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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७९
न्यायकन्दली
पार्थिवपरमाणावेकस्मिन्ननित्यत्वं प्रतिपादयितुमिष्यते, किन्तु चतुर्ष्वपि परमाणुष्विति समुदि-
तानामेव पक्षत्वे स्थितेऽसिद्धवद् भागासिद्धस्यापि व्युदासः, अनुमेयसम्बन्धाभावात् । प्रसिद्धं
च तदन्वित इति । तदिति योग्यत्वात् साध्यधर्मः परामृश्यते । तदन्विते साध्यधर्मान्विते सपक्षे
प्रसिद्धं परिज्ञातमिति विरुद्धासाधारणयोर्व्यवच्छेदः । तदभावे च नास्त्येवेति । अत्रापि तदिति
हेतु भी पक्षवृत्ति होगा, क्योंकि उन चारों प्रकार के परमाणुओं में से एक पार्थिव
परमाणु में वह विद्यमान है, किन्तु वह हेतु तो भागासिद्ध हेत्वाभास है, (अतः
'हेतु' का वह 'अनुमेयसम्बद्धत्व' रूप लक्षण ठीक नहीं है) । (उ.) जिसमें साध्य
और हेतु दोनों का अभाव निश्चित हो वही 'विपक्ष' है । यह विपक्षता (विपक्षता-
वच्छेदकाश्रयीभूत) प्रत्येक विपक्ष व्यक्ति में है । (विक्षतावच्छेदकाश्रयीभूत) सभी
विपक्ष व्यक्ति समूह में ही नहीं, (अतः किसी भी विपक्ष व्यक्ति में रहनेवाला हेतु
विपक्षवृत्ति होने के कारण भागासिद्ध हेत्वाभास होता है) 'पक्ष' के प्रसङ्ग में सो
बात नहीं है, क्योंकि पक्ष वही है जिसमें वादी को साध्य सिद्धि की इच्छा हो,
प्रकृत में वादी की यह इच्छा नहीं है कि केवल पार्थिव परमाणु में ही अनित्यत्व
की सिद्धि करे, किन्तु वादी की यह इच्छा है कि चारों प्रकार के परमाणुओं में ही
अनित्यत्व की सिद्धि करे । तदनुसार उक्त चारों परमाणुओं का समूह ही पक्ष है,
तदन्तर्गत एक पार्थिव परमाणु नहीं, अतः जिस प्रकार पक्षाभिमत सभी वस्तुओं में
हेतु के न रहने से हेतु (हेतु नहीं रह जाता या) असिद्ध नाम का हेत्वाभास हो
जाता है, उसी प्रकार (पक्षान्तर्गत पार्थिव परमाणुरूप पक्ष में गन्धरूप हेतु के रहने
पर भी पक्षान्तर्गत जलादि के तीनों परमाणुओं में गन्ध के न रहने से वह हेतु न
होकर) भागासिद्ध नाम का हेत्वाभास ही होगा; क्योंकि उसमें पक्षान्तर्गत जलादि
परमाणुओं का सम्बन्ध न रहने के कारण पक्षान्तर्गत ही पार्थिव परमाणु का
सम्बन्ध रहते हुए भी अनुमेयस्वरूप चारों परमाणुओं के साथ सम्बन्ध नहीं है ।
इस प्रकार हेतु के लक्षण में 'अनुमेयेन सम्बद्धम्' इस विशेषण से स्पष्ट ही पक्ष में
कहीं भी न रहनेवाला हेतु स्वरूपासिद्ध या भागासिद्ध हेत्वाभास होगा ।
'प्रसिद्धञ्च तदन्विते' इस वाक्य में प्रयुक्त 'तत्' शब्द से साध्यरूप धर्म ही
गृहीत होता है, क्योंकि उसी का ग्रहण प्रकृत में उपयोगी है । 'तदन्विते' अर्थात्
साध्यरूप धर्म से युक्त अर्थात् 'सपक्ष' में 'प्रसिद्ध' अर्थात् अच्छी तरह से ज्ञात
(होना हेतु के लिए आवश्यक है) । (हेतु के इस सपक्षवृत्तित्व रूप लक्षण से)
विरुद्ध और असाधारण नाम के हेत्वाभासों में हेतुत्व का व्यवच्छेद होता है,
अर्थात् उनमें हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं हो पाती ।
'तदभावे च नास्त्येव' इस वाक्य के 'तत्' शब्द से साध्यरूप धर्म का ही ग्रहण करना
चाहिए । (तदनुसार) इस वाक्य का यह अर्थ है कि साध्यरूप धर्म का अर्थात् साध्य का
अभाव जिन आश्रयों में रहे, उन सभी आश्रयों में जो कदापि न रहे वही (सपक्षवृत्ति

४८० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे अनुमान-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विपरीतमतो यत् स्यादेकेन द्वितयेन वा।
विरुद्धासिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत् ॥
यदनुमेयेनार्थेन देशविशेषे कालविशेषे वा सहचरितम-
हो, ऐसे आश्रयों में जो कदापि न रहे (इसे विपक्षासत्व कहते हैं), वही
(पक्षसत्व, सपक्षसत्व और विपक्षासत्य से युक्त) हेतु साध्य का ज्ञापक है ।
(सपक्षसत्वादि इन तीन) लक्षणों में से एक या दो लक्षणों से भी रहित हेतु
को काश्यप ने असिद्ध, विरुद्ध और सन्दिग्ध नाम का हेत्वाभास कहा है ।
(लिङ्ग के लक्षण बोधक कथित पहिले श्लोक का यह अभिप्राय हैं
कि) जो साध्य के साथ किसी समयविशेष में एवं देशविशेष में सम्बद्ध
न्यायकन्दली
साध्यधर्मस्यैव परामर्शः, तस्य साध्यधर्मस्याभावे नास्त्येव न पुनरेकदेशेऽस्त्यपीत्यनै-
कान्तिकव्यवच्छेदः । तल्लिङ्गमनुमापकम् अनुमेयस्य ज्ञापकम् ।
लिङ्गं व्याख्याय लिङ्गाभासं व्याचष्टे-विपरीतमतो यत् स्यादिति ।
अत उक्तलक्षणाल्लिङ्गाद् यदेकेन द्वितयेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतं रहितं विरुद्ध-
मसिद्धं सन्दिग्धम्, तत् कश्यपात्मजोऽलिङ्गमनुमेयाप्रतिपादकमब्रवीत् । असिद्धमनुमेये
नास्ति, अनैकान्तिकं विपक्षाद्व्यावृत्तमित्यनयोरेकेन लिङ्गलक्षणेन विपरीतत्वम् ।
और पक्षवृत्ति) 'हेतु' है। उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'एवं' शब्द के द्वारा यह सूचित
किया गया है कि ऐसे किसी भी आश्रय में हेतु को न रहना चाहिए जिसमें कि
साध्य न रहे । इस प्रकार इस विशेषण के द्वारा अनैकान्तिक नाम के हेत्वाभास में
हेतु लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण होता है । 'तल्लिङ्गमनुमापकम्' (अर्थात् उक्त
पक्षवृत्तित्व, सपक्षवृत्तित्व और विपक्षावृत्तित्व इन) तीनों लक्षणों से युक्त हेतु ही
साध्य का ज्ञापक है ।
लिङ्ग के लक्षण के कहने के बाद अब 'विपरीतमतो यत् स्यात्' इत्यादि सन्दर्भ के
द्वारा लिङ्गाभास (हेत्वाभास) का लक्षण कहते हैं । 'अत' अर्थात् हेतु के कथित तीनों
लक्षणों में से हेतु के एक या दो लक्षणों से 'विपरीत' अर्थात् शून्य हेतु को 'काश्यप'
ने अर्थात् कश्यप के पुत्र ने क्रमशः विरुद्ध, असिद्ध और सन्दिग्ध नाम का 'अलिङ्ग'
(हेत्वाभास) कहा है, क्योंकि ये अनुमेय के ज्ञापक नहीं हैं । इनमें 'असिद्ध' नाम
का हेत्वाभास अनुमेय (पक्ष) में नहीं रहता, (अर्थात् उसमें पक्षवृत्तित्व रूप एक धर्म
का अभाव है), 'अनैकान्तिक' नाम का हेत्वाभास विपक्ष से अव्यावृत्त है, अर्थात् विपक्षा-
वृत्तित्वरूप हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण हेत्वाभास है (इस प्रकार
असिद्ध और अनैकान्तिक ये दोनों हेतु के एक ही लक्षण से रहित होने के कारण