वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४७३
प्रशस्तपादभाष्यम्
अस्मिन्नान्यत् प्रमाणान्तरमस्ति, अफलरूपत्वात् ।
अनपेक्ष) इन्द्रिय और अर्थ का सम्प्रयोग ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, क्योंकि
वहाँ ज्ञानादि कोई दूसरा प्रमाण उपस्थित नहीं है । एवं यह ज्ञान
निर्विकल्पक होने के कारण किसी ज्ञानरूप प्रमाण का फल भी नहीं है,
इस हेतु से भी उक्त निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रत्यक्ष प्रमिति के पक्ष में उक्त
आलोचनरूप इन्द्रिय और अर्थ का सम्प्रयोग ही प्रत्यक्ष प्रमाण है ।
न्यायकन्दली
प्रमाणं भवत्येव प्रमाहेतुत्वात्, किन्तु विशेषणज्ञानसहकारितया न केवलः, सामान्य-
विशेषज्ञानोत्पत्तौ तु ज्ञानानपेक्षः केवल एवेत्यभिप्रायः । सन्निकर्षमात्रमिह प्रमाणं न
ज्ञानमित्यत्रोपपत्तिमाह-न तस्मिन्निति ।
सामान्यविशेषज्ञाने नान्यत् प्रमाणं ज्ञानरूपमस्ति सामान्यविशेषज्ञानस्या-
फलरूपत्वात् ज्ञानफलत्वाभावात् । विशेष्यज्ञानं हि विशेषणज्ञानस्य फलम्, विशेषण-
ज्ञानं न ज्ञानान्तरफलम्, अनवस्थाप्रसङ्गात् । अतो विशेषणज्ञाने इन्द्रियार्थ-
सन्निकर्षमात्रमेव प्रमाणमित्यर्थः । यदा निर्विकल्पकं सामान्यविशेषज्ञानं फलं
तदेन्द्रियार्थसन्निकर्षः प्रमाणम्, यदा विशेष्यज्ञानं फलं तदा सामान्यविशेषाद्यालोचनं
दक कारण) प्रमाण है (अर्थात् जिस समय निर्विकल्पक ज्ञान फल रूप है, उस समय
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष प्रमाण है)। विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान की उत्पत्ति में भी इन्द्रिय
और अर्थ का संनिकर्ष उक्त ज्ञान का कारण होने से (यद्यपि) प्रमाण है ही, फिर
भी विशिष्ट ज्ञानरूप कार्य के उत्पादन के लिए उसे विशेषण ज्ञान (निर्विकल्पक
ज्ञान) की भी अपेक्षा होती है, अतः केवल वही विशिष्ट ज्ञान का कारण (प्रमाण)
नहीं है । किन्तु सामान्य विशेषज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान) के उत्पादन में उसे दूसरे
किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं होती, अतः वहाँ वह 'केवल' अर्थात् ज्ञान से अनपेक्ष
होकर (प्रमा का उत्पादक कारण) प्रमाण है । 'न तस्मिन्' इत्यादि ग्रन्थ से यह
उपपादन करते हैं कि निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रमा के उत्पादन में केवल इन्द्रिय और
अर्थ का संनिकर्ष ही क्यों करण है ? कोई ज्ञान उसका करण क्यों नहीं है ?
अभिप्राय यह है कि कोई ज्ञान निर्विकल्पक ज्ञानरूप प्रमा का उत्पादक करण (प्रमाण)
नहीं है, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान 'अफल रूप है' अर्थात् किसी ज्ञान का फल नहीं
हैं । विशिष्ट ज्ञान (विशेष्य ज्ञान) तो विशेषण ज्ञान (निर्विकल्पकज्ञान) का फल
है, किन्तु निर्विकल्पक ज्ञान (विशेषण ज्ञान) किसी ज्ञानरूप करण का फल नहीं हो
सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर अनवस्था हो जाएगी । यही कारण है निर्विकल्पक
(विशेषण) प्रमा का, इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही केवल करण है । फलितार्थ
यह है कि जिस समय निर्विकल्पकरूप सामान्य और विशेष का ज्ञान फल है, उस
समय इन्द्रिय और अर्थ का संनिकर्ष ही केवल प्रमाण है, एवं जिस समय विशेष्य
४७४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अथवा सर्वेषु पदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षादवितथमव्यपदेश्यं
अथवा आत्मा, मन, इन्द्रिय और अर्थ इन चारों के (तीन)
सम्प्रयोग से जिस किसी भी वस्तुविषयक अव्यपदेश्य अर्थात्
शब्दाजन्य यथार्थ ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है। एवं द्रव्यादि
पदार्थ (इस प्रमाण के) प्रमेय हैं। एवं आत्मा प्रमाता है।
न्यायकन्दली
प्रमाणमित्युक्तं तावत् । सम्प्रति हानादिबुद्धीनां फलत्वे विशेषज्ञानं प्रमाणमित्याह-
अथवेति । सर्वेषु पदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षात् चतुष्टयग्रहणमुदाहरणार्थम् । द्वयसन्निकर्षात्
त्रयसन्निकर्षादवितथं संशयविपर्ययरहितमव्यपदेश्यं व्यपदेशे भवं व्यपदेश्यं न व्यपदेश्यमव्य-
पदेश्यं शब्दाजन्यं यद् विज्ञानं जायते तत् प्रत्यक्षं प्रमाणम् । संशयो ह्यनवस्थितोभय-
धर्मतया पदार्थमुपदर्श्य व्यवस्थितैकधर्माणं प्रापयति, अन्यथाध्यवसायो वितथ एवेत्यवितथ-
पदेन व्युदस्यन्ति । अव्युत्पन्नस्य सन्निहितेऽर्थे व्याप्रियमाणे चक्षुषि शब्दश्रवणानन्तरं यद्
गौरिति ज्ञानं जायते, तत्राक्षमपि कारणम्, अन्यथा रेखोपरेखतादिविशेषप्रतीत्ययोगात् ।
(विशिष्ट) ज्ञान ही फलरूप से अभिप्रेत है, उस समय सामान्य और विशेष का
आलोचन (निर्विकल्पक) ज्ञान ही प्रमाण है ।
'अथवा' इत्यादि ग्रन्थ से अब यह कहते हैं कि हानादि बुद्धि को अगर फल
मानें, तो विशिष्ट ज्ञान ही प्रमाण है । 'सर्वपदार्थेषु चतुष्टयसन्निकर्षात्' इस वाक्य
में 'चतुष्टय' पद का प्रयोग केवल उदाहरण दिखाने के लिए है, अतः दो के
संनिकर्ष से या तीन के संनिकर्ष से भी उत्पन्न 'अवितथ' अर्थात् संशय और
विपर्यय से भिन्न 'अव्यपदेश्य' (अर्थात् 'व्यपदेशे भवं व्यपदेश्यम्, न व्यपदेश्य-
मव्यपदेश्यम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार) शब्द से अनुत्पन्न उक्त प्रकार का ज्ञान ही
प्रत्यक्ष प्रमाण है ।
जिन दो रूपों से संशय के द्वारा एक ही विषय उपस्थित होता है, बाद में
उनमें से एक रूप से निश्चित अर्थ की प्राप्ति का प्रयोजक होने से उपादान
बुद्धिरूप प्रमिति के कारणरूप संशय प्रमाण कोटि में यद्यपि आ सकता है,
किन्तु संशय उस एक वस्तु को भी अनिश्चितरूप से ही उपस्थित करता है, इस
प्रकार संशय 'वितथ' ही है, अवितथ नहीं । 'अन्यथाध्यवसाय' अर्थात् विपर्यय तो
वितथ ही है । इस प्रकार 'अवितथ' पद से संशय और विपर्ययरूप सभी मिथ्या
ज्ञानों की व्यावृत्ति होती है । (गो में गोशब्दवाच्यत्व विषयक ज्ञानरूप) व्युत्पत्ति
जिस पुरुष को नहीं है, उसका चक्षु जिस समय गोरूप पिण्ड में व्यापृत रहता है,
उसी समय 'अयं गौः' इस वाक्य के द्वारा जो उसे 'गौः' इस प्रकार का
शब्दज्ञान होता है, उसकी व्यावृत्ति के लिए ही 'अव्यपदेश्य' पद दिया गया है ।
इस ज्ञान के प्रति यद्यपि चक्षु भी कारण है, यदि ऐसा न हो तो उस व्यक्ति को
गो की छोटी बड़ी रेखाओं का ज्ञान न हो सकेगा, फिर भी वह ज्ञान