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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५९५
प्रशस्तपादभाष्यम्
दृष्टत्वादिति (अ.२, आ. २, सू. ७) नान्यार्थत्वाच्छब्दे विशेषदर्शनात् ।
संशयानुत्पत्तिरित्युक्ते नायं द्रव्यादीनामन्यतमस्य विशेषः स्याच्छ्रावणत्वं
अतः कथित अनध्यवसित हेत्वाभास असाधारण के उक्त लक्षण से युक्त
होने के कारण संशय रूप ज्ञान का ही कारण होगा, अनध्यवसाय रूप
ज्ञान का नहीं; क्योंकि वस्तुओं के विशेष (व्यक्तिगत) धर्म ही उनके
सजातियों और विजातियों की अपेक्षा 'असाधारण' समझे जाते हैं ।
(उ.) यह आक्षेप युक्त नहीं है; क्योंकि उस सूत्र का कुछ दूसरा ही अर्थ है ।
किसी ने आक्षेप किया था कि शब्द में श्रावणत्व (कान से सुनना) रूप उसका
न्यायकन्दली
शब्दस्य रूपादिभ्यः समानजातीयेभ्योऽयं विशेषः ? किं वा विजातीयेभ्यः ? यदि शब्दो
गुणस्तदा रूपादिभ्यः सजातीयेभ्यो विशेषोऽयम्, अथ द्रव्यं कर्म वा ? तदा विजातीयेभ्य
इति शब्दे श्रावणत्वाद् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशय इति पूर्वपक्षवादिना सूत्रविरोधे दर्शिते
सत्याह-नान्यार्थत्वादिति । नायं सूत्रार्थो यदसाधारणो धर्मः संशयहेतुरिति; किन्त्वस्यान्य
एवार्थः । तमेवार्थं दर्शयति-शब्दे विशेषदर्शनादित्यादिना । श्रोत्रग्रहणे योऽर्थः स शब्द
इति प्रतिपाद्य तस्मिन् द्रव्यं गुणः कर्मेति संशय इत्यभिहितं सूत्रकारेण । तस्यायमर्थः-तस्मिन्
में यह वितर्क उपस्थित होता है कि शब्द में क्या उसके सजातीय रूपादि गुणों की
अपेक्षा यह 'श्रावणत्व' रूप विशेष है, अथवा द्रव्यकर्मादि विजातीय पदार्थों की अपेक्षा
यह 'विशेष' है ? शब्द अगर गुण है तो फिर रूपादि उसके सजातियों की अपेक्षा
श्रावणत्व ही उसका विशेष है । शब्द अगर द्रव्य या कर्म है ? तो फिर
विजातीय की अपेक्षा यह श्रावणत्व रूप विशेष शब्द में है । इस रीति से श्रावणत्व
रूप असाधारण धर्म के द्वारा शब्द में 'यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा कर्म हैं' ?
इस प्रकार के संशय की आपत्ति के द्वारा सूत्रविरोध का प्रसङ्ग पूर्वपक्षवादियों के
उठाने पर उसके समाधान के लिए ही भाष्यकार ने 'न, अन्यार्थत्वात्' यह वाक्य
लिखा है । अर्थात् उक्त सूत्र का यह अभिप्राय नहीं है कि 'असाधारण धर्म संशय का
कारण है', उस सूत्र का कोई दूसरा ही अर्थ है । 'शब्दे विशेषदर्शनात्' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा वही दूसरा अर्थ प्रतिपादित हुआ है । 'जो वस्तु श्रवणेन्द्रिय के द्वारा
गृहीत हो वही शब्द है' यह प्रतिपादन करने के बाद सूत्रकार ने कहा कि
(श्रोत्रग्राह्य) उस वस्तु में यह संशय होता है कि 'यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा
कर्म है ?' इस पर पूर्वपक्षवादी ने कहा कि श्रोत्रेन्द्रिय से गृहीत होनेवाले शब्दरूप
अर्थ में जिन संशयों का तुमने उल्लेख किया है उनसे 'श्रोत्रग्राह्यत्व' रूप असाधारण
धर्म में ही उक्त संशयों की कारणता व्यक्त होती है; किन्तु सो ठीक नहीं है; क्योंकि

५१६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
प्रशस्तपादभाष्यम्
किन्तु सामान्यमेव सम्पद्यते, कस्मात् ? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तर्भूतेषु
द्रव्यादिभेदानामैकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वादित्युक्तम्, न संशय-
असाधारण (विशेष) धर्म देखा जाता है, अतः कान से सुने जानेवाले एवं सत्ता
जाति से सम्बद्ध शब्द में 'यह द्रव्य है ? या गुण है ? अथवा कर्म है ?' इस
प्रकार का संशय नहीं होगा । इसी आक्षेप के समाधान में उक्त सूत्र के द्वारा
कहा गया है कि श्रावणत्व द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में से किसी का 'विशेष'
अर्थात् असाधारण धर्म नहीं है। उनका वह साधारण धर्म ही प्रतीत होता
है; क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में से प्रत्येक द्रव्य, प्रत्येक गुण एवं
प्रत्येक कर्म के असाधारण धर्म अपने सजातियों के (अर्थात् अपने में और
अपने सजातियों में समान रूप से रहनेवाले ) सामान्य धर्म के साथ ही देखा
न्यायकन्दली
श्रोत्रग्रहणेऽर्थे संशयः किं द्रव्यं किं वा गुणः किमुत कर्मेति । अत्र परेणोक्तम्-श्रोत्रग्रहणे
शब्दे संशयं वदता त्वया श्रोत्रग्राह्यत्वमेव संशयकारणत्यमुक्तम् । श्रोत्रग्राह्यत्वं च विशेषः,
तस्य दर्शनात् संशयानुपपत्तिः । विरुद्धोभयस्मृतिपूर्वको हि संशयः, स्मृतिश्च नासाधारण-
धर्मदर्शनाद्भवति, तस्य केनचिद्विशेषेण सहानुसम्भवादिति परेणोक्ते सति सूत्रकारेण
प्रतिविहितमेतत्, नायं द्रव्यादीनामन्यतमस्य विशेषः श्रावणत्वम्, द्रव्यगुणकर्मणां
मध्येऽन्यतमस्य द्रव्यस्य गुणस्य कर्मणो वा श्रावणत्वं विशेषो न भवति; किन्तु तेषां
सामान्यमेवेदं सम्पद्यते, कस्मात् ? तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु च द्रव्यादिभेदानामे-
कैकशो विशेषस्योभयथा दृष्टत्वादित्युक्तम् । भिद्यन्त इति भेदाः, द्रव्यादय एव भेदा
श्रोत्रग्राह्यत्व शब्द का 'विशेष' अर्थात् असाधारण धर्म है, अतः उसके ज्ञान से संशय
नहीं हो सकता । चूँकि विरुद्ध दो कोटियों की उपस्थिति स्मृति का कारण है, यह स्मृति
असाधारण धर्म के ज्ञान से सम्भव नहीं है; क्योंकि किसी भी विशेष धर्म के साथ
उसकी उपलब्धि नहीं होती है । पूर्वपक्षवादियों के द्वारा यह आक्षेप किये जाने पर
महर्षि कणाद ने यह समाधान किया है कि जिस श्रावणत्व धर्म का उल्लेख किया
गया है, वह द्रव्यादि में से किसी एक का 'विशेष' नहीं है, अर्थात् द्रव्य या गुण अथवा
कर्म इन तीनों में से श्रावणत्व किसी एक का 'विशेष' नहीं है; किन्तु उन तीनों का वह
सामान्य ही प्रतिपन्न होता है । अपने इस उत्तर क प्रसङ्ग में 'कस्मात्' अर्थात् किस हेतु
से आप यह बात कहते हैं ? यह पूछे जाने पर सूत्रकार ने "तुल्यजातीयेष्वर्थान्तरभूतेषु
द्रव्यादिभेदानामनेकैकशो विशेषस्योभयथादृष्टत्वात्" इत्यादि सूत्र के द्वारा इसका