वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५८९
न्यायकदली
कुतश्चिन्निमित्ताद्विशेषानुपलम्भे सति संशयो भवति । दृष्टं चेति चशब्देन पूर्वमदृष्टमपि
पदार्थं दृष्टवद् दृष्टाभ्यां स्थाणुपुरुषा्तराभ्यां समानं दृष्ट्वा संशय इत्यर्थः ।
सूत्रान्तरं च यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टमित्येकधर्मिविशेषानुस्मरणकृतं संशयं
दर्शयति । पूर्वदृष्टमेव पुरुषं 'यथादृष्टम्' येन येनावस्थाविशेषेण दृष्टं मुण्डं जटिलं वा,
तस्माद्यथादृष्टमन्येनान्येनावस्थाभेदेन दृष्टम्, कालान्तरे दृष्ट्वा, अवस्थाविशेषमपश्यतः
स्मरतश्चैवं तस्यैव प्राक्तनीमवस्थितामुभयीमवस्थां किमयमिदानीं मुण्डः किं वा जटिल
इति संशयः स्यादिति सूत्रार्थः ।
न तु विरुद्धाव्यभिचारी संशयहेतुः, प्रयोगाभावात् । यदि तावदाद्यस्य
हेतोर्यथोक्तलक्षणत्वमवगतं तदा तस्माद्योऽर्थोऽवधारितः स तथैवेति न द्वितीयस्य
प्रयोगः, प्रतिपत्तिबाधितत्वात् । अथायं यथोक्तलक्षणो न भवति, तदानी-
मयमेव दोषो वाच्यः, किं प्रत्यनुमानेन ? विरुद्धं प्रत्यनुमानं न व्यभिचरति,
नातिवर्तत इति विरुद्धाव्यभिचारी प्रथमो हेतुस्तस्यायमेव दोषो यद्विपरीतानु-
रूप असाधारण धर्म को न समझने के कारण संशय उत्पन्न होता है । 'दृष्टञ्च'
इस वाक्य के 'च' शब्द से भी यही अर्थ व्यक्त होता है कि जो पदार्थ (स्थाणु या
पुरुष में) पहले से ज्ञात नहीं है, अगर उसका भी दूसरे स्थाणु वा दूसरे पुरुष की
तरह ज्ञान होता है, तो उस ज्ञान के बाद भी संशय की उत्पत्ति होती है ।
'यथादृष्टमयथादृष्टमुभयथादृष्टम्' इस दूसरे सूत्र के द्वारा वह संशय दिखलाया
गया है कि जिसकी उत्पत्ति एक धर्मी में (अनेक धर्मों की) स्मृति से होती है ।
पहले देखा हुआ पुरुष ही अगर 'यथादृष्ट' हो, अर्थात् जिन-जिन विशेष
अवस्थाओं से-जटी अथवा मुण्डी प्रभृति अवस्थाओं से-युक्त होकर जो पूर्व में
देखा गया हो, वही पुरुष अगर उससे 'अयथादृष्ट' अर्थात् (उन पूर्वदृष्ट
अवस्थाओं से) दूसरी-दूसरी अवस्थाओं से युक्त रूप में दूसरे समय देखा जाता है
एवं (उसकी वर्त्तमान) विशेष प्रकार की अवस्था की उपलब्धि नहीं होती है एवं
पूर्व की जटी और मुण्डी दोनों अवस्थाओं का स्मरण होता है, तो इस स्थिति में
इसी संशय की उत्पत्ति होती है कि यह 'जटाधारी है मुण्डित-मस्तक' ?
('विरुद्धाव्यभिचारी' हेतु में संशय की कारणता सूत्रों से नहीं कही गयी है
इतनी ही नहीं वस्तुतः) विरुद्धाव्यभिचारी हेतु संशय का कारण हो ही
नहीं सकता; क्योंकि उसका प्रयोग ही सम्भव नहीं है । ('मूर्त्तं मनः स्पर्श-
वत्त्वात्', 'अमूर्त्तं मनः क्रियावत्त्वात्' इत्यादि स्थलों में) साध्य के ज्ञापकत्व के
प्रयोजक जितने जिन प्रकार के (सपक्षसत्त्वादि) धर्म हैं- पहले हेतु में उन सबों
का ज्ञान है, तो फिर इस हेतु से जो निश्चित होगा, वह उसी प्रकार का होगा ।
अतः (उस विरुद्ध साध्य के साधन के लिए) दूसरे हेतु का प्रयोग ही नहीं हो
सकेगा; क्योंकि वह प्रथम हेतुजनित प्रथम साध्य की अनुमिति (प्रतिपत्ति) से
बाधित है। ऐसी स्थिति में अगर प्रथम हेतु में साध्य ज्ञान के प्रयोजक (सपक्षसत्त्वादि)
५१० न्यायकन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने हेत्वाभास-
प्रशस्तपादभाष्यम्
स्यान्न तु संशयहेतुत्वम्, न च तयोस्तुल्यबलवत्त्वमस्ति, अन्यतरस्यानुमेयोद्दे-
शस्यागमबाधितत्वादयं तु विरुद्धभेद एव ।
के ज्ञान समान बल के हैं, इससे इतना ही होगा कि दोनों में से कोई
भी निश्चय का उत्पादन न कर सकेगा । इससे (निश्चय की इस
अनुत्पादकता) से उनमें संशय की कारणता नहीं आ सकती । वस्तुतः
मूर्तत्व का साधक क्रियावत्त्व और अमूर्तत्व का साधक स्पर्शवत्त्व ये
दोनों हेतु समान बल के हैं भी नहीं; क्योंकि इन दोनों में से एक
(अस्पर्शवत्त्व) का साध्य (अमूर्तत्त्व) मन में 'तद्भावादणु मनः' (अ.६।
आ.१ । सू.२३) इस वैशेषिक सूत्ररूप आगम से बाधित है । अतः
(जिसे पूर्वपक्षी दूसरे प्रकार का सन्दिग्ध हेत्वाभास कहते हैं) वह विरुद्ध
हेत्वाभास का ही एक प्रभेद है ।
न्यायकन्दली
मानसम्भवः । द्वितीयेन प्रतिपक्षे उपस्थाप्यमाने प्रथमस्य साध्यसाधकत्वाभावादिति चेत् ?
यदि द्वितीयवत् प्रथममप्यनुमानलक्षणोपपन्नम्, न प्रथमस्यासाधकत्वम् । तदसाधकत्वेऽन्यत्रा-
प्यनुमाने क आश्वासः ? वस्तुनो द्वैरूप्याभावादसाधकत्वमिति चेत् ? वस्तु द्विरूपं न
भवतीति केनैतदुक्तम् ? यथा हि प्रमाणमर्थं गमयति, तदेव हि तस्य तत्त्वम् ।
धर्मों का ज्ञान ही नहीं है, तो फिर उस धर्मविहीनता के प्रयोजक हेत्वाभास
का ही उद्भावन करना चाहिए, (उस हेतु को दूषित करने के लिए) प्रथमा-
नुमान (के विरोधी अनुमान) के प्रयोग से क्या प्रयोजन ? (प्र.) 'विरुद्धं
न व्यभिचरति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'विरुद्धव्यभिचारी' शब्द का यह अर्थ
है कि जो हेतु अपने विरोधी अनुमान की उत्पत्ति को न रोक सके, वही
हेतु 'विरुद्धव्यभिचारी' है । तदनुसार पूर्व में प्रयुक्त हेतु ही 'विरुद्धव्यभिचारी'
है । इस हेतु में यही 'दोष' है कि इसके रहते भी दूसरे हेतु से विपरीत अनुमिति
की उत्पत्ति होती है; क्योंकि द्वितीय (प्रति) हेतु के द्वारा जब विरोधी पक्ष
की उपस्थिति हो जाती है, तो अपने साध्य के साधन करने की क्षमता पहले
हेतु से जाती रहती है । (उ.) अगर दूसरे हेतु की तरह पहले हेतु में अनुमान
के उत्पादक (सपक्षसत्त्वादि) सभी लक्षण हैं, तो फिर पहला हेतु अपने साध्य
के साधन में अक्षम ही नहीं है; क्योंकि सपक्षसत्त्वादि रूपी बलों के रहते हुए
भी यदि प्रथम हेतु में साध्य के साधन का सामर्थ्य न माना जाय, तो और
अनुमान प्रमाणों में ही कैसे विश्वास किया जा सकेगा कि वह अपने साध्य
का साधन करेगा ही ? अगर यह कहें कि (प्र.) चूँकि कोई भी वस्तु (विरुद्ध)
दो प्रकार की नहीं हो सकती, अतः एक (पहले) हेतु को असाधक मान लेते
हैं । (उ.) यह किसने कहा कि एक वस्तु (विरुद्ध) दो प्रकार की नहीं हो
सकती ? प्रमाण से जिस प्रकार की वस्तु की सिद्धि होगी, वही प्रकार उस