वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१९
प्रशस्तपादभाष्यम्
संयोगद्वयात् तोमरहस्तयोर्युगपदाकर्षणकर्मणी भवतः । प्रसारिते
च हस्ते तदाकर्षणार्थः प्रयत्नो निवर्तते । तदनन्तरं तिर्यगूर्ध्वं
दूरमासन्नं वा क्षिपामीतीच्छा सञ्जायते । तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नस्तम-
पेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः । तस्मात् तोमरे कर्मोत्पन्नं
नोदनापेक्षं तस्मिन् संस्कारमारभते । ततः संस्कारनोदनाभ्यां तावत्
क्रियायें उत्पन्न होती हैं । हाथ को पसार लेने पर आकर्षण का कारण वह
प्रयत्न नष्ट हो जाता है । इसके बाद 'इसको किसी पार्श्व में या ऊपर बहुत
दूर या निकट में ही फेंक दूँ' यह इच्छा उत्पन्न होती है । फिर (इच्छा-
विषयीभूत) उस क्रिया के अनुकूल प्रयत्न उत्पन्न होता है । इसके बाद इस
प्रयत्न के साहाय्य से तोमर और हाथ में नोदन नाम के संयोग की उत्पत्ति
होती है । नोदन नाम के संयोग से तोमर में उत्पन्न क्रिया उस नोदन की
न्यायकन्दली
हस्तेऽप्युत्पतनकर्मेति । अस्मिन् पक्षे हस्तमुसलोत्पतनकर्मणोर्वास्तवमेव यौगपद्यम् ।
पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? पाणिमुक्तेषु द्रव्येषु गमनविधिः गमनप्रकारः कथ-
मुच्यत इति प्रश्ने कृते सत्याह-यदा तोमरमिति । युगपदाकर्षणेति, अनाकृष्योत्क्षेप्तुमशक्य-
त्वात् । प्रयत्नो निवर्तत इति तयोर्हस्ततोमरयोराकर्षणप्रयोजनप्रयत्नो निवर्तते, तद्विरोधि-
प्रसारणप्रयत्नोत्पादादित्यर्थः । तदनन्तरमिति । प्रसारणानन्तरम् । तिर्यगूर्ध्वं वा दूरमासन्नं
वा क्षिपामीतीच्छोत्पद्यते । तदनन्तरं तदनुरूपः प्रयत्नः, तिर्यक्क्षेपणेच्छायां तिर्यक्क्षेपणप्रयत्नो
में ही उत्पन्न कर्म वास्तव में एक ही समय उत्पन्न होते हैं (पहले पक्ष की तरह यहाँ
यौगपद्य का शीघ्रतामूलक गौण प्रयोग नहीं है) ।
'पाणिमुक्तेषु गमनविधिः कथम्' हाथ से फेंके हुए द्रव्यों की 'गमनविधि'
गमन की रीति अर्थात् गमनक्रिया की उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? यह
प्रश्न किये जाने पर 'यदा तोमरम्' इत्यादि से समाधान किया गया है ।
'युगपदाकर्षणेति' क्योंकि बिना आकर्षण के फेंकना सम्भव नहीं है । 'प्रयत्नो
निवर्तत इति' अर्थात् हाथ और तोमर इन दोनों के आकर्षणरूप प्रयोजन
का सम्पादन कर प्रयत्न निवृत्त हो जाता है; क्योंकि आकर्षण का विरोधी
और प्रसारण का हेतुभूत प्रयत्न उत्पन्न हो गया रहता है । 'तदनन्तरम्'
अर्थात् प्रसारण के बाद, टेढ़ा करके फेंके या ऊपर की ओर अथवा दूर फेंके
अथवा समीप में फेंके, इस प्रकार की इच्छायें उत्पन्न होती हैं । 'तदनन्तरं
तदनुरूपः प्रयत्नः' इसमें प्रयुक्त 'अनुरूप' शब्द के द्वारा यह अर्थ व्यक्त होता है कि
७२० न्यायकान्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्माणि भवन्ति यावद्धस्ततोमरविभाग इति । ततो विभागाग्नोदने निवृत्ते
संस्कारादूर्ध्वं तिर्यग् दूरमासन्नं वा प्रयत्नानुरूपणि कर्माणि भवन्त्यापतनादिति ।
तथा यन्त्रमुक्तेषु गमनविधिः कथम् ? यो बलवान्
कृतव्यायामो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य दक्षिणेन शरं सन्धाय
सहायता से तोमर में संस्कार को उत्पन्न करती है । इसके बाद संस्कार
और नोदन से तोमर में तब तक क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं, जब
तक हाथ और तोमर का विभाग उत्पन्न नहीं हो जाता । इसके बाद
विभाग से जब नोदन नाम के संयोग का नाश हो जाता है, तब उस
संस्कार (वेग) से पतन के समय तक पार्श्व में, दूर में या समीप में
फेंकी जाने की क्रियायें उत्पन्न होती रहती हैं ।
इसी प्रकार यन्त्र (धनुषादि) के द्वारा फेंकी हुई (शरादि) वस्तुओं
में भी गमन क्रिया की रीति जाननी चाहिए । (प्र.) कैसे ? (उ.)
न्यायकन्दली
जायत इति । ऊर्ध्वक्षेपणेच्छायामूर्ध्वक्षेपणप्रयत्नो जायते । दूरक्षेपणेच्छायां महान् प्रयत्नः,
आसन्नक्षेपणेच्छायां च शिथिलः प्रयत्नो जायत इति तदनुरूपशब्दार्थः । तमपेक्षमाण-
स्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यो नोद्यस्य तोमरस्य नोदकस्य च हस्तस्य सहगमनहेतुत्वात् ।
तस्मान्नोदनाख्याद् यथोक्तादिच्छानुरूपप्रयत्नापेक्षात् तोमरे कर्मोत्पन्नम् । तत् कर्म नोदना-
पेक्षम्, तस्मिन् तोमरे संस्कारमारभते । ततः संस्कारेति । तोमरस्य पतनं यावत्
संस्कारात् तदनुरूपाणि कर्माणि भवन्तीत्यर्थः ।
कृतव्यायामः कृतायुधाभ्यासो वामेन करेण धनुर्विष्टभ्य गाढं गृहीत्वा
दक्षिणेन शरं सन्धाय ज्यायां शरं संयोज्य सशरां ज्यां शरेण सह वर्तमानां
टेढ़ा कर फेंकने की इच्छा के होने पर प्रयत्न भी तदनुकूल ही उत्पन्न होता है ।
एवं ऊपर की ओर फेंकने की इच्छा होने पर ऊपर फेंकने के अनुकूल ही प्रयत्न
भी उत्पन्न होता है । दूर फेंकने की इच्छा होने पर बहुत बड़ा प्रयत्न उत्पन्न होता
है । समीप में फेंकने की इच्छा होने पर शिथिल प्रयत्न उत्पन्न होता है ।
'तमपेक्षमाणस्तोमरहस्तसंयोगो नोदनाख्यः' क्योंकि नोद्य जो तोमर एवं नोदक जो
हाथ, इन दोनों के साथ-साथ ही वह गमन का भी कारण है । 'तस्मात्' अर्थात्
कथित उस नोदन नाम के संयोग के द्वारा उक्त इच्छानुरूप प्रयत्न के साहाय्य से
तोमर में क्रिया की उत्पत्ति होती है । यही क्रिया नोदन संयोग की सहायता से
तोमर में संस्कार (वेग को) उत्पन्न करती है । 'ततः संस्कारेति' अर्थात् जब तक
तोमर का पतन नहीं हो जाता, तब तक वेग से उसमें नोदन के अनुरूप क्रियाओं
की उत्पत्ति होती है ।