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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५९७
न्यायकन्दली
द्रव्यादिभेदा द्रव्यगुणकर्माणि, तेषां मध्य एकैकस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा तुल्यजातीयेभ्योऽ-
र्थान्तरभूतेभ्यो विशेष 'उभयथादृष्ट:' । पृथिव्याः स्वसमानजातीयेभ्यो विशेषः पृथिवीत्वं
द्रव्यत्वेन सह दृष्टम् ? रूपस्य विशेषो रूपत्वं गुणत्वेन सह दृष्टम्, उत्क्षेपणस्य विशेष उत्क्षेपणत्वं
कर्मत्वेन सह दृष्टम् । शब्दस्यापि श्रावणत्वं विशेषो गुणत्वेन, तस्मादेतदपि विशेषत्वेन
रूपेण द्रव्यादीनां सामान्यमेव । ततश्चास्य तेन रूपेण संशयहेतुत्वं युक्तम् । यत् पुनर-
साधारणं रूपं न तत् संशयकारणम्, विशेषस्मारकत्वाभावादित्याह-न संशयकारणमिति ।
तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यश्चेति वक्तव्ये सूत्रे सप्तम्यभिधानादेषोऽप्यर्थो गम्यते । शब्दे
श्रावणत्वविशेषदर्शनाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशयः । द्रव्यादिभेदानामेकैकशो विशेषस्य तुल्य-
जातीयेषु सपक्षेष्वर्थान्तरभूतेषु विपक्षेषु दर्शनादिति । किमुक्तं स्यात् ? विशेषो द्रव्ये गुणे
उत्तर दिया है । 'भिद्यन्त इति भेदाः, द्रव्यादय एव भेदा द्रव्यादिभेदाः' इस व्युत्पत्ति
के अनुसार उक्त सूत्र में प्रयुक्त 'द्रव्यादिभेद' शब्द से द्रव्य, गुण और कर्म, ये
तीनों ही अभिप्रेत हैं । उन तीनों में से एक-एक का अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा
कर्म का इनमें से सभी में 'तुल्यजातीयों' से अर्थात् समानजातीयों एवं
'अर्थान्तरभूत वस्तुओं' से अर्थात् भिन्नजातीयों से, दोनों प्रकार की वस्तुओं से
'विशेष' अर्थात् व्यावृत्ति देखी जाती है । दोनों प्रकार से व्यावृत्ति या विशेष का
यह देखा जाना ही सूत्र के 'उभयथादृष्ट' शब्द से अभिप्रेत है । पृथिवी का
'विशेष' है पृथिवीत्व , जो (उसके समानजातीय जलादि द्रव्यों में रहनेवाले) द्रव्यत्व
के साथ ही पृथिवी में है । रूप का 'विशेष' है रूपत्व, जो रूप में गुणत्व के साथ
ही देखा जाता है । एवं उत्क्षेपणरूप क्रिया का विशेष है उत्क्षेपणत्व, जो कर्मत्व के
साथ ही देखा जाता है । इसी तरह शब्दों का श्रावणत्वरूप विशेष भी गुणत्व के
साथ ही रहेगा । अतः यह श्रावणत्वरूप धर्म गन्धवत्त्वादि अन्य सभी विशेषों के समान
होने के कारण 'सामान्य' ही है (साधारण धर्म ही है), 'विशेष' अर्थात् असाधारण
धर्म नहीं, अतः श्रावणत्व शब्द में द्रव्यत्वादि संशय का अवश्य ही कारण है; किन्तु
असाधारण धर्म होने के नाते नहीं; किन्तु साधारण धर्म होने के नाते ही ।
असाधारण धर्म कभी संशय का कारण होता ही नहीं; क्योंकि वह किसी व्यावृत्ति
का (अभाव का) स्मारक नहीं है । यही बात भाष्यकार ने 'न संशयकारणम्' इस
वाक्य से कही है । 'तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु' इत्यादि सूत्र में साधारण रीति से प्राप्त
पञ्चमी विभक्ति से युक्त 'तुल्यजातीयेभ्योऽर्थान्तरभूतेभ्यः' इस प्रकार के पदों का
प्रयोग न कर उक्त सप्तमी विभक्ति से युक्त पदों के प्रयोग से भी यही मालूम होता है
कि शब्द में श्रावणत्वरूप विशेष के ज्ञान से यह संशय होता है कि 'शब्द द्रव्य है ?
अथवा गुण है ? किं वा कर्म है ?' क्योंकि 'द्रव्यादि भेदों' के अर्थात् द्रव्य, गुण और
कर्म में से प्रत्येक के 'विशेष' से अपने आश्रय के तुल्यजातीयों से अर्थात् सपक्षों से और

An accurate line-by-line transcription of the provided page in pure Markdown and Unicode Devanagari:

५९८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने निदर्शन-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणम् । अन्यथा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गात् । तस्मात् सामान्य-
प्रत्ययादेव संशय इति ।
द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण च । तत्रानुमेयसामान्येन
लिङ्गसामान्यानुविधानदर्शनं साधर्म्यनिदर्शनम् । तद्यथा
जाता है । उक्त सूत्र के द्वारा यह नहीं कहा गया है कि विशेष
(असाधारण) धर्म संशय का कारण है । अगर ऐसी बात न हो तो
(शब्द में गुणत्व के संशय की तरह) छः पदार्थों में भी अविराम संशय
की आपत्ति होगी । अतः सामान्य (साधारण) धर्म के ज्ञान से ही संशय
होता है (असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं) ।
साधर्म्य (अन्वय) एवं वैधर्म्य (व्यतिरेक) भेद से निदर्शन (उदाहरण)
भी १. साधर्म्योदाहरण और २. वैधर्म्योदाहरण भेद से दो प्रकार का
है । इनमें अनुमेय (साध्य) सामान्य के साथ लिङ्ग (हेतु) सामान्य
न्यायकन्दली
कर्मणि च दृष्टः । शब्दे च श्रावणत्वं विशेषो दृश्यते, तस्माद्विशेषत्वाद् द्रव्यादिविषयः
संशयः । यदि चासाधारणमपि रूपं संशयकारणम्, तदा षट्स्वपि पदार्थेषु संशयप्रसङ्गः ?
सर्वेषामेव तेषामसाधारणधर्मयोगित्वात्, ततश्च संशयस्याविरामप्रसङ्ग इत्याह - अन्यथेति ।
उपसंहरति-तस्मादिति । साधारणो धर्मो विरुद्धविशेषाभ्यां सह दृष्टसाहचर्यः, तयोः
स्मरणं शक्नोति कारयितुमतस्तद्दर्शनादेव संशयो भवति, नासाधारणधर्मदर्शनादि-
त्युपसंहारार्थः ।
निदर्शनस्वरूपनिरूपणार्थमाह-द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण
चेति । साध्यसाधनयोरनुगमो निदर्श्यते येन वचनेन तद्वचनं साधर्म्य-
विपक्षों से अर्थात् भिन्नजातीयों से, दोनों से व्यावृत्तिबुद्धि का उत्पादन देखा जाता
है । इसका फलितार्थ क्या हुआ ? यही कि द्रव्य, गुण और कर्म तीनों में ही
'विशेष' देखे जाते हैं एवं शब्द में भी श्रावणत्वरूप विशेष देखा जाता है, अतः
संशय होता है कि 'शब्द द्रव्य है ? अथवा गुण है ? कि वा कर्म है ?' अगर
असाधारण धर्म भी संशय का कारण हो तो फिर छः पदार्थों में ही संशय की
आपत्ति होगी; क्योंकि वे सभी असाधारण धर्म से युक्त हैं । जिससे संशय की
अनन्त धारा की आपत्ति होगी । यही बात 'अन्यथा' इत्यादि ग्रन्थ से आचार्य ने
कही है । 'तस्मात्' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । इस उपसंहार ग्रन्थ
का आशय है कि परस्पर विरुद्ध दो विशेष धर्मों के साथ दृष्ट होने के कारण साधारण
धर्म ही उन परस्पर विरुद्ध दोनों धर्मों की स्मृति को उत्पन्न कर सकता है । अतः
साधारण धर्म के ज्ञान से ही संशय होता है, असाधारण धर्म के ज्ञान से नहीं ।
'द्विविधं निदर्शनं साधर्म्येण वैधर्म्येण च' भाष्य का यह वाक्य 'निदर्शन' के
स्वरूप को समझाने के लिए लिखा गया है । 'साध्य और हेतु का एक जगह रहना