वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५
न्यायकन्दली
किमर्थं तर्हि कणादर्षेर्नमस्कारः ? विघ्नोपशमायेत्युक्तम्, यथेश्वरस्य नमस्कारः ।
सोऽपि हि न तत्पूर्वकत्वख्यापनाय, व्यभिचारात् । यस्य हि या देवता स तां प्रणम्य
सर्वकर्म्माणि प्रस्तौति, न कर्म्मणस्तत्पूर्वकत्वेन, भक्तिश्रद्धामात्रनिबन्धनत्वात्रमस्कारस्य ।
यथा मीमांसावार्त्तिककृता नमस्कृतः सोमावतंसः । न च तत्पूर्विका मीमांसेत्यस्ति प्रवादः ।
अन्विति ईश्वरप्रणामादनन्तरतां कणादप्रणामस्य परामृशति, ईश्वरमादौ प्रणम्य ईश्वर-
प्रणामादनु पश्चात् कणादं प्रणम्येत्यर्थः ।
सम्बन्धप्रयोजनयोरनभिधाने श्रोता न प्रवर्त्तते, प्रयोजनाधिगतिपूर्वकत्वात् सर्व-
प्रेक्षावत्प्रवृत्तेः । तस्याप्रवृत्तौ च शास्त्रं कृतमकृतं स्यात् । अतः शास्त्रारम्भमादधानः
प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यङ्गं तस्य सम्बन्धं प्रयोजनञ्चादौ श्लोकस्योत्तरार्द्धेन कथयति-
पदार्थधर्म्मत्यादि । पदार्था द्रव्यादयः षट्, तेषां धर्म्माः साधारणासाधारणस्वभावाः
संगृह्यन्ते संक्षेपेणाभिधीयन्तेऽनेनेति पदार्थधर्म्मसङ्ग्रहः । प्रवक्ष्यत इति । पदार्थधर्म्माणाम्
(प्र.) फिर कणाद ऋषि को ही नमस्कार करने की क्या आवश्यकता है ? (उ.)
यह कहा जा चुका है कि ईश्वर को नमस्कार करने की तरह कणाद ऋषि को
नमस्कार करना भी विघ्नों के नाश के लिए ही है, ग्रन्थ में इस प्रसिद्धि के लिए
नहीं कि यह ग्रन्थ कणादकृत-ग्रन्थमूलक है, क्योंकि यह नियम व्यभिचरित है ।
जिसके जो देवता हैं, उनको नमस्कार करके ही वह व्यक्ति अपने सभी कामों को
आरम्भ करता है । (कोई भी) "सभी काम उस देवतामूलक हैं" इस अभिप्राय से
अपने इष्टदेवता को प्रणाम नहीं करता है । नमस्कार तो केवल भक्ति-श्रद्धामूलक
है । जैसे मीमांसावार्त्तिककार (कुमारिलभट्ट) ने सोमावतंस (शिव) को नमस्कार किया
है, किन्तु इससे कोई यह नहीं कहता कि मीमांसा सोमावतंसकृत है । 'अन्वतः'
यह पद "ईश्वरप्रणाम के बाद कणाद ऋषि को प्रणाम करते हैं" इस आनन्तर्य
को दिखाता है । अभिप्राय यह है कि पहले ईश्वर को प्रणाम कर 'अनु' अर्थात्
उसके बाद कणाद ऋषि को प्रणाम करके इस ग्रन्थ को आरम्भ करते हैं ।
(वक्तव्य विषय के साथ ग्रन्थ का) सम्बन्ध और (ग्रन्थ सुनने के)
प्रयोजन को न कहने से श्रोता (ग्रन्थ को सुनने में) प्रवृत्त नहीं होते हैं,
क्योंकि बुद्धिमान् व्यक्ति प्रयोजन को बिना समझे हुए किसी भी काम में प्रवृत्त
नहीं होते। वे अगर इस शास्त्र को पढ़ने या सुनने में प्रवृत्त न होंगे तो इसका
निर्माण होना न होने के बराबर होगा । इसलिए शास्त्र को आरम्भ करते
हुए (प्रशस्तदेव ने) बुद्धिमान् व्यक्तियों की प्रवृत्ति में कारणीभूत 'सम्बन्ध'
और 'प्रयोजन' इन दोनों को 'पदार्थधर्म्मसङ्ग्रहः' इत्यादि कथित श्लोक के
उत्तरार्द्ध से दिखलाते हैं । जिसमें पदार्थ अर्थात् द्रव्यादि छः वस्तुएँ और उनके
साधारण और असाधारण स्वभाव 'संगृहीत' हों अर्थात् संक्षेप से कहे जायँ, यही
"पदार्थधर्म्मसङ्ग्रहः" शब्द का अर्थ है । 'प्रवक्ष्यते' इस पद से "मैं पदार्थों और
६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ मङ्गलाचरण-
न्यायकन्दली
संक्षेपेणाभिधायको ग्रन्थः प्रकृष्टो मया वक्ष्यत इति ग्रन्थकर्त्तुः प्रतिज्ञा । ग्रन्थस्य चेयं
प्रकृष्टता यदन्यत्र ग्रन्थे विस्तरेणेतस्ततोऽभिहितानामिहैकत्र तावतामेव पदार्थधर्म्माणां ग्रन्थे
संक्षेपेण कथनम् । एतदेव चास्यारम्भः सत्स्वप्युपनिबन्धनान्तरेषु पदार्थधर्म्माणां सङ्ग्रहः
पदार्थधर्म्मप्रतीतिहेतुः । पदार्थधर्म्मप्रतीतिश्च न पुरुषार्थः, सुखदुःखाप्तिहान्योः पुरुष-
प्रयोजकत्वात् । तस्मादयमपुरुषार्थहेतुत्यादनुपादेय एवेत्याशङ्क्य तस्य पुरुषार्थफलतां
प्रतिपादयितुमुक्तं महोदय इति । महानुदयो महत्फलमपवर्गलक्षणं यस्मात् सङ्ग्रहादसौ
महोदयः सङ्ग्रहः । एतेन सङ्ग्रहस्य पदार्थधर्म्मैः सह वाच्यवाचकभावः, तत्प्रतिपत्त्या च
महोदयेन सह साध्यसाधनभावः सम्बन्धो दर्शितः ।
ननु भोः क एष महोदयो नाम ?
(१) सवासनसमुच्छेदो ज्ञानोपरम इत्येके । तथा च पठन्ति-न प्रेत्य संज्ञास्तीति ।
तदयुक्तम्, सर्वतः प्रियतमस्यात्मनः समुच्छेदाय प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यनुपपत्तेः, बन्धविच्छेदपर्यायस्य
मुक्तिशब्दस्यातदर्थत्वाच्च ।
उनके धर्मों को संक्षेप में प्रतिपादित करनेवाले उत्तम ग्रन्थ को कहूँगा" ग्रन्थकार
की ऐसी प्रतिज्ञा प्रतीत होती है । इस ग्रन्थ में और ग्रन्थों से उत्तमता यही है कि
अन्य ग्रन्थों में जहाँ तहाँ विस्तृत रूप से कहे गये पदार्थ इस ग्रन्थ में एक ही स्थान
में संक्षेप से कहे गये हैं । इसीलिए और निबन्धों के रहते हुए भी इसकी रचना
सार्थक है । (प्र.) "पदार्थधर्म्माणां सङ्ग्रहः" इस वाक्य का अर्थ है, पदार्थों और
उनके धर्मों की सम्यक् प्रतीति का कारण, किन्तु पदार्थों की या उनके धर्मों की
सम्यक् (यथार्थ) प्रतीति तो पुरुष का अभीष्ट नहीं है, क्योंकि पुरुष (जीव) का
यथार्थ अभीष्ट तो सुख प्राप्ति एवं दुःख की निवृत्ति ये ही दोनों हैं । तस्मात् यह
ग्रन्थ पुरुष के अभीष्ट का सम्पादक न होने के कारण अनुपादेय ही है । यही
प्रश्न (मन में) रखकर (इसके उत्तर स्वरूप) "यह ग्रन्थ पुरुष के उक्त प्रयोजन
का सम्पादक है" यह कहने के लिए "महोदयः" यह पद लिखा है । "महान्
उदय" अर्थात् अपवर्ग (मोक्ष) रूप महान् फल जिस सङ्ग्रह से हो वही "महोदय
सङ्ग्रह" है । इससे इस 'सङ्ग्रह' रूप ग्रन्थ का पदार्थ और उनके धर्मों के साथ
कार्यकारणभाव सम्बन्ध दिखलाया गया है ।
(प्र.) यह महोदय नाम की कौन वस्तु है ?
(१) कोई (बौद्धविशेष) कहते हैं कि वासनारूप मूलसहित ज्ञान का नाश ही
'महोदय' (निर्वाण) है। इसके प्रमाण में वे उपनिषद् का यह वाक्य उद्धृत करते हैं-
"न प्रेत्य संज्ञास्ति," अर्थात् मरने के बाद "संज्ञा" (चेतना) नहीं रहती है। (उ.) किन्तु
यह पक्ष अयुक्त है, क्योंकि (प्रश्नकर्त्ता के मत से आत्मा ज्ञानरूप है) आत्मा ही