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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४६७
न्यायकन्दली
तद्गुणत्वादिषु, सम्बद्धविशेषणभावेन समवायाभावयोर्ज्ञानं जनयति । दृष्टं तावत् समाहितेन
मनसाऽभ्यस्यमानस्य विद्याशिल्पादेरज्ञातस्यापि ज्ञानम् । तदितरत्रानुमानम् । आत्माकाशा-
दिष्वभ्यासप्रचयस्तत्त्वज्ञानहेतुः, विशिष्टाभ्यासात्वाद् विद्याशिल्पाद्यभ्यासवत् । तथा
बुद्धेस्तारतम्यं क्वचिद्विश्रान्तिशयं सातिशयत्वात् परिमाणतारतम्यवत् ।
ननु सन्ताप्यमानस्योदकस्यौष्ण्ये तारतम्यमस्ति, न च तस्य सर्वातिशायी वह्निरूपतापत्ति-
लक्षणः प्रकर्षो दृश्यते । नापि लङ्घनाभ्यासस्य क्वचिद् विश्रान्तिरवगता, न सोऽस्ति
पुरुषो यः समुत्प्लवेन भुवनत्रयं लङ्घयति । उच्यते-यः स्थिराश्रयो धर्मः स्वाश्रये च विशेष-
मारभते, सोऽभ्यासः क्रमेण प्रकर्षपर्यन्तमासादयति । यथा कधौतस्य पुटपाकप्रबन्धाहिता शुद्धिः
परां रक्तसारताम् । न चोदकतापस्य स्थिर आश्रयो यन्नायमभ्यस्यमानः परां काष्ठां गच्छेत्,
साधारण जनों की चिन्ता के भी बाहर है । उस धर्म के बल से अन्तःकरण उनके
शरीर से बाहर होकर दूसरों की आत्मा प्रभृति वस्तुओं के साथ सम्बद्ध होता है ।
(दूसरों की आत्मा में) अन्तःकरण के संयोग से दूसरी आत्मा का एवं (उसी
संयोग से युक्त) संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उस आत्मा में समवाय सम्बन्ध से
रहनेवाले गुणादि का, एवं संयुक्त-समवेतसमवाय सम्बन्ध से उन गुणादि में समवाय
सम्बन्ध से रहनेवाले गुणत्वादि धर्मों का, एवं परात्मसम्बद्ध विशेषणतासम्बन्ध से
उस आत्मा में रहनेवाले समवाय और अभाव का प्रत्यक्ष योगियों को होता है ।
क्योंकि पूर्व से सर्वथा अज्ञात विद्या एवं शिल्पादि ज्ञान का भी समाधि
युक्त मन के द्वारा अभ्यास करने पर योगियों को होता है । इस प्रसङ्ग में इससे
यह अनुमान फलित होता है कि जिस प्रकार विशेष प्रकार के अभ्यास से
योगियों को विद्या- शिल्पादि का ज्ञान देखा जाता है, उसी प्रकार विशेष प्रकार के
अभ्यास के कारण उनको आकाश एवं दूसरे की आत्मा प्रभृति अतीन्द्रिय
विषयों का भी प्रत्यक्ष होता है । एवं इसी प्रसङ्ग में यह दूसरा अनुमान प्रयोग
भी है कि जैसे परिमाण के आधिक्य का विश्राम आकाश में एवं परिमाण
की न्यूनता का विश्राम परमाणुओं में होता है, उसी प्रकार बुद्धि की विशदता
का भी कहीं विश्राम अवश्य होगा (वह आश्रय योगियों और परमेश्वर की
बुद्धि ही है) । (प्र.) आग पर चढ़े हुए जल की गर्मी में न्यूनाधिक भाव देखा
जाता है, किन्तु उसके आधिक्य की पराकाष्ठ-जो प्रकृत में जल का आग में
परिवर्तित हो जाना ही है-नहीं देखा जाता । एवं यह भी नियम नहीं है कि सभी
की चरम विश्रान्ति हो ही, क्योकि लङ्घन (कूदना) के अभ्यास की चरम परिणति
नहीं देखी जाती । कोई भी पुरुष ऐसा उपलब्ध नही है, जो कूदकर तीनों भुवनों
को लाँघ सके । (अतः उक्त अनुमान ठीक नहीं है) । (उ.) इसके उत्तर में
कहना है कि स्थिर आश्रय में रहनेवाला जो धर्म है, वही अपने आश्रय में
वैशिष्ट्य का सम्पादन कर सकता है, और उसी का अभ्यास क्रमशः चरम सीमा

४६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
अत्यन्ततापे सत्युदकपरिक्षयात् । नापि लङ्घनाभ्यासस्य स्वाश्रये विशेषाधायकत्वमस्ति,
निरन्वयविनष्टे पूर्वलङ्घने लङ्घनान्तरस्य बलान्तरात् प्रयत्नान्तरादप्यपूर्ववदुत्पत्तेः । अत
एव त्रिचतुरोत्प्लवपरिश्रान्तस्य लङ्घनं पूर्वस्मादपचीयते, सामर्थ्यपरिक्षयात् । बुद्धिस्तु
स्थिराश्रया स्वाश्रये विशेषमाधत्ते, प्रथममगृहीतार्थस्य पुनः पुनरभ्यस्यमानस्य ग्रहणदर्शनात् ।
तस्याः पूर्वपूर्वाभ्यासाहिताधिकाधिकोत्तरोत्तरविशेषाधानक्रमेण दीर्घकालादरनैरन्तर्येण
सेविताया योगजधर्मानुग्रहसमासादितशक्तेः प्रकर्षपर्यन्तप्राप्तिर्नानुपपत्तिमती ।
यत् पुनरुक्तम्, योगिनोऽतीन्द्रियार्थद्रष्टारो न भवन्ति, प्राणित्वात्, अस्मदादिवत्;
तद्यदि पुरुषमात्रं पक्षीकृत्योक्तं तदा सिद्धसाधनम्, पुरुषविशेषश्च परस्यासिद्धः, सिद्धिश्चे-
र्धर्मिग्राहकप्रमाणविरुद्धमनुमानम् ।
अथोच्यते—प्रसङ्गसाधनमिदम्, प्रसङ्गसाधनं च न स्वपक्षसाधनायोपादीयते,
किन्तु परस्यानिष्टापादनार्थम् । परानिष्टं च तदभ्युपगमसिद्धैरेव धर्मादिभिः
तक हो सकता है । जैसे सुवर्ण में पुटपाक से आनेवाली शुद्धता स्वर्ण के पूर्ण रक्त
वर्ण होने तक जाती है । जल की गर्मी का कोई स्थिर आश्रय नहीं है, जहाँ किया
गया उसका अभ्यास चरम सीमा तक हो सके; क्योंकि अत्यन्त ताप के बाद तो
जल का नाश ही हो जाता है । इसी तरह लङ्घन के अभ्यास में भी वह सामर्थ्य
नहीं है, जिससे कि कूदनेवाले में कूदने की विशेष क्षमता को उत्पन्न कर सके,
क्योंकि एक लङ्घन के पूर्ण विनष्ट हो जाने पर ही दूसरे लङ्घन की उत्पत्ति दूसरे
बल और प्रयत्न से होती है । यही कारण है कि तीन-चार बार कूदने के बाद
कूदनेवाले का सामर्थ्य घट जाने के कारण आगे का कूदना कुछ न्यून ही हो जाता
है; किन्तु बुद्धि का आश्रय तो स्थिर है, अतः अभ्यास के द्वारा अपने आश्रय में
वह 'विशेष' का आधान कर सकती है, क्योंकि देखा जाता है कि जो विषय पूर्ण
अज्ञात रहता है, अभ्यास से उसका भी विशेष प्रकार का ज्ञान होता है । अतः
योगजनित धर्म के अनुग्रह से विशेष शक्तिशालीनी बुद्धि के प्रकर्ष की अत्यन्त
उत्कृष्ट परिणति होने में कोई बाधा नहीं है; क्योंकि वह उसके पहले-पहले के
अभ्यास से आगे-आगे के ज्ञानों में विशेष का आधान करती रहती है, यदि बहुत
दिनों तक बिना बीच में छोड़े हुए आदरपूर्वक उसकी सेवा की जाय ।
जो सम्प्रदाय (मीमांसक लोग) यह अनुमान उपस्थित करते हैं कि (प्र.) योगीगण
भी हमलोगों की तरह प्राणी हैं, अतः वे भी अतीन्द्रिय विषयों को नहीं देख सकते ।
(उ.) उनसे इस प्रसङ्ग में पूछना है कि इस अनुमान में सभी पुरुष पक्ष हैं या विशेष
प्रकार के पुरुष ? यदि सभी पुरुषों को पक्ष करें तो उक्त अनुमान में सिद्धसाधन