वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६९
न्यायकन्दली
शक्यमापादयितुम् । तत्र प्रमाणेन स्वप्रतीतिरनपेक्षणीया, न ह्येवं परः प्रत्यवस्थातुमर्हति
'तवासिद्धा धर्मादयो नाहं स्वसिद्धेष्वपि तेषु प्रतिपद्ये' इति ।
अत्र ब्रूमः-किं प्रसङ्गसाधनमनुमानं तदन्यद्वा ? यद्यन्यत् क्वाप्युक्तलक्षणेषु प्रमाणेष्व-
न्तर्भावो वर्णनीयः, वक्तव्यं वा लक्षणान्तरम् । यदि त्वनुमानमेव, तदा स्वप्रतीति-
पूर्व कमेव प्रवर्त्तते, स्वनिश् चयवदन्येषां निश्चयोत्पिपादयिषया सर्वस्य परार्थानु-
मानस्य प्रवृत्तेः । अन्यथा गगनकमलं सुरभि, कमलत्वात्, क्रीडासरःकमलय-
दोष होगा, क्योंकि सभी पुरुषों को अतीन्द्रिय अर्थों का द्रष्टा तो कोई भी नहीं
मानता । यदि विशेष प्रकार के पुरुष में अतीन्द्रियार्थ दर्शन के अभाव की सिद्धि
करना चाहते हैं, तो फिर इसमें आपके मत से पक्षासिद्धि होगी, क्योंकि पक्ष का
उसके असाधारण धर्म के साथ निश्चित रहना अनुमान के लिए आवश्यक है ।
मीमांसकों के मत में 'विशेष प्रकार के पुरुष' सिद्ध नहीं हैं । यदि उनकी सिद्धि
करना चाहेंगे, तो उस (धर्मितावच्छेदकविशिष्ट) धर्मी के ग्राहक प्रमाण से ही
योगियों में अतीन्द्रियार्थ दर्शनरूप 'विशेष' की भी सिद्धि हो जाएगी, जिससे उक्त
अनुमान बाधित हो जाएगा । यदि यह कहें कि (प्र.) (उक्त अनुमान तो) प्रसङ्ग
(आपत्ति) साधन के लिए है । प्रसङ्ग के साधन का उपन्यास तो दूसरों के मत के
खण्डन के लिए ही किया जाता है, अपने मत के साधन के लिए नहीं, दूसरों
(प्रतिपक्षी) के अनभिमत धर्मों की आपत्ति तो उनके मत से सिद्ध धर्मादि के द्वारा
भी दी जा सकती है । यह आवश्यक नहीं है कि जिसकी आपत्ति देनी है, उसके
विषयों को अपने मत के अनुसार प्रमाणों के द्वारा भी सिद्ध होना ही चाहिए;
क्योंकि प्रतिपक्षी यह आरोप कर ही नहीं सकते कि तुम्हारे मत के अनुसार जिन
धर्मों की उत्पत्ति नहीं हो सकती, उन धर्मों की केवल अपने मत से सिद्ध पदार्थों
में प्रतीति मुझे नहीं होती ।
(उ) इस प्रसङ्ग में हम (सिद्धान्तियों) लोगों का कहना है कि जिसे आप
'प्रसङ्गसाधन' कहते हैं, वह अनुमान ही है या और कुछ ? यदि अनुमान नहीं है,
तो फिर कथित प्रमाणों में ही उसका अन्तर्भाव करना होगा या फिर इसके लिए
कोई दूसरा ही लक्षण करना पड़ेगा ? यदि अनुमान ही है, तो फिर पहिले उसके
विषयों का ज्ञान अवश्य चाहिए; क्योंकि इस स्वज्ञान के द्वारा ही अनुमान की
उत्पत्ति होती है । सभी परार्थानुमानों में इच्छा से ही प्रवृत्ति होती है । जो कोई भी
परार्थानुमान में प्रवृत्त होता है, सबकी यही इच्छा रहती है कि मेरे सदृश ज्ञान का
उत्पादन बोद्धा में हो । अन्यथा (यदि पक्षतावच्छेदक रूप से पक्ष का उभयसिद्ध
ज्ञान न रहने पर भी अनुमान प्रमाण हो तो) यदि कोई परार्थानुमान का प्रयोग
करनेवाला पुरुष कमल की उत्पत्ति गगन में मानकर इस अनुमान का प्रयोग करे
कि गगन का कमल सरोवर के कमल की तरह ही सुगन्धित है, क्योंकि वह भी कमल
है, तो इसे भी प्रमाण मानना पड़ेगा । (अतः 'योगिनो अतीन्द्रियार्थद्रष्टारो न भवन्ति'
४७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
दित्यस्यापि प्रतिपादकाभ्युपगतसिद्धाश्रयस्य प्रामाण्योपपत्तिः । सन्दिग्धव्याप्तयश्च
प्राणित्वादयः । यदि विवादाध्यासितस्य पुरुषधौरेयस्य प्राणित्वादिकमपि भवेत्
सर्वज्ञत्वमपि स्यात्, केयात्रानुपपत्तिः ? नहि तयोः कश्चिद् विरोधः प्रतीक्षितः,
सर्वज्ञताया प्रमाणान्तरानगोचरत्वात् । प्राणित्वादेरसर्वज्ञतया सहभावस्तु सन्दिग्धः,
किमस्मदादीनां प्राणित्वाद्यनुबन्धिनीयमसर्वज्ञता ? किं वा सर्वज्ञानकारणत्वेनावगतस्य
योगजधर्मस्याभावकृतेति न शक्यते निर्धारयितुम् । अतोऽनवधारितव्याप्तिकं
प्राणित्वादिकम्, न तदनुमानसमर्थम् । अतीन्द्रियज्ञानकारणं योगजो धर्म इति न सिद्धम्,
कुतस्तदभावादस्मदादीनामसर्वज्ञता शङ्क्येत, अस्माकं तावत्सिद्धं तेनेदमाशङ्क्यते ततश्च
नोभयसिद्धा व्याप्तिः, कुतोऽनुमानम् ?
युक्तानां प्रत्यक्षं व्याख्याय वियुक्तानां व्याचष्टे-वियुक्तानां पुनरिति ।
अत्यन्तयोगाभ्यासोपचितधर्मतिशया असमाध्यवस्थिता अपि येऽतीन्द्रियं
इत्यादि अनुमान प्रमाण नहीं हो सकते) । दूसरी बात यह है कि इस अनुमान के
प्राणित्वादि हेतु में व्याप्ति सन्दिग्ध है (निश्चित नहीं, प्राणी सर्वज्ञ न हो, इसका
कोई निश्चय नहीं है) । अतः पुरुष श्रेष्ठ (योगी) प्राणी भी हो सकते हैं और
सर्वज्ञ भी हो सकते हैं, इसमें कौन-सी अनुपपत्ति है ? क्योंकि प्राणित्व और
सर्वज्ञत्व इन दोनों में कोई परस्पर विरोध पहिले से निश्चित नहीं है । (आपके
मत से) सर्वज्ञता किसी दूसरे प्रमाण से सिद्ध नहीं है । हम लोगों की तरह
प्राणियों में जो प्राणित्व और असर्वज्ञत्व दोनों का सहभाव देखा जाता है, उससे
यह निश्चय नहीं कर सकते कि हम लोग प्राणी हैं, इसीलिए असर्वज्ञ हैं या हम
लोगों में योग से उत्पन्न होनेवाला और सर्वज्ञता को उत्पन्न करनेवाला वह उत्कृष्ट
धर्म नहीं है, इस कारण असर्वज्ञ हैं । अतः कथित प्राणित्व हेतु-जिसमें कि
असर्वज्ञता की व्याप्ति निश्चित नहीं है-उक्त अनुमान का सम्पादन नहीं कर
सकता । 'योग से उत्पन्न धर्म के द्वारा अतीन्द्रिय विषयों का ज्ञान उत्पन्न होता है'
यह आपके मत से निश्चित नहीं है, अतः आप किस प्रकार यह आशङ्का करते हैं
कि हम लोगों में चूँकि योगज धर्म नहीं है,अतः हम लोग असर्वज्ञ हैं । एवं हम
लोगों को यह निश्चित है कि 'योग-जनित धर्म के ज्ञान से अतीन्द्रिय ज्ञान की
उत्पत्ति होती है' अतः हम लोगों की यह शङ्का ठीक है कि 'हम लोगों में चूँकि
योगज उत्कृष्ट धर्म नहीं है, अतः हम लोग असर्वज्ञ हैं' अतः आपके हेतु में
अन्वय और व्यतिरेक दोनों से ही व्याप्ति असिद्ध है, अतः उससे अनुमान किस
प्रकार हो सकता है ?
युक्त योगियों के प्रत्यक्ष के बाद 'वियुक्त' योगियों के प्रत्यक्ष की व्याख्या 'वियुक्तानां
पुनः' इत्यादि ग्रन्थ से की गयी है । वे ही 'वियुक्तयोगी' हैं जो समाधि अवस्था में
न होते हुए भी अत्यन्त योगाभ्यास के कारण अतीन्द्रिय वस्तुओं को भी देख
सकते हैं । उन्हें 'चतुष्टयसंनिकर्ष' अर्थात् आत्मा, मन, इन्द्रिय और विषय इन
चार वस्तुओं के संनिकर्ष से योगजधर्म के अनुग्रह से प्राप्त विशेष सामर्थ्य के द्वारा