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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३
प्रशस्तपादभाष्यम्
पृथक्त्वमप्यत एव । तथा चात्मेति वचनात् परममहत्परिमाणम् ।
चाहिए । यतः आत्मा में संख्या है, अतः पृथक्त्व भी अवश्य ही है ।
वैभव सूत्र (७।१।२२) में प्रयुक्त 'तथा चात्मा' इस उक्ति से आत्मा में
परममहत्परिमाण गुण का रहना भी महर्षि का अभिप्रेत समझना चाहिए ।
न्यायकन्दली
अभेदश्रुतयस्तु गौणार्था इति दिक् । न च नानात्वपक्षे सर्वेषां क्रमेण मुक्तावन्ते
संसारोच्छेदः, अपरिमितानामन्त्यन्यूनारिक्तत्वायोगात् । यदाहुर्वार्त्तिककारमिश्राः -
अत एव च विद्वत्सु मुच्यमानेषु सन्ततम् ।
ब्रह्माण्डलोके जीवानामनन्तत्वादशून्यता ॥
अन्त्यन्यूनारिक्तत्वे युज्यते परिमाणवत् ।
वस्तुन्यपरिमेये तु नूनं तेषामसम्भवः ॥ इति ।
पृथक्त्वमप्यत एव । "नानात्मानो व्यवस्थातः" इति वचनादेव पृथक्त्वं सिद्धम्, सङ्ख्या-
नुविधायित्वात्पृथक्त्वस्येत्यभिप्रायः । तथाचात्मेति वचनात्परममहत्परिमाणमिति। "विभववान्
महानाकाशस्तथा चात्मा" इति सूत्रकारवचनादाकाशवदात्मनोऽपि विभुत्वात् परममहत्परिमाणं
सिद्धमित्यर्थः । विभुत्वञ्चात्मनो वहेरूद्ध्र्वज्वलनाद् वायोस्तिर्यग्गमनादवगतम् । ते ह्यदृष्ट-
व्यवस्था की उक्त अनुपपत्ति रहेगी ही, अतः "नानात्मानो व्यवस्थातः" सूत्रकार
की यह उक्ति ठीक है । जीव और ब्रह्म में अभेद को प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ
गौण हैं । जीव को नाना मान लेने से इसका भी समाधान हो जाता है कि 'सभी
आत्माओं के मुक्त हो जाने पर अन्त में संसार का ही लोप हो जायगा'; क्योंकि
'अपरिमित' अर्थात् अनन्त वस्तुओं में अन्तिम, न्यूनत्व, अधिकत्व प्रभृति की चर्चा
ही नहीं उठती है । जैसा वार्त्तिककार मिश्र ने कहा है कि यतः जीव अनन्त हैं,
अतः बराबर ज्ञानी जीवों को मुक्त होते रहने पर भी यह संसार जीवों से शून्य
नहीं होता है । अन्तिम, न्यून और अधिक ये सभी बातें परिमित वस्तुओं की हैं,
अपरिमित वस्तुओं में ये सभी बातें असम्भव हैं ।
आत्मा में पृथक्त्व नाम के गुण की भी सिद्धि समझनी चाहिए; क्योंकि जहाँ पर
संख्या रहेगी वहाँ पर पृथक्त्व भी अवश्य ही रहेगा । "तथा चात्मा" (७।१।२२) वैभव
सूत्र में प्रयुक्त सूत्रकार की इस उक्ति से विभुत्व हेतु से आत्मा में भी आकाश की
तरह परममहत्परिमाण की सिद्धि होती है । आत्मा का विभुत्व आग की ऊर्ध्वगति
और वायु की कुटिल गति से समझते हैं; क्योंकि वे दोनों ही अदृष्टकृत हैं । उन गतियों

२१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये आत्म-
न्याय्कन्दली
कारिते । न च तदाश्रयेणासम्बद्धमदृष्टं तयोः कारणं भवितुमर्हति, अतिप्रसङ्गात् । न
चात्मसमवेतस्यादृष्टस्य साक्षाद् द्रव्यान्तरसम्बन्धो घटत इति स्वाश्रयसम्बन्धद्वारेण तस्य
सम्बन्ध इत्यायातम् । ततः समस्तमूर्त्तद्रव्यसम्बन्धलक्षणमात्मनो विभुत्वं सिद्ध्यति ।
स्वभावत एव वह्नेरूर्ध्वज्वलनं नादृष्टादिति चेत् ? कोऽयं स्वभावो नाम ? यदि
वह्नित्वमुत दाहकत्वम् ? रूपविशेषो वा ? तप्तायःपिण्डे वह्नेरपि स्यात् ।
अथेन्धनविशेषप्रभवत्वं स्वभाव इति ? अनिन्धनप्रभवस्य विद्युदादिप्रभवस्य चौर्ध्वज्वलनं
न स्यात् । अथातीन्द्रियः कोऽपि स्वभावः कासुचिद् व्यक्तिष्वस्ति यासामूर्ध्वज्वलनं दृश्यत
इति, पुरुषगुणे कः प्रद्वेषः ? यस्य कर्म्मणो गुरुत्वद्रवत्ववेगा न कारणं तस्यात्मविशेष-
गुणादुत्पादः, यथा पाणिकर्म्मणः पुरुषप्रयत्नात्, ऊर्ध्वज्वलनतिर्यक्पवनादीनां कर्म्मणां
गुरुत्वादयो न कारणमभावात्, तत्कार्य्यविपरीतत्वाच्च । तस्मादेषामप्यात्मविशेष-
के आश्रयों में असम्बद्ध अदृष्ट उनके कारण नहीं हो सकते; क्योंकि ऐसा मानने
से अतिप्रसङ्ग होगा । एवं आत्मा में समवाय-सम्बन्ध से रहने के कारण अदृष्ट का
बाह्य वस्तुओं के साथ कोई भी साक्षात् सम्बन्ध नहीं हो सकता है, अतः यही
मानना पड़ेगा कि अदृष्ट के आश्रय आत्मा के साथ वह्निप्रभृति के सम्बन्ध होते
हैं । इस प्रकार तद्गत अदृष्ट के साथ भी उनका परम्परा सम्बन्ध होता है । अतः
मूर्त्त द्रव्यों के साथ आत्मा का सम्बन्ध अवश्य है और सभी मूर्त्त द्रव्यों के साथ
सम्बन्ध ही 'विभुत्व' है । (प्र.) 'स्वभाव' से ही वह्नि ऊपर की ओर जलती है,
इसमें अदृष्ट कारण नहीं है । (उ.) 'स्वभाव' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है ? 'स्व'
वह्नि का जो 'भाव' अर्थात् धर्म वह तो (१) वह्नित्व, (२) दाहकत्व और (३)
विशेष प्रकार का रूप ये तीन ही हैं, 'स्वभाव' शब्द से इन तीनों धर्मों को कारण
मानने से तपे हुए लोहे का भी ऊर्ध्वज्वलन मानना पड़ेगा; क्योंकि उसमें भी
स्वभाव शब्द के उक्त तीनों अर्थ हैं । (प्र.) लकड़ी की आग ही ऊपर की तरफ
जलती है, अतः वह्नि का लकड़ी से उत्पन्न होना ही ऊर्ध्वज्वलन का कारणीभूत
'स्वभाव' है । (उ.) फिर इन्धन के बिना ही उत्पन्न विद्युत् प्रभृति वह्नि का
ऊर्ध्वज्वलन नहीं होगा । अगर किसी वह्नि में कोई ऐसा अतीन्द्रिय सामर्थ्य मानते
हैं, जिससे उसी वह्नि में ऊर्ध्वज्वलन होता. है, तो फिर जीव के अतीन्द्रिय धर्म
रूप अदृष्ट को ही अगर ऊर्ध्वज्वलन का कारण मानते हैं, तो आपको क्यों जलन
होती है ? जिस क्रिया का कारण गुरुत्व, द्रवत्व और वेग नहीं है, वह क्रिया
आत्मा के विशेष गुण से ही उत्पन्न होती है, जैसे कि पुरुष के प्रयत्न से उत्पन्न हाथ
की क्रिया । गुरुत्व, द्रवत्व या वेग वह्नि के ऊर्ध्वज्वलन या वायु की कुटिलगति
रूप क्रिया के कारण नहीं हैं; योंकि वे वहाँ नहीं हैं एवं उनसे होनेवाली क्रियायें भी