वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०३
प्रशस्तपादभाष्यम्
काले दिक्पिण्डसंयोगविनाशाद् गुणस्य विनाशः ।
द्रव्यविनाशादपि कथम् परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्नं यस्मिन्नेव
कालेऽवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षा-
भूत द्रव्य इन दोनों के) संयोग के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश
होता है ।
३. (प्र.) (आधारभूत) द्रव्य के विनाश से (परत्वादि गुणों का)
विनाश किस प्रकार (किस स्थिति में) होता है ? (उ.) (जहाँ)
परत्वादिगुणों के आधारभूत द्रव्य (के एक अवयव) में उत्पन्न हुई क्रिया
जिस समय एक अवयव का दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है,
न्यायकन्दली
बुद्धेश्च परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । तत उत्पन्ने परत्वे परत्वसामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः
दिक्पिण्डसंयोगस्य च विभागाद् विनाश इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले
सामान्यज्ञानाद् गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव काले दिक्पिण्डसंयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशो
नापेक्षाबुद्धिविनाशात्, अपेक्षाबुद्धेरपि तदानीमेव विनाशात् ।
द्रव्यविनाशादपि कथं विनाश इत्याह-परत्वाधारावयव इति । भविष्यतः
परत्वस्याधारो द्रव्यम्, तस्यावयवे कर्मोत्पन्नं यदाऽवयवान्तराद् विभागं करोति,
तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले
द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वमुत्पद्यते । ततः
एवं अपेक्षाबुद्धि के द्वारा परत्व की उत्पत्ति होती है । इतने सारे काम एक ही
समय होते हैं । इसके बाद जिस समय (परत्वगत जातिरूप) सामान्य के ज्ञान से
गुणविशिष्टद्रव्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय दिशा और
(परत्व के आधारभूत द्रव्य रूप) पिण्ड इन दोनों के संयोग के विनाश से परत्व
का भी विनाश होता है । (यहाँ) परत्व का विनाश अपेक्षाबुद्धि के विनाश से
सम्भव नहीं है, क्योंकि उसी समय (परत्वनाश के समय ही) अपेक्षाबुद्धि का भी
विनाश होता है ।
(३) (आधारभूत) द्रव्य के विनाश से परत्वादि का विनाश किस प्रकार होता है ?
इस प्रश्न का उत्तर 'परत्वाधारावयवे' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । उत्पन्न होनेवाले
परत्व के आधारभूत अवयवि द्रव्य ही (प्रकृत में 'परत्वाधार' शब्द से इष्ट है) इस (द्रव्य)
के अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय (अपने आधारभूत एक अवयव द्रव्य
का) दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि भी उत्पन्न
होती है । इसके बाद जिस समय विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश
४०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धिरुत्पद्यते । ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले
परत्वमुत्पद्यते । ततः संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितस्य
गुणस्य विनाशः ।
द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदा परत्वाधारावयवे
इसके बाद जिस समय उक्त विभाग के द्वारा परत्वादि के आधारभूत
द्रव्य के उत्पादक दोनों अवयवों के संयोग का नाश होता है, उसी समय
परत्वादि गुणों की उत्पत्ति भी होती है । इसके बाद (उक्त) संयोग के
विनाश से (परत्वादि के आधारभूत) द्रव्य का नाश होता है, एवं द्रव्य
के विनाश से उसमें रहनेवाले परत्वादि गुणों का भी नाश हो जाता है ।
४. एक ही समय (परत्वादि के आधारभूत) द्रव्य और अपेक्षाबुद्धि
इन दोनों के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश (कहाँ और किस
न्यायकन्दली
संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः । ततो द्रव्यविनाशात् तदाश्रितस्य गुणस्य विनाशः ।
तदानीमेव परत्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशः, आश्रयविनाशाच्च दिक्पिण्डसंयोगविनाश
इत्यनयोर्न हेतुत्वं सहभावित्वात् ।
द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्युगपद्विनाशादपि कथम् । यदैव परत्वाधारावयवे
कर्मोत्पद्यते, तदैवापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते । कर्मणा चावयवान्तराद्विभागः क्रियते, परत्व-
स्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्यारम्भक-
होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि के द्वारा परत्व की भी उत्पत्ति होती है । इसके बाद
उक्त संयोग के विनाश से (अवयवि) द्रव्य का विनाश होता है । चूँकि परत्वगुण में
रहनेवाले सामान्य के ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि का विनाश एवं (उक्त अवयवी रूप)
आश्रय के विनाश से दिशा और पिण्ड के संयोग का विनाश, ये दोनों भी उसी
समय उत्पन्न होते हैं, अतः (परत्व के विनाशक रूप में कथित होने पर भी) ये
दोनों प्रकृत में परत्वादि के विनाशक नहीं हो सकते ।
(४) एक ही समय उत्पन्न होनेवाले द्रव्य का विनाश, और अपेक्षा बुद्धि का
विनाश इन दोनों से किस प्रकार परत्वादि का विनाश होता है ? 'द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योः'
इत्यादि से इस प्रश्न का उपपादन किया गया है, एवं 'यदैव परत्वाधारावयवे'
इत्यादि से उसके समाधान का उपपादन हुआ है । (जहाँ) जिस समय परत्व के