सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५६७
न्यायकन्दली
हेतुः प्रयुज्यते, तस्य सिद्धत्वात्; अपि तु कस्मिंश्चिद्धर्मिणि प्रतिनियते, तस्मिन्नुपन्यस्य-
माने निराश्रयो हेतुर्न प्रवर्तेत । तस्याप्रवृत्तौ न साध्यसिद्धिस्ततः प्रतिज्ञया धर्मिग्राहकं
प्रमाणमुपदर्शयन्त्या हेतोराश्रयो धर्मी सन्निधाप्यते, इत्याश्रयोपदर्शनद्वारेण हेतुं प्रवर्तयन्ती
प्रतिज्ञा साध्यसिद्धेरङ्गम् । तथा च न्यायभाष्यम्-"असत्यां प्रतिज्ञायामनाश्रया हेत्वादयो न
प्रवर्तेरन्" इति । उपनयादेव हेतोराश्रयः प्रतीयेत इति चेत्, न, असति प्रतिज्ञावचने
तस्याप्यप्रवृत्तेः । उपनयः साधनस्य पक्षधर्मतालक्षणं सामर्थ्यमुपदर्शयति । न प्रत्येतुः प्रथम-
मेव साधनं प्रत्याकाङ्क्षा, किन्तु साध्ये, तस्य प्रधानत्वात् । आकाङ्क्षिते साध्ये
अर्थात् प्रतिपादन के लिए ही प्रतिज्ञा वाक्य का उपयोग है । अभिप्राय यह है कि जिस
किसी आश्रय में साध्य के साधन के लिए हेतु का प्रयोग नहीं होता; क्योंकि
सामान्यतः किसी स्थान में साध्य तो सिद्ध है ही, अतः किसी विशेष
धर्मी में साध्यसिद्धि के लिए ही हेतु का प्रयोग होता है । (जहाँ पहले से साध्य सिद्ध
नहीं है और वहाँ साध्य का साधन इष्ट है) वह (विशेष प्रकार का धर्मी )
यदि प्रतिपादित न हो तो फिर बिना आश्रय (विषय) के होने के कारण हेतु की
प्रवृत्ति ही नहीं होगी । हेतु की प्रवृत्ति के बिना साध्य की सिद्धि भी न हो सकेगी ।
अतः प्रतिज्ञा पक्षरूप धर्मी के ज्ञापक प्रमाण को उपस्थित करती हुई हेतु के
आश्रयरूप धर्मी को उसके समीप ले आती है । इस आश्रय के प्रदर्शन के द्वारा ही
हेतु की प्रवृत्ति में निमित्त होने के कारण प्रतिज्ञा भी साध्य-सिद्धि का उपयोगी
अङ्ग है । जैसा कि न्यायभाष्यकार ने कहा है कि 'यदि प्रतिज्ञा न रहे तो फिर हेतु
प्रभृति अवयवों की प्रवृत्ति ही न हो सकेगी' (प्र.) उपनय से ही हेतु के उस
आश्रय (विषय) की प्रतीति होगी ? (उ.) प्रतिज्ञा के न रहने पर उपनय की भी
प्रवृत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि हेतु के पक्षधर्मता-रूप सामर्थ्य का प्रदर्शन ही
उपनय का काम है; किन्तु साध्य के प्रधान होने के कारण ज्ञाता पुरुष को पहले
साध्य के प्रसङ्ग में ही जिज्ञासा होती है, साधन के सामर्थ्य के प्रसङ्ग में नहीं ।
एक 'न'-कार का रहना आवश्यक है । एवं पूर्ववाक्य के अन्त में भी 'प्रतिज्ञाया उपयोगः'
इस अर्थ को समझाने के लिए भी कोई शब्द चाहिए । प्रकृत ग्रन्थ में जो 'प्रतिज्ञाने' शब्द
है, उसका भी कुछ ठीक अर्थ नहीं बैठता है । अतः यह तय करना पड़ा कि 'प्रतिज्ञाने'
इस पद में 'ए'कार प्रमाद से लिखा गया है । अवशिष्ट 'प्रतिज्ञान' भी एक शब्द नहीं है;
किन्तु 'प्रतिज्ञा' और 'न' ये दो अलग शब्द हैं । जिनमें पहला पहले वाक्य के अन्त में
और दूसरा दूसरे वाक्य के आदि में मान लिया गया है । तदनुसार प्रकृत पाठ इस प्रकार
निष्पन्न होता है- 'अपदेशो हेतुः, तस्य विषयमाश्रयमापादयितुं प्रतिज्ञा । न खलु यत्र
क्वचन साध्यसाधनाय हेतुः प्रयुज्यते, तस्य सिद्धत्वात् । अपि तु कस्मिंश्चिद्धर्मिणि
प्रतिनियते'' । इसी पाठ के अनुसार अनुवाद किया गया है ।

५६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव-
न्यायकन्दली
तत्सिद्धयर्थं पश्चात् साधनमाकाङ्क्षते तदनु साधनसामर्थ्यमिति प्रथमं साध्य-
वचनमेवोपत्तिष्ठते, न पुनरग्रत एव साधनसामर्थ्यमुच्यते, तस्य तदानीमनपेक्षितत्वात् ।
प्रतिपिपादयिषितेन धर्मेण विशिष्टो धर्मेति विप्रतिषिद्धमिदम्, अप्रतीतस्यावि-
शेषकत्वादिति चेत् ? सत्यम्, अप्रतीतं विशेषणं न भवति, प्रतीतस्तु साध्यो धर्मः सपक्षे
विप्रतिपन्नं प्रति ज्ञापनाय धर्मिविशेषणतया प्रतिज्ञायते । अत एव धर्मिणः पक्षता
वास्तवी, तस्य स्वरूपेण सिद्धस्यापि प्रतिपाद्यधर्मविशिष्टत्वेनाप्रसिद्धस्य तेन रूपेण आपाद्य-
मानत्वसम्भवात् । पक्षधर्मतापि हेतोरित्थमेव, यदि केवलमेवानित्यत्वं साध्यते, भवेच्छब्द-
धर्मस्य कृतकत्वस्यापक्षधर्मता, शब्द एव त्वनित्ये साध्ये नायं दोषः । यदाहुराचार्याः -
साध्य की आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाने पर फिर साध्य की सिद्धि के लिए
साधन और उसके प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा जागती है, बाद में साधन के (पक्षधर्मतादि)
सामर्थ्य के प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा उठती है । अतः पहले प्रतिज्ञारूप साध्य
वचन की ही उपस्थिति उचित होती है । यह नहीं होता कि पहले (उपनय के
द्वारा) साधन के सामर्थ्य का ही प्रदर्शन हो; क्योंकि उस समय उसकी अपेक्षा ही
नहीं है ।
(प्र.) धर्मी का यह लक्षण ठीक नहीं मालूम पड़ता कि जिस धर्म का प्रतिपादन
इष्ट हो, उस धर्मरूप विशेषण से युक्त ही 'धर्मी' (या पक्ष) है; क्योंकि ये दोनों
बातें परस्पर विरोधी हैं कि एक ही वस्तु प्रतिपादन के लिए अभीष्ट भी हो एवं
वही (अप्रतिपादित) वस्तु विशेषण भी हो; क्योंकि विशेषण के लिए यह आवश्यक
है कि वह पहले से ज्ञात हो (पहले से ज्ञात वस्तु कभी प्रतिपाद्य नहीं हो सकती)।
(उ.) यह ठीक है कि विशेषण को (स्व से युक्त धर्मी के ज्ञान से) पहले ज्ञात
होना ही चाहिए; किन्तु प्रकृत में भी तो साध्यरूप धर्म पहले से सपक्ष (दृष्टान्त) में
ज्ञात ही रहता है । सपक्ष में ज्ञात साध्य के प्रसङ्ग में जिस पुरुष को पक्ष में
विप्रतिपत्ति है उसे समझाने के लिए ही साध्यरूप विशेषण से युक्त धर्मी का निर्देश
प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा किया जाता है । चूँकि (पर्वतत्वादि) अपने स्वरूप से सिद्ध
रहने पर भी प्रतिपाद्य (वह्नि प्रभृति) साध्यरूप धर्म से युक्त होकर वह पहले से
प्रसिद्ध नहीं है, अतः उस रूप से पक्ष का प्रतिपादन सम्भव है । इसी कारण धर्मी
का पक्ष होना (धर्मी की पक्षता) वास्तविक है (काल्पनिक नहीं) । इसी प्रकार हेतु
की पक्षधर्मता भी ठीक ही है; क्योंकि ('शब्दोऽनित्यः कृतकत्वाद् घटादिवत् इत्यादि
स्थलों में) यदि केवल अनित्यत्व का ही साधन करें तो शब्द में रहनेवाले कृतकत्व
में पक्षधर्मता नहीं रह सकेगी; किन्तु अनित्यत्व से युक्त को ही यदि साध्य मान
लेते हैं, तो फिर उक्त (कृतकत्व हेतु में अपक्षधर्मत्वरूप) दोष की आपत्ति नहीं
होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-