वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७३
प्रशस्तपादभाष्यम्
मवयवान्तराद् विभागमकुर्वदाकाशादिदेशेभ्यो विभागानारभ्य प्रदेशान्तरे
संयोगानारभते, तदा ते कारणाकारणविभागाः, कर्म यां दिशं प्रति कार्या-
रम्भाभिमुखं तामपेक्ष्य कार्यकार्याकार्यविभागानारभन्ते तदनन्तरं कारणाकारण-
संयोगाच्च कार्याकार्यसंयोगानिति ।
हुई क्रिया शरीर के दूसरे अवयवों से विभाग को उत्पन्न करती हुई
आकाशादि देशों के साथ विभागों को उत्पन्न करने के बाद (उत्तर देश)
संयोगों को उत्पन्न करती है, उस समय के वे विभाग (शरीर के) कारण
(अवयव) और (शरीर के) अकारण के विभाग हैं। क्रिया जिस दिशा
में (उत्तरसंयोगरूप) कार्य को करने के लिए उत्सुक रहती है, उसी दिशा
के साहाय्य से वे (कारण और अकारण के विभाग) कार्य और अकार्य
के विभागों को उत्पन्न करते हैं। इसके बाद (वे ही कारण और
अकारण के विभाग) कारणों और अकारणों के संयोगों के साहाय्य से
उन कारणों से उत्पन्न कार्य द्रव्यों और उनसे अनुत्पन्न अकार्य द्रव्यों में
संयोगों को उत्पन्न करते हैं।
न्यायकन्दली
उत्तरमाह- यदेत्यादिना । हस्ते कुतश्चित् कारणात् कर्मोत्पन्नं तस्य हस्तस्यावयवान्तराद् विभाग-
मकुर्वदाकाशादिदेशेभ्यो विभागानारभ्य प्रदेशान्तरैः सह यदा संयोगानारभते तदा ते कारणा-
कारणविभागाः शरीरकारणस्य हस्तस्याकारणानामाकाशादिदेशानां विभागाः, कर्म च यस्यां
दिशि कार्यारम्भाभिमुखं कर्मणा यत्रोत्तरसंयोगो जनयितव्यः, तां दिशमपेक्ष्य, कार्याकार्य-
विभागान् हस्तकार्यस्य शरीरस्याकार्याणामाकाशादिदेशानां विभागानारभन्ते । यतः
कुड्यादिदेशाद्धस्तस्य विभागः, ततः शरीरस्यापि विभागो दृश्यते । न चायं शरीरक्रियाकार्यः,
द्वारा प्रश्न किया गया है । 'यदा' इत्यादि सन्दर्भ से उक्त प्रश्न का उत्तर
देते हैं । हाथ में जिस किसी कारण से उत्पन्न हुई क्रिया शरीर के अवयवों में
विभागों को उत्पन्न न कर, जिस समय हाथ में आकाशादि (पूर्व) देशों के साथ
विभागों को उत्पन्न कर, उत्तर प्रदेशों के साथ हाथ के संयोग का उत्पादन करती
है, उस समय के वे (हाथ का आकाशादि पूर्वदेशों से) विभाग
'कारणाकारणविभाग' है, अर्थात् शरीर के 'कारण' हाथ और 'अकारणीभूत'
आकाशादि प्रदेश, इन दोनों के विभाग हैं । क्रिया जिस दिशा में कार्य को उत्पन्न
करने को उत्सुक रहती है, अर्थात् क्रिया से जिस देश में उत्तर संयोग उत्पन्न होता
है, उस दिशा के साहाय्य से ही क्रिया, कार्य और अकार्य के, अर्थात्
हाथ के कार्य शरीर का उसके अकार्य आकाशादि प्रदेशों के साथ विभागों
को उत्पन्न करती है । चूँकि दीवाल प्रभृति देशों से हाथ का विभाग होने पर
३७४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
न्यायकन्दली
तदानीं शरीरस्य निष्क्रियत्वात् । नापि हस्तक्रियाकार्यो भवितुमर्हति, व्यधिकरणस्य
कर्मणो विभागहेतुत्वादर्शनात् । अतः कारणाकारणविभागस्तस्य कारणमिति कल्प्यते ।
आकाशादावित्यादिपदं समस्तविभुद्रव्यावरोधार्थम् । अत एव विभागानिति बहुवचनम्,
तद्विभागानां बहुत्वात् ।
अत्राहुरेके-कुड्यादिदेशाद्धस्तशरीरविभागयोर्युगपद्भावप्रतीतेस्तयोः कार्यकारणभावा-
भिधानं प्रत्यक्षविरुद्धमिति । तदसङ्गतम्, हस्तविभागकाले शरीरविभागोत्पत्तिकारणा-
भावात् । न चासति कारणे कार्योत्पत्तिरस्ति, हस्तक्रिया च न कारणमित्युक्तम् । तस्मात्
तयोर्युगपदभिमानो भ्रान्तः ।
अनुमानगम्यः क्रमभावः, प्रत्यक्षसिद्धं च यौगपद्यम्, प्रत्यक्षे च परिपन्थि-
न्यनुमानस्योत्पत्तिरेव नास्ति, अबाधितविषयत्वाभावात् । कथं तदनुरोधात्
प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमिति चेत् ? उत्पलपत्रशतव्यतिभेदेऽपि कुतोऽनुमानप्रवृत्तिः ?
प्रत्यक्षविरोधात् । अथ मन्यसे तत्र प्रत्यक्षविरोधादनुमानं नोदेति, यत्रानेन
शरीर का भी उससे विभाग देखा जाता है । यह (शरीर और दीवाल का विभाग
शरीर की) क्रिया से उत्पन्न नहीं होता है; क्योंकि शरीर उस समय निष्क्रिय रहता
है । हाथ की क्रिया से वह (शरीर और दीवाल का) विभाग उत्पन्न नहीं हो
सकता; क्योंकि एक आश्रय में रहनेवाली क्रिया से उस आश्रयरूप देश से भिन्न
देशों में विभाग की उत्पत्ति नहीं देखी जाती है । अतः यह कल्पना करते हैं कि
(शरीर के) कारण हाथ और अकारणीभूत प्रदेशों का विभाग ही उस विभाग
का कारण है । 'आकाशादि' शब्द में प्रयुक्त 'आदि' शब्द सभी विभु द्रव्यों का
संग्राहक है । इसी कारण 'विभागान्' यह बहुवचनान्त प्रयोग भी है; क्योंकि उनके
विभाग भी बहुत हैं ।
इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि (प्र.) दीवाल प्रभृति देशों की, हाथ और
शरीर दोनों के साथ, दोनों विभागों की प्रतीति एक ही समय होती है । अतः उन
दोनों विभागों में से एक को कारण मानना और दूसरे को कार्य मानना प्रत्यक्ष के
विरुद्ध है । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि जिस समय दीवाल से हाथ का
विभाग उत्पन्न होता है, उस समय दीवाल से शरीर के विभाग की उत्पत्ति होने का
कारण नहीं रहता है । कारणों के न रहने से कार्यों की उत्पत्ति सम्भव नहीं है ।
पहले कह चुके हैं कि हाथ की क्रिया उस (दीवाल और शरीर के विभाग) का
कारण नहीं है । अतः यह कहना भ्रान्त, अभिमान (मूलक) ही है कि हाथ एवं
शरीर दोनों से (दीवाल प्रभृति के) एक ही समय दो विभाग उत्पन्न होते हैं ।
(प्र.) उक्त दोनों विभागों का एक समय में उत्पन्न होना प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है
एवं उन दोनों विभागों का क्रमशः उत्पन्न होना अनुमान से सिद्ध होता है । प्रत्यक्ष से
विरुद्ध अनुमान की उत्पत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि अनुमान के विषय का प्रत्यक्ष के द्वारा
बाधित न होना आवश्यक है । तो फिर अयौगपद्य के अनुमान से यौगपद्य के प्रत्यक्ष