वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७०७
प्रशस्तपादभाष्यम्
प्रसङ्गः । न चैवमुत्क्षेपणादिषु प्रत्ययसङ्करो दृष्टः । तस्मादुत्क्षेप-
णादीनामेव जातिभेदात् प्रत्ययानुवृत्तिव्यावृत्ती, निष्क्रमणादीनां
तु कार्यभेदादिति। कथं युगपत् प्रत्ययभेद इति चेत्? अथ मतं यथा
जातिसङ्करो नास्ति, एवमनेककर्मसमावेशोऽपि नास्तीत्येकस्मिन् कर्मणि
युगपद् द्रष्टॄणां भ्रमणपतनप्रवेशनप्रत्ययाः कथं भवन्तीति ? अत्र
ब्रूमः - न, अवयवावयविनोर्दिग्विदिष्टसंयोगविभागानां भेदात् । यो
से होती हैं । (प्र.) एक ही समय (एक ही क्रिया में) उक्त विभिन्न प्रतीतियाँ
कैसे होती हैं ? (विशदार्थ यह है कि) जिस प्रकार (उत्क्षेपणात्यादि जातियों
के मानने में) जातिसङ्कररूप दोष सम्भव नहीं है, (उसी प्रकार) एक ही
समय एक ही वस्तु में (निष्क्रमण, प्रवेशनादि) अनेक कर्मों का रहना भी
सम्भव नहीं है, फिर एक ही समय एक ही द्रव्य में अनेक देखनेवाले
को (भी) भ्रमण, पतन और प्रवेशन विषयक प्रतीतियाँ कैसे हो सकती हैं ?
(उ.) इस प्रश्न के समाधान में हम लोगों का कहना है कि नहीं (अर्थात्
उक्त प्रतीतियाँ असम्भव नहीं हैं); क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही
समय भ्रमणादि की उक्त प्रतीतियाँ नाली में गिरे पत्ते प्रभृति अवयवी और
उनके अवयवों की विभिन्न दिशाओं में उत्पन्न हुए संयोग-विभागादि
कार्यों की विभिन्नता से होती हैं । देखनेवालों में से जो व्यक्ति पार्श्व से
क्रमशः प्रदेश के अवयवों के दिक्प्रदेशों के साथ संयोगों और विभागों को
न्यायकन्दली
किन्तु गमनप्रत्यय एव भवति । तस्माद् गमनमेव, तत्रोपाधिकृतश्च प्रत्ययभेद इत्यभि-
प्रायः ।
उदाहरणान्तरमाह-तथा नालिकायामिति । नालिकेति गर्त्तस्या-
भिधानम् । स्वपक्षे विशेषमाह-न चैवमिति । उपसंहरति-तस्मादिति ।
एकदेकस्मिन् द्रव्ये तावदेकमेव कर्म भवति, तत्र कथं युगपदनेककर्मप्रत्यय
'निष्क्रमण' प्रत्यय और 'प्रवेशन' प्रत्यय प्रभृति विभिन्न प्रत्यय होते हैं । 'तथा
नालिकायाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में दूसरा दृष्टान्त दिखलाया गया
है । 'नालिका' गड्ढे को कहते हैं ।
'न चैवम्' इत्यादि से पूर्वपक्ष की अपेक्षा अपने सिद्धान्तपक्ष में अन्तर दिखलाते
हैं । 'तस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'कथम्' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा यह आक्षेप करते हैं कि यदि एक समय एक द्रव्य में एक ही क्रिया हो
सकती है, तो फिर एक ही समय अनेक कर्मों की प्रतीति कैसे होगी ? 'अथ मतम्'
७०८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
हि द्रष्टा अवयवानां पार्श्वतः पर्यायेण दिक्प्रदेशैः संयोगविभागान् पश्यति तस्य
भ्रमणप्रत्ययो भवति, यो ह्यवयविन ऊर्ध्वप्रदेशैर्विभागमधःसंयोगं चावेक्षते तस्य
पतनप्रत्ययो भवति । यः पुनर्नालिकान्तर्देशे संयोगं बहिर्देशे च विभागं
पश्यति, तस्य प्रवेशनप्रत्ययो भवतीति सिद्धः कार्यभेदान्निष्क्रमणादीनां प्रत्ययभेद
इति । भवत्त्क्षेपणादीनां जातिभेदात् प्रत्ययभेदः, निष्क्रमणादीनां तु कार्य-
भेदादिति ।
देखता है, उसे उनमें भ्रमण की प्रतीति होती है । जो पुरुष अवयवी का
ऊपर के देशों के साथ विभाग और नीचे के प्रदेश के साथ संयोग इन
दोनों को देखता है, उसे उनमें पतन क्रिया की प्रतीति होती है । जो
पुरुष उस अवयवी का नाली के भीतर के प्रदेश के साथ संयोग एवं
ऊपर के देश के साथ विभाग को देखता है, उसे उसी अवयवी में
प्रवेशन की प्रतीति होती है । इस प्रकार कार्यों के भेद से विभिन्न प्रकार
की अनुवृत्ति की प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं । अतः
उत्क्षेपणादि क्रियाओं में उत्क्षेपणत्वादि जातियों की विभिन्नता से ही
विभिन्न प्रकार की अनुवृत्तिप्रतीतियों और व्यावृत्तिप्रतीतियों के होने पर
भी निष्क्रमणादि क्रियाओं में कार्यों की विभिन्नता से ही अनुवृत्ति की
प्रतीतियाँ और व्यावृत्ति की प्रतीतियाँ होती हैं ।
न्यायकन्दली
इत्याह-कथमिति । तद् विवृणोति-अथ मतमित्यादिना । अत्र ब्रूम इति सिद्धान्तोपक्रमः ।
यत् त्योक्तं तन्न, अवयवानामवयविनश्च दिग्देशविशिष्टानां संयोगविभागानां भेदात् ।
अस्य सुगमं विवरणम् । अवयवकर्मसु पार्श्वतः संयोगविभागकारणेषु भ्रमणप्रत्ययः,
अवयविक्रियायां कार्यभेदात् पतनप्रवेशनप्रत्ययावित्यर्थः ।
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी 'आक्षेपग्रन्थ' का विवरण देते हैं । 'अत्र ब्रूमः' इत्यादि
ग्रन्थ से इस प्रसङ्ग में अपना सिद्धान्त कहने का उपक्रम करते हैं । अर्थात् तुमने
जो आक्षेप किया है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि विभिन्न दिग्देशों में विद्यमान
अवयवों और अवयवियों के संयोग और विभाग भी विभिन्न ही होते हैं । इस
भाष्यग्रन्थ की व्याख्या सुलभ है । अभिप्राय यह है कि अवयवों के संयोग और
विभाग इन दोनों की कारणीभूत क्रियायें जब पार्श्व में होती हैं, तो उनमें 'भ्रमण'
का व्यवहार होता है । एवं अवयवी की क्रिया से होनेवाले विभिन्न कार्यों से उसी
में 'पतन-प्रवेशनादि' की प्रतीतियाँ भी होती हैं ।