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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४८९
न्याय्कन्दली
प्रसिद्धं च तदन्विते इत्यव्यापकम् । अत्रैक समानतन्त्रप्रसिद्ध्या केवलान्वयिनः केवल-
व्यतिरेकिणश्च परिग्रह इति वदन्ति । अपरे तु व्यस्तसमस्तं लक्षणं वदन्ति । अनुमेयेन
सम्बद्धं प्रसिद्धं च तदन्वित इति अन्वयिनो लक्षणम् । अनुमेयेन सम्बद्धं तद्विपरीते च
नास्त्येवेति व्यतिरेकिण इति । समस्तं लक्षणमन्वयव्यतिरेकिण इति । साध्यसाधनत्वं
सामान्यलक्षणं त्रयाणाम् । यथा प्रमाणानां यथार्थपरिच्छेदकत्वं सामान्यलक्षणम् ।
विशेषण के न रहने से हेतु का प्रकृतलक्षण (केवल) व्यतिरेकी हेतु में अव्याप्त है ।
केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु इन दोनों में कथित अव्याप्ति का
समाधान कोई इस प्रकार करते हैं कि केवलान्वयि हेतु और केवलव्यतिरेकी हेतु
इन दोनों में हेतुत्व का व्यवहार समानतन्त्र (न्यायदर्शन) के अनुसार समझना
चाहिए । (सिद्धान्ततः वैशेषिक मत से वे दोनों हेतु नहीं हैं) ।
कोई (इन दोनों को वैशेषिक मत से भी हेतु मानते हुए) हेतु के लक्षणवाक्य
को सम्पूर्ण और खण्डशः दोनों प्रकार से लक्षण का बोधक मान कर उनमें
अव्याप्ति दोष का परिहार करते हैं । तदनुसार 'यदन्नुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि
श्लोक से निम्नलिखित तीन लक्षणवाक्य निष्पन्न होते हैं
(१) यदनुमेयेन सम्बद्धं प्रसिद्धञ्च तदन्विते । (अर्थात् जो पक्ष और सपक्ष दोनों
में ही रहे, वही हेतु है) । हेतु का यह लक्षण (केवल) अन्वयी ('विशेषोऽभिधेयः
प्रमेयत्वात्' इस अनुमान के प्रमेयत्व) हेतु का है (अर्थात् हेतु के इस लक्षण में
'तदभावे च नास्त्येव' इस वाक्य से कथित विपक्षावृत्तित्व का प्रवेश नहीं है, अतः
केवलान्वयि स्थल में विपक्ष की अप्रसिद्धि से हेतु लक्षण की अव्याप्ति नहीं है) ।
(२) यदनुमेयेन सम्बद्धं तदभावे च नास्त्येव । अर्थात् पक्ष में रहे और विपक्ष
में न रहे वही 'हेतु' है । हेतु का यह लक्षण (केवल) व्यतिरेकी हेतु के लिए है ।
अतः 'जीवच्छरीरं सात्मकं प्राणादिमत्त्वात्' इत्यादि व्यतिरेकी हेतु में सपक्ष की
अप्रसिद्धि के कारण अव्याप्ति नहीं है । क्योंकि हेतु के इस लक्षण में 'प्रसिद्धञ्च
तदन्विते' इस वाक्य के द्वारा कथित 'सपक्षसत्त्व' का निवेश नहीं है) ।
(३) 'यदनुमेयेन सम्बद्धम्' इत्यादि संपूर्ण श्लोक के द्वारा कथित लक्षण
अन्वयव्यतिरेकी हेतु का है, क्योंकि इसमें पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व, एवं विपक्षासत्त्व
हेतु के ये तीनों ही लक्षण विद्यमान रहते हैं ।
कथित तीनों हेतुओं में समान रूप से रहेवाला लक्षण यही है कि 'जो साध्य
का साधन करे, वही हेतु है' जैसे 'जो यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करे वही प्रमाण है'
यह सभी प्रमाणों का साधारण लक्षण है ।

४९० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यत्तु यथोक्तात् त्रिरूपाल्लिङ्गादेकेन धर्मेण द्वाभ्यां वा विपरीतं
तदनुमेयस्याधिगमे लिङ्गं न भवतीति । एतदेवाह सूत्रकारः- "अप्रसिद्धोऽन-
पदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च" (अ. ३ आ. १ सू. १५) इति ।
उक्त प्रकार से कहे गये (पक्षसत्त्व, सपक्षसत्त्व और विपक्षासत्त्व रूप
हेतुत्व के सम्पादक) तीनों धर्मों में से एक या दो धर्मों से रहित कोई
वस्तु साध्य की अनुमिति का नहीं (किन्तु हेत्वाभास) है । यही बात
(उनका हेत्वाभासत्व) सूत्रकार ने 'अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च'
इस सूत्र के द्वारा कही है ।
न्यायकन्दली
विपरीतमतो यत् स्यादिति द्वितीयश्लोकार्थं विवृणोति-यत्त्विति । अनपदेश इति ।
अपदेशो हेतुर्न भवतीत्यपदेशोऽहेतुरित्यर्थः । अप्रसिद्ध इति विरुद्धासाधारणयोः परिग्रहः,
तयोः साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धयभावोदहेतुत्वम् । असन्नित्यसिद्धस्यावरोधः, स हि सपक्षे
साध्यधर्मेण सह प्रसिद्धोऽपि धर्मिणि वृत्त्यभावादहेतुः । सन्दिग्धश्चेत्यनैकान्तिकाभिधा-
नम् । स हि धर्मिणि दृश्यमानः किं साध्यधर्मसहचरितः किं वा तद्रहित इति सन्दिग्धो
भवति, न पुनरेकं धर्ममुपस्थापयितुं शक्नोति । उभयथा दृष्टत्वादहेतुः ।
'यत्तु' इत्यादि से 'विपरीतमतो यत् स्यात्' इस दूसरे श्लोक की व्याख्या करते
हैं । कथित 'अप्रसिद्धोऽनपदेशोऽसन् सन्दिग्धश्च' इस सूत्र में प्रयुक्त 'अनपदेश'
शब्द का 'अपदेशो हेतुर्न भवति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'अहेतु' (अर्थात्
हेत्वाभास) अर्थ है । उक्त सूत्र के 'अप्रसिद्ध' शब्द से विरुद्ध और असाधारण इन
दोनों को (हेत्वाभास के अन्तर्गत) समझना चाहिए । ये दोनों इस लिए अहेतु हैं
कि साध्यरूप धर्म के साथ इनकी 'प्रसिद्धि' नहीं है, अर्थात् निश्चय नहीं है,
फलतः सपक्षसत्त्व नहीं है । 'असन्' शब्द से 'असिद्ध' नाम का हेत्वाभास अभिप्रेत
है, क्योंकि असिद्ध हेत्वाभास सपक्ष में साध्य धर्म के साथ रहते हुए भी, अर्थात्
सपक्षवृत्ति होते हुए भी 'धर्मी' में अर्थात् पक्ष में ही नहीं रहता है, अतः वह हेतु
न होकर हेत्वाभास है । 'सन्दिग्धश्च' इस पद से 'अनैकान्तिक' को हेत्वाभास कहा
गया है । अनैकान्तिक यद्यपि पक्ष में देखा जाता है, किन्तु यह सन्देह बना ही
रहता है कि वह साध्य के साथ रहनेवाला है ? या साध्याभाव के साथ ? इसी
सन्देह के कारण यह साध्य या साध्याभाव रूप किसी एक धर्म को निश्चितरूप से
उपस्थित नहीं कर सकता, क्योंकि वह दोनों के साथ देखा जाता है, अतः वह
हेतु नहीं है ।
धर्मी (हेतु) में धर्म (साध्य) की अन्वयव्याप्ति एवं व्यतिरेकव्याप्ति इन दोनों
के रहने पर भी बोद्धा पुरुष को यदि 'यह हेतु इस साध्य से व्याप्त है' इस प्रकार