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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४५५

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४५५
न्यायकन्दली
क्षणिकत्वेनासाधारणतया चाशक्यसङ्केतयोः शब्देन संस्रष्टुमयोग्यत्वात्, विषयवाचिना
शब्देन विषयिणो ज्ञानस्य तद्व्यतिरिक्तस्य व्यपदेशाभावाच्च। अथ मन्यसे विकल्पः
शब्दसंसृष्टार्थविषयः, स चार्थः संसृज्य शब्देन व्यपदिश्यते च। (यत्र शब्दस्य सङ्केतः) तत्र
च शब्दस्य सङ्केतो यदक्षणिकं साधारणं च, न च स्वलक्षणं स्वलक्षणविषयो वा बोधो
बोधविषयश्चाकारः साधारणोऽक्षणिकश्च भवति। बोधाकारस्य बाह्यत्वमपि बोधा-
कारादनन्यदसाधारणमेव। सामान्यं च वस्तुभूतं नास्ति, विचारासहत्वात्। तस्मात्
प्रत्येकं विकल्पैर्बाह्यात्वेनारोपितेषु स्वाकारेषु परस्परभेदानध्यवसायादनन्यव्यावृत्तयैकत्वे
समारोपिते शब्दस्य सङ्केत इति प्रमाणबलादायातमवर्जनीयम्। तत्र चालीके शब्दसंसर्गाति
विकल्पः प्रवर्त्तमानोऽसन्तमर्थं विकल्पयतीति कल्पनाज्ञानमिति। यथोक्तम्-
अतः प्रतीति और उसका आकार दोनों का शब्द के साथ सङ्केत नहीं हो सकता ।
अतः प्रतीति में (सङ्केत सम्बन्ध से) शब्द में सम्बद्ध होने की योग्यता नहीं है । एवं
घटादि विषयों के वाचक घटादि शब्द के द्वारा घटादि विषयों से भिन्न घटादि
अर्थविषयक ज्ञान का प्रतिपादन भी सम्भव नहीं है (क्योंकि विषय और विषयी
दोनों परस्पर विरुद्ध स्वभाव के हैं) । यदि यह मानते हों कि (प्र.) शब्द से
सम्बद्ध अर्थ ही सविकल्पक ज्ञान का विषय है और वह अर्थ शब्द के साथ
सम्बद्ध होकर ही व्यवहार में आता है । (उ.) शब्द का सङ्केत (रूप सम्बन्ध) उसी
के साथ होता है, जो अक्षणिक (अनेक क्षणों तक रहने वाला) तथा साधारण
(अनेक पुरुषों से गृहीत होनेवाला) हो । कोई भी स्वलक्षण (अर्थात् विज्ञान)
अथवा स्वलक्षण का विषय या उसका आकार बौद्धों के मत से अक्षणिक और
साधारण नहीं है । बोध के आकार में (बाह्यत्व की कल्पना कर उस कल्पित
आकार को साधारण मान कर भी काम नहीं चलाया जा सकता क्योंकि) वह
कल्पित बाह्यत्व भी बोध के आकार से अभिन्न होने के कारण असाधारण ही
होगा (साधारण नहीं) सामान्य नाम का कोई भाव पदार्थ विचार से बहिर्भूत होने
के कारण है ही नहीं । अतः यही मानना पड़ेगा कि विकल्प (विज्ञान) के
द्वारा उसके आकारों में बाह्यत्व की कल्पना की जाती है, किन्तु परस्पर विभिन्न
उन आकारों का भेद अज्ञात ही रहता है, इस अज्ञान के कारण ही उन आकारों
में एकत्व का आरोप होता है । इन प्रमाणों के बल पर यही कहना पड़ता है कि
इसी एकत्व के अधिष्ठानभूत वस्तु में शब्द का सङ्केत है,फलतः जिसमें शब्द का
संकेत है, वह अलीक है, और उसी असत् अर्थ में सविकल्पक ज्ञान प्रवृत्त होकर
उसे निश्चित करता है । इस प्रकार (सविकल्पक) ज्ञान कल्पनारूप है ।
जैसा कहा गया है कि 'कल्पना रूप ज्ञान में जो रूप बाह्य एक वस्तु की तरह
एवं दूसरों से भिन्न की तरह भासित होता है, वह परीक्षा करने पर उन रूपों

४५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष-
न्यायकन्दली
तस्यां यद्रूपमाभाति बाह्यमेकमिवान्यतः ।
व्यावृत्तमिव निस्तत्त्वं परीक्षानङ्गभावतः ॥ इति ।
अत्रोच्यते-यदि सामान्यस्य वस्तुभूतस्याभावात् तद्विशिष्टग्राहिता कल्पनात्वम्, तर्ह्यसदर्थ-
तैव कल्पनात्वं न शब्दसंसृष्टार्थग्राहिता । तत्र यदि शक्ष्यामः प्रमाणेन सामान्यमुपपादयितुं
तदा सत्यपि शब्दसंसृष्टग्राहकत्वे तद्विषयं विकल्पज्ञानमिन्द्रियार्थजत्वात् प्रत्यक्षमेव स्यात् ।
यदपरोक्षावभासि तत् प्रत्यक्षं यथा निर्विकल्पकम्, अपरोक्षावभासि च विकल्पज्ञानम् ।
इह ज्ञानानां परोक्षत्वमनिन्द्रियार्थजत्वेन व्याप्तं यथानुमाने, अनिन्द्रियार्थजत्वविरुद्धं चेन्द्रि-
से भिन्न ठहरता है, अतः (कल्पना ज्ञान में विषयीभूत वह विशेष प्रकार का) अर्थ
निस्तत्त्व है (असत्) है ।
(उ.) (सविकल्पक ज्ञान कल्पना रूप होने के कारण प्रमाण नहीं है) इस
प्रसङ्ग में सिद्धान्तियों का कहना है कि सामान्य (जाति) नाम का कोई भाव पदार्थ
बौद्धों के मत में नहीं है और सामान्य से युक्त अर्थ का ग्राहक होने के कारण ही
सविकल्पक ज्ञान कल्पना (भ्रम) है, तो फिर यही कहिये कि असत् अर्थ को
ग्रहण करने के कारण ही सविकल्पक ज्ञान कल्पना (भ्रम) है । यह क्यों कहते हैं
कि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का ग्राहक होने के कारण सविकल्पक ज्ञान भ्रम है । इस
प्रकार यह निश्चित होता है कि सविकल्पक ज्ञान चूँकि असत् अर्थ का प्रकाशक है,
इसीलिए वह 'कल्पना' है । इसलिए वह 'कल्पना' नहीं है कि शब्द से सम्बद्ध
अर्थ का प्रकाशक है । (ऐसी स्थिति में) यदि प्रमाण के द्वारा सामान्य नाम के
भाव पदार्थ की सत्ता का हम लोग प्रमाण के द्वारा प्रतिपादन कर सकें, एवं
सविकल्पक ज्ञान यदि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का प्रकाशक भी हो; किन्तु इन्द्रिय
और अर्थ (के संनिकर्ष) से उसकी उत्पत्ति हो, तो फिर इस इन्द्रियार्थजत्व रूप हेतु
से उसमें प्रत्यक्षत्व की सिद्धि की जा सकती है । (इस प्रसङ्ग के दृष्टान्त में साध्य
का साधक यह अनुमान है) कि निर्विकल्पक ज्ञान की तरह जितने भी अपरोक्ष
की तरह विषयों के भासक ज्ञान हैं, वे सभी प्रत्यक्ष होते हैं, अतः सविकल्पक
ज्ञान भी अपरोक्षावभासि होने के कारण प्रत्यक्ष है । (इस अनुमान में) यह
'व्यापकविरुद्धोपलब्धि' अर्थात् व्यतिरेकव्याप्ति भी हेतु है कि अनुमान की तरह
जितने भी ज्ञान बिना इन्द्रिय के उत्पन्न होते हैं, वे सभी परोक्ष ही होते हैं । इन्द्रिय
और अर्थ से उत्पन्न होना (इन्द्रियार्थजत्व) एवं इन्द्रिय से भिन्न कारणों से उत्पन्न
होना (अनिन्द्रियार्थजन्यत्व) ये दोनों परस्पर विरोधी हैं । अनिन्द्रियार्थजत्व का
विरोधी यह इन्द्रियार्थजत्व निर्विकल्पक ज्ञान में है (जो कि दोनों के मत से
प्रत्यक्ष है,,अतः इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न सविकल्पक ज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण
है) । (प्र.) (उक्त अनुमान के) विपक्ष में यह विरोधी अनुमान भी प्रस्तुत किया
जा सकता है कि जिस प्रकार अनुमान रूप ज्ञान की उत्पत्ति में स्मृति की अपेक्षा