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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५७३
प्रशस्तपादभाष्यम्
विरोधी, वैशेषिकस्य सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी, न शब्दोऽर्थ-
प्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी ।
वाले यदि 'सत्कार्यम्' इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह स्वशास्त्र-
विरोधी प्रतिज्ञा होगी । यदि कोई इस प्रतिज्ञा वाक्य का प्रयोग करे कि
'शब्दो नार्थप्रत्यायकः', तो यह स्ववचनविरोधी प्रतिज्ञा होगी ।
न्यायकन्दली
ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी । ब्राह्मणेन सुरा पीता पापसाधनं न भवतीति
प्रतिज्ञार्थः । अत्र क्षीरमुदाहरणम्, क्षीरस्य च पापसाधनत्वाभावः श्रुतिस्मृत्यागमैकसम-
धिगम्यः । येनैवागमेन क्षीरपानस्य पापसाधनत्वाभावः प्रतिपादितः, तेनैव सुरापानस्य
पापसाधनत्वं प्रतिपादितमिति ब्राह्मणेन सुरा पेयेति प्रतिज्ञाया दृष्टान्तग्राहकप्रमाणविरोधः ।
वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी । वैशेषिको हि
वैशेषिकशास्त्रप्रामाण्याभ्युपगमेन वादादिषु प्रवर्तते । तस्य 'प्रागुत्पादात् सत् कार्यम्' इति
ब्रुवतः प्रतिज्ञायाः शास्त्रेण विरोधः, वैशेषिकशास्त्रे 'असदुत्पद्यते' इति प्रतिपादनात् ।
शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी । यदि शब्दस्यार्थप्रत्यायकत्वं नास्ति,
तदा 'शब्दो नार्थं प्रतिपादयति' इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनाय शब्दप्रयोगोऽनुपपन्नः ।
'ब्राह्मणेन सुरा पेयेत्यागमविरोधी' । 'ब्राह्मणेन सुरा पेया' इस प्रतिज्ञा वाक्य
का यह अर्थ है कि ब्राह्मण के द्वारा पी गयी सुरा (मद्य) पाप का कारण नहीं
होती । इसका उदाहरण है- (दूध (अर्थात् जिस प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया
दूध पाप का कारण नहीं है, उसी प्रकार ब्राह्मण से पान किया गया मद्य भी पाप
का कारण नहीं है) । 'दूध स्वपान के द्वारा पाप का साधन नहीं है' यह केवल
श्रुति एवं स्मृति रूप 'आगम प्रमाण' से ही समझा जा सकता है । आगम के द्वारा
ही 'दूध का पीना पाप का कारण नहीं है' यह कहा गया है एवं आगम (शब्द)
प्रमाण से ही यह निश्चित है कि 'सुरापान पाप का साधन है'। इस प्रकार 'ब्राह्मण
को सुरापान करना चाहिए' यह प्रतिज्ञा दुग्धपान रूप अपने दृष्टान्त के ज्ञापक
प्रमाण का विरोधी है ।
'वैशेषिकस्यापि प्रागुत्पत्तेः सत्कार्यमिति ब्रुवतः स्वशास्त्रविरोधी' वैशेषिकदर्शन
के अनुयायी वैशेषिकदर्शनरूप शास्त्र को प्रमाण मानकर ही वादादि कथाओं में
प्रवृत्त होते हैं । वे यदि इस प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें कि 'कार्य अपनी उत्पत्ति
के पहले भी विद्यमान ही रहता है' तो उनकी यह प्रतिज्ञा वैशेषिकदर्शनरूप अपने
शास्त्र के ही विरुद्ध होगी; क्योंकि वैशेषिकदर्शन में यह प्रतिपादन किया गया है
कि 'पहले से अविद्यमान कार्य की ही उत्पत्ति होती है' ।
'शब्दो नार्थप्रत्यायक इति स्ववचनविरोधी' शब्द से यदि अर्थ का बोध ही नहीं
होता है, तो फिर 'शब्द अर्थबोध का कारण नहीं है' इस अर्थ को समझाने के

५७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
न्यायकन्दली
अथैतदर्थः शब्दः प्रयुज्यते ? तदभ्युपगतं शब्दस्यार्थप्रतिपादकत्वमिति प्रतिज्ञायाः
स्ववचनविरोधः ।
प्रत्यक्षानावगतवस्तुतत्त्वान्वाख्यानं शास्त्रम् । तद्विरोधः प्रत्यक्षानुमानविरोध एव,
तथा तद्भावभावित्वानुमानसंसमधिगम्यं शब्दस्यार्थप्रत्ययाकत्वं प्रतिषेधयतोऽनुमानविरुद्धैव
प्रतिज्ञा, कस्मात् स्वशास्त्रवचनविरोधयोः पृथगभिधानम् ? अत्रोच्यते-प्रमाणाभासमूलमपि
शास्त्रं भवति शाक्यादीनाम्, अत्र बौद्धस्य 'सर्वमक्षणिकम्' इति प्रतिजानतः
स्वशास्त्रविरोध एव, न प्रमाणविरोधः । स्ववचनम् (अपि) कदाचिदप्रमाणमूलमपि
स्यात्, अतस्तद्विरोधो न प्रमाणविरोधः, किन्तु स्ववचनविरोध एव ।
लिए 'शब्दो नार्थप्रत्यायकः' इस वाक्य का भी प्रयोग करना उचित नहीं होगा ।
यदि उक्त अर्थ को समझाने के लिए उक्त वाक्य का प्रयोग वादी करते हैं, तो
फिर वादी शब्द को अर्थबोध का कारण स्वयं मान ही लेते हैं । इस प्रकार उक्त
प्रतिज्ञा स्ववचन-विरोधी है (क्योंकि वादी अपने अभीष्ट अर्थ को समझाने के लिए
शब्दों का प्रयोग भी करें और शब्द को अर्थप्रत्यायक भी न मानें, ये दोनों बातें
नहीं हो सकतीं) ।
(प्र.) प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा निर्णीत तत्त्व का ही 'अन्वाख्यान' अर्थात्
पश्चात् कथन तो 'शास्त्र' है, अतः शास्त्र का विरोध वस्तुतः प्रत्यक्ष और अनुमान
का ही विरोध है । एवं शब्द में अर्थबोध की कारणता इस अनुमान के द्वारा ही
निश्चित होती है कि "चूँकि शब्दप्रयोग के 'भाव' अर्थात् सत्ता के कारण ही
अर्थबोध की सत्ता देखी जाती है, अतः 'शब्द ही अर्थ का बोधक है' सुतरां शब्द
में अर्थबोध का निषेध करनेवाले पुरुष की 'शब्दो नार्थप्रत्यायकः' यह प्रतिज्ञा भी
वस्तुतः अनुमान के ही विरुद्ध है" । (इस प्रकार स्वशास्त्रविरोध और स्ववचन-
विरोध ये दोनों ही प्रत्यक्षविरोध या अनुमानविरोध में ही अन्तर्भूत हो जाते हैं)
उनका अलग से परिगणन क्यों ? (उ.) इस आक्षेप के उत्तर में हम लोग कहते
हैं कि सभी शास्त्र प्रमाणमूलक ही नहीं होते, ऐसे भी शास्त्र हैं जिनका अनुमोदन
प्रमाण से नहीं किया जा सकता, जैसे कि बौद्धों के आगम हैं । अतः बौद्ध यदि
'सभी वस्तुयें अक्षणिक हैं' इस आशय के प्रतिज्ञावाक्य का प्रयोग करें तो वह
प्रतिज्ञा प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के विरुद्ध नहीं होगी; किन्तु उसमें 'स्वशास्त्र-
विरोध' ही होगा । इसी प्रकार स्ववचन भी कभी-कभी अप्रमाणमूलक होता है,
ऐसे स्थलों की प्रतिज्ञा में प्रमाणविरोध तो होगा नहीं, स्ववचन-विरोध ही होगा
(अतः स्वशास्त्रविरोध और स्ववचनविरोध का अलग से उल्लेख किया गया है) ।