीं से लौट आता है, मन
की वह क्रिया अदृष्ट से उत्पन्न होती है । इसी प्रकार सृष्टि के आदि में
शरीर के साथ मन का संयोग जिस क्रिया से होता है, उसका कारण
न्यायकन्दली
शरीरं परिकल्प्यते । तच्च मृतशरीरमतिक्रम्य मनसः स्वर्गनरकादिदेशातिवाहनधर्म-
कत्यादातिवाहिकमित्युच्यते । मरणजन्मनोरन्तराले मनसः कर्म शरीरोपगृहीतस्यैवोपपद्यते,
महाप्रलयानन्तरावस्थाभाविनमनःकर्मव्यतिरिक्तत्वे सति मनःकर्मत्वाद् दृश्यमानशरीरवृत्ति-
मनःकर्मवत् । आगमश्चात्र संवादको दृश्यत इति । तत्संयोगार्थं च कर्मोपसर्पणमिति । तेन
स्वर्गे नरके वा प्रत्यग्रजातेन शरीरेण मनःसंयोगार्थं कर्मोपसर्पणमिति ।
छोड़कर और किसी भी समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया की उत्पत्ति नहीं
होती है । अतः स्थूल मृत शरीर के ही समीप में एक अतिसूक्ष्म, उपलब्धि के
सर्वथा अयोग्य, आतिवाहिक शरीर की कल्पना करते हैं, जिसकी उत्पत्ति
सक्रिय परमाणुओं के द्वारा द्व्यणुकादि क्रम से होती है । उन परमाणुओं में क्रिया
की उत्पत्ति अदृष्ट से होती है । उस सूक्ष्म शरीर का 'आतिवाहिक शरीर' यह
अन्वर्थ नाम इसलिए है कि मन को इस मृतशरीर से छुड़ाकर स्वर्गादि देशों तक
'अतिवहन' कर ले जाता है । इस वस्तुस्थिति के उपयुक्त यह अनुमान है कि
शरीर से सम्बद्ध मन में ही वर्त्तमान में क्रिया देखी जाती है (महाप्रलयरूप एक ही
ऐसा समय है, जिस समय शरीर से असम्बद्ध मन में क्रिया रहती है), अतः
अनुमान करते हैं कि मृत्यु के बाद और पुनः जन्म लेने से पहले इस बीच मन में
जो क्रिया उत्पन्न होती है, उस समय भी मन का किसी शरीर के साथ सम्बन्ध
अवश्य रहता है; क्योंकि मन की यह क्रिया भी महाप्रलयकालिक क्रिया से भिन्न
मन की ही क्रिया है । इस सिद्धान्त को शास्त्ररूप शब्दप्रमाण का समर्थन भी प्राप्त
है । "तत्संयोगार्थञ्च कर्मोपसर्पणमिति" सद्यः उत्पन्न उस स्वर्गीय या नारकीय शरीर
के साथ सम्बन्ध के लिए ही मन में 'उपसर्पण' नाम की क्रिया उत्पन्न होती है ।

७४०) न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मुपकारापकारसमर्थं च भवति तदप्यदृष्टकारितम्, यथा सर्गादावणुकर्म, अग्नि
वाय्वोरूर्ध्वतिर्यग्गमने महाभूतानां प्रक्षोभणम् । अभिषिक्तानां मणीनां तस्करं
प्रतिगमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं चेति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये कर्मपदार्थः समाप्तः ॥
भी अदृष्ट ही है । इसी प्रकार जीवों के उपकार या अपकार
करनेवाली महाभूतों की जिन क्रियाओं के कारणों का बोध प्रत्यक्ष या
अनुमान से नहीं होता है, वे सभी क्रियायें अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं ।
जैसे कि सृष्टि के आदि में परमाणुओं की क्रियायें एवं अग्नि और वायु
की ऊर्ध्वतिर्यग्गतिरूप क्रियायें, भूगोलकों की चलन क्रियायें एवं
अभिमन्त्रित मणि जो चोर की ओर जाती है, या सामान्य लोह चुम्बक
की ओर जो जाता है, ये सभी क्रियायें भी अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं ।
॥ प्रशस्तपादभाष्य में कर्मपदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य बहिर्निःसारितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं
प्रत्यागमनं च । तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं मनःकर्मा-
दृष्टकारितम् । न केवलमेतावत् सर्वमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानु-
मानाभ्यामनुपलभ्यमानकारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्, यथा
सर्गादावणुकर्म, अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने, महाभूतानां भूगोलकादीनां
'योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य' अर्थात् योगी लोग जब अपने मन को पुनः
अपने शरीर में लौट आने के लिए अभिप्रेत देश में जाने के लिए भेजते हैं,
(उस समय) उनके मन की क्रियायें अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं । मन की केवल वे
ही क्रियायें नहीं, "अन्यदपि महाभूतेषु यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण-
मुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्" (अर्थात् पृथिव्यादि महाभूतों की
ही) अन्य उन क्रियाओं की उत्पत्ति भी अदृष्ट से ही माननी पड़ेगी, जिनके
कारणों की उपलब्धि प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा नहीं होती है एवं जिनसे
जिस किसी का कुछ उपकार या अपकार होता है । "यथा सर्गादावणुकर्म,
अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने" जैसे सृष्टि के प्रथम क्षण की परमाणु की
क्रिया एवं अग्नि की ऊपर की ओर जलने की क्रिया अथवा वायु की
टेढ़े-मेढ़े चलने की क्रिया (अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं) । 'महाभूतानाम्' अर्थात्
भूगोल प्रभृति का 'प्रक्षोभण' अर्थात् चलन, चोरों की परीक्षा के समय 'अभि-
षिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्' अर्थात् उपयुक्त मन्त्र से अभिषिक्त

अथ सामान्यपदार्थनिरूपणम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
सामान्यं द्विविधम्-परमपरं च। स्वविषयसर्वगत-
'पर' और 'अपर' भेद से सामान्य दो प्रकार का है । वह अपने
विषयों (आश्रयों) में रहता है । वह अभिन्न स्वभाव का है । एक, दो
या बहुत सी वस्तुओं में एक आकार की बुद्धि का कारण है अपने एक
न्यायकन्दली
च प्रक्षोभणं चलनम्, परीक्षाकालेऽभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्,
अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं च सर्वमेतददृष्टकारितमिति ।
हिताहितफलोपायप्राप्तित्यागनिबन्धनम् ।
कर्मेति परमं तत्त्वं यत्नतः क्रियतां हृदि ॥
॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां कर्मपदार्थः समाप्तः ॥
मणियों का चोर की ओर जाना एवं "अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणम्" अर्थात् साधारण
लौह का चुम्बक की ओर जाना, ये भी सभी क्रियायें अदृष्ट से होती हैं ।
सुख और उसके उपाय की प्राप्ति एवं दुःख और उसके उपाय का परिहार,
ये दोनों ही क्रिया से होते हैं, अतः इस क्रियातत्त्व को यल से हृदय में धारण
करना चाहिए ।
॥ भट्ट श्री श्रीधर की रची हुई पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का
कर्मनिरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
जयन्ति जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहति-हेतवः ।
विश्वस्य परमात्मानो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥
सामान्यं व्याचष्टे-द्विविधं सामान्यं परमपरं चेति । कृतव्याख्यान-
मेतदुद्देशावसरे । सर्वसर्वगतं सामान्यमिति केचित् । तन्निषेधार्थमाह-
स्वविषयसर्वगतमिति । यत् सामान्यं यत्र पिण्डे प्रतीयते स तस्य स्वो विषयः ,
जगत् की उत्पत्ति के हेतु ब्रह्मा एवं स्थिति के हेतु विष्णु और संहार के हेतु
महेश्वर, विश्व के परमात्मस्वरूप इन तीनों की जय हो ।
'द्विविधं सामान्यं परमपरञ्च' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सामान्य का निरूपण- करते
हैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या पदार्थोद्देश प्रकरण में (पृ. २९ पं. ११) कर चुके हैं ।
किसी सम्प्रदाय का मत है कि 'सभी सामान्य सभी वस्तुओं में रहते हैं' इस मत के
खण्डन के लिए ही 'स्वविषयसर्वगतम्' यह वाक्य लिखा गया है । जिस सामान्य की

७४२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मभिन्नात्मकमनेकवृत्ति एकाद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारि स्वरूपाभेदे-
नाधारेषु प्रबन्धेन वर्तमानमनुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । कथम् ?
प्रतिपिण्डं सामान्यापेक्षं प्रबन्धेन ज्ञानोत्पत्तावभ्यासप्रत्यय-
ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में बराबर (बिना विराम के) रहता हुआ
'अनुवृत्तिप्रत्यय' का, अर्थात् अपने आश्रयरूप विभिन्न व्यक्तियों में एक
न्यायकन्दली
तत्र सर्वस्मिन् गतं समवेतम्, सर्वत्र तत्प्रत्ययात् । सर्वसर्वगतत्वाभावे त्वनुपलब्धिरेव
प्रमाणम् । अभिन्नात्मकम्, अभिन्नस्वभावम् । येन स्वभावेनैकत्र पिण्डे वर्तते सामान्यं
तेनैव स्वभावेन पिण्डान्तरेऽपि वर्तते, तत्प्रत्ययाविशेषादित्यर्थः । अनेकेषु पिण्डेषु
वृत्तिर्यस्य तदनेकवृत्ति । अभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तत इति च प्रतीतिसामर्थ्यात् समर्थनीयम् ।
न हि प्रमाणावगतेऽर्थे काचिदनुपपत्तिर्नाम । द्वित्वादिकमप्यभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तते,
तस्मात् सामान्यस्य विशेषो न लभ्यते तत्राह-एकद्विबहुष्विति । सामान्यमेकस्मिन्
पिण्डे द्वयोः पिण्डयोर्बहुषु वा पिण्डेष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययं करोति । एकस्य
पिण्डस्य द्वयोर्बहूनां वोपलम्भे सति गौरिति प्रत्ययस्य भावात्, द्वित्वादिकं त्वेवं न
प्रतीति जिस आश्रय में हो, वही उसका 'स्वविषय' है । वह सभी विषयों में
'गत' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहता है; क्योंकि उन सभी विषयों में उस
(सामान्य) की प्रतीति होती है । 'सामान्यं सर्वसर्वगत' (अर्थात् सभी सामान्य सभी
सामान्य के विषयों में) क्यों नहीं हैं ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि सर्वत्र सभी
सामान्यों की प्रतीति नहीं होती है । 'अभिन्नात्मकम्' शब्द का अर्थ है
'अभिन्नस्वभाव', अर्थात् जिस स्वरूप से वह अपने एक आश्रय में रहता है, उसी
स्वरूप से वह अपने और आश्रयों में भी रहता है; क्योंकि एक आश्रय में सामान्य
की प्रतीति में एवं दूसरे आश्रयों में उसी सामान्य की प्रतीति में कोई अन्तर
उपलब्ध नहीं होता । 'अनेकवृत्ति' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है 'अनेकेषु
वृत्तिर्यस्य' अर्थात् अनेक आश्रयों में जो रहे, वही 'अनेकवृत्ति' है । सामान्य
'अभिन्नस्वभाव' का है और 'अनेक आश्रयों में रहता है' इन दोनों बातों का
समर्थन तदनुकूल प्रामाणिक प्रतीतियों से करना चाहिए; क्योंकि प्रमाण के द्वारा
निर्णीत अर्थ में किसी प्रकार की अनुपपत्ति की शङ्का नहीं की जा सकती ।
द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति गुण) भी अनेकवृत्ति हैं और अभिन्न स्वभाव के भी हैं,
अतः द्वित्वादि में सामान्य लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण उन दोनों विशेषणों
से नहीं हो सकता, अतः 'एकद्विबहुषु' इत्यादि वाक्य लिखा गया है । अर्थात्
(द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है कि) 'सामान्य' अपने एक आश्रय में, दो
आश्रयों में अथवा बहुत से आश्रयों में प्रतीत होता है । अभिप्राय यह है कि जिस
प्रकार एक ही गोपिण्ड में 'अयं गौः' इस प्रकार से 'सामान्य' की प्रतीति होती है,