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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५०७
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्तु द्विविधम्-दृष्टं सामान्यतोदृष्टं च । तत्र दृष्टं
प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजात्यभेदेऽनुमानम् । यथा गव्येव
१. दृष्ट और २. सामान्यतोदृष्ट भेद से अनुमान दो प्रकार का है ।
जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और वर्तमान में उसी हेतु के
ज्ञाप्य साध्य दोनों अभिन्न हों, उस हेतु से उत्पन्न अनुमान ही 'दृष्ट'
अनुमान है । जैसे कि पहले एक स्थान में गाय में ही केवल सास्नारूप हेतु
न्यायकन्दली
देशकालाद्यविनाभूतं तत् तस्य लिङ्गमित्युक्तम्, तदेव हि तस्य यद् यस्याव्यभिचारि
(त्वेन) (यद्यस्य) व्यभिचारि न तत् तस्य, अन्यत्रापि भावात् । अपि भोः ! किमस्येदं
कार्यमिति न सम्बन्धातीति ब्रूमहे, कार्यादिग्रहणं तर्हि किमर्थम् ? निदर्शनार्थमित्युक्तम् ।
अवश्यं हि शिष्यस्योदाहरणनिष्ठं कृत्वा किमप्यव्यभिचारि लिङ्गं दर्शनीयमिति सूत्रे
कार्यादिकमुदाहृतम् । न तावन्त्येव लिङ्गानीत्यर्थः ।
भेदं कथयति- तत्तु द्विविधं दृष्टं सामान्यतोदृष्टं चेति । चशब्दोऽवधारणार्थः ।
तदनुमानं द्विविधमेव दृष्टमेकमपरं सामान्यतोदृष्टम् । तत्र तयोर्मध्ये दृष्टं प्रसिद्ध-
कि 'इस साध्य का यही लिङ्ग है' । इस प्रकार सामान्य रूप से साध्य के सभी
सम्बन्धियों में लिङ्गत्व का प्रतिपादन 'एवं सर्वत्र देशकालाविनाभूतमितरस्य लिङ्गम्'
इस भाष्य के द्वारा किया गया है । अर्थात् जिसमें जिस दूसरे वस्तु की दैशिकी या
कालिकी व्याप्ति है, वही उसका हेतु है । जिसमें जिसका व्यभिचार है, वह उसका
हेतु नहीं है, क्योंकि उसके न रहने के स्थान में भी वह रहता है । (प्र.) तो क्या
उक्त सूत्र में 'किमस्येदं कार्यम्' इस वाक्य के द्वारा यह कहते हैं कि 'साध्य का
सम्बन्ध हेतु में नहीं है' ? यदि ऐसी बात है तो फिर 'कार्यादि' का उपादान ही
उक्त सूत्र में व्यर्थ है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'निदर्शनार्थम्' इस वाक्य से दिया गया
है । अभिप्राय यह है कि शिष्यों को उदाहरण के द्वारा पूर्ण अभिज्ञ बनाकर ही
यह समझना होगा कि 'साध्य का अव्यभिचारी ही उसका लिङ्ग है' । अतः सूत्र में
कार्यादि सम्बन्धों का उल्लेख केवल उदाहरण के लिए है । इसका यह अभिप्राय
नहीं है कि सूत्र में कथित कार्यादि सम्बन्धों से युक्त ही हेतु है, साध्य के और
सम्बन्धों से युक्त भी हेतु हो सकते हैं, यदि वह सम्बन्ध अव्यभिचरित हो ।
'तत्तु द्विविधम्-दृष्टम्, सामान्यतोदृष्टञ्च' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान
के अवान्तर प्रकारों का निरूपण किया गया है । उक्त वाक्य में प्रयुक्त
'च' शब्द 'अवधारण' अर्थ का है । (तदनुसार उक्त वाक्य का यह अर्थ
है कि) कथित अनुमान दो ही प्रकार का है, एक है 'दृष्ट' और दूसरा
है 'सामान्यतोदृष्ट' । 'तत्र' अर्थात् उन दोनों अनुमानों में से 'दृष्टं
प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजात्यभेदेऽनुमानम्' 'प्रसिद्ध' अर्थात् हेतु के साथ पहले

५०८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
सास्नामात्रमुपलभ्य देशोन्तरेऽपि सास्नामात्रदर्शनाद् गवि
प्रतिपत्तिः । प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्म-
को देखकर, दूसरे स्थान में सास्ना को देखने के बाद गोविषयक प्रतिपत्ति
(अनुमिति) होती है । जिस हेतु के साथ पूर्व में ज्ञात साध्य और उसी हेतु के
द्वारा वर्त्तमान में ज्ञाप्य साध्य, दोनों विभिन्न जाति के हों, उस हेतु सामान्य
और (वर्तमान में अनुमेय) साध्यसामान्य की व्याप्ति से जो अनुमान उत्पन्न
होता है, उसे 'सामान्यतोदृष्ट' अनुमान कहते हैं । जैसे कि कृषक,
न्यायकन्दली
साध्ययोर्जात्यभेदेऽनुमानम् । प्रसिद्धं यत् पूर्वं लिङ्गेन सह दृष्टं साध्यं यत् सम्प्रत्यनुमेयं
तयोरत्यन्तजात्यभेदे सति यदनुमानं तद् दृष्टम् । यथा गव्येव सास्नामात्रमुपलभ्य देशान्तरे
गवि प्रतिपत्तिः । पूर्वं गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्तौ सास्नोपलब्ध्या सम्प्रत्यपि
गोत्वजातिविशिष्टायामेव गोव्यक्तेरनुमानमत्यन्तजात्यभेदे । इदं च दृष्टमित्याख्यायते ।
सास्नामात्रदर्शनाद् वनान्तरे यदनुमीयते गोत्वसामान्यं तस्य स्वलक्षणं
पूर्वं नगरे दृष्टमिति कृत्वा प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्म-
सामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्यतोदृष्टम् । प्रसिद्धं लिङ्गेन सह प्रतीतं
जो साध्य ज्ञात है और जो साध्य अभी अनुमेय है, इन दोनों के जातितः अत्यन्त
अभिन्न होने पर जो अनुमान होता है, वह 'दृष्ट' अनुमान है । जैसे कि पहले
किसी गाय में ही सास्ना को देखकर दूसरे देश में गो का अनुमान होता है । पहले
गोत्व जाति से युक्त गो व्यक्ति में ही सास्ना की उपलब्धि हुई, अभी भी सास्ना से
जो गो की अनुमिति होती है, वह गोत्व जाति से युक्त गो व्यक्ति में ही होती है,
अतः गो विषयक इन दोनों ज्ञानों में विषय होनेवाला गोत्व अत्यन्त अभिन्न (एक
ही) है, तस्मात् यह 'दृष्ट' अनुमान कहलाता है । इसे दृष्ट अनुमान होने की युक्ति
यह है कि वन में केवल सास्ना के देखने से जिस गोत्व जाति का अनुमान होता है,
वह उसस्वरूप सेनगर में पहले से ही गो में देखा जा चुका है ।
"प्रसिद्धसाध्ययोरत्यन्तजातिभेदे लिङ्गानुमेयधर्मसामान्यानुवृत्तितोऽनुमानं सामान्य-
तोदृष्टम्" (इस भाष्यवाक्य के) 'प्रसिद्धसाध्ययोः' इस पद से 'प्रसिद्धं लिङ्गेन सह
प्रतीतं साध्यमनुमेयं ययोः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार अनुमान का साध्य एवं हेतु के
साथ पहले गृहीत होनेवाला साध्य ये दोनों साध्य अभिप्रेत हैं । इन दोनों साध्यों में
परस्पर अत्यन्त भेद के रहने पर भी हेतु सामान्य में साध्यसामान्य की व्याप्ति से
जो अनुमान उत्पन्न होता है, वही 'सामान्यतोदृष्ट' अनुमान है । (इस अर्थ के बोधक