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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पादाचार्य कृत 'पदार्थधर्मसंग्रह' नाम का वैशेषिक भाष्य । इन पुस्तकों का संशोधन

२ प्रशस्तपादभाष्यम्
डॉ. श्री गङ्गानाथ झा जी ने बहुत संस्कृत ग्रन्थों का अनुवाद किया था और
(२) गुरु जी के अनुवादों के कारण हमारे देश में और विदेशों में भारतीय दर्शन
का ज्ञान पर्याप्त मात्रा में फैला ।
इस ग्रन्थमाला का प्रथम पुष्प है श्रीधरकृत "न्यायकन्दली" टीका सहित प्रशस्त-
पादाचार्य कृत 'पदार्थधर्मसंग्रह' नाम का वैशेषिक भाष्य । इन पुस्तकों का संशोधन
और अनुवाद विश्वविद्यालय के अनुसन्धान सहायक न्यायाचार्य श्री दुर्गाधर झा ने
किया है । "पदार्थधर्मसंग्रह" वैशेषिक शास्त्र में एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है, कणादकृत
वैशेषिक सूत्रों की क्रमिक व्याख्या नहीं । यह ग्रन्थ इतना प्रामाणिक समझा गया
कि इसके आगे सूत्र का प्रचार कम हो गया । पदार्थधर्मसंग्रह के ऊपर विद्वानों ने
टीकायें लिखीं । ऐसी तीन टीकायें बहुत प्रसिद्ध हैं-श्रीधरकृत 'न्यायकन्दली',
उदयनकृत 'किरणावली' और व्योमशिवाचार्यकृत 'व्योमवती' । इनमें 'न्याय-
कन्दली', ग्रन्थ लगाने की दृष्टि से सर्वोत्तम है । इस कारण से इस टीका का और
उसके अनुवाद का यहाँ समावेश किया गया है ।
आगे इस ग्रन्थमाला में उदयनकृत 'न्यायकुसुमाञ्जलि' (गद्य और पद्य) और
अन्य ग्रन्थों का प्रकाशन होगा । दर्शन शास्त्र के अतिरिक्त अन्य शास्त्रों के भी
ग्रन्थ प्रकाशित किये जायेंगे ।
१४-१२-१९६३ क्षेत्रेशचन्द्र चट्टोपाध्याय

भूमिका
[ प्रथम संस्करण की ]
न्यायकन्दली सहित प्रशस्तपादभाष्य का हिन्दी अनुवाद तथा टिप्पणियों के
साथ पण्डितों के समक्ष उपस्थित करते हुए मुझे विशेष हर्ष हो रहा है। हर्ष दो
कारणों से है- (१) वर्तमानकाल में दुर्लभ इस टीका के साथ प्रशस्तपादभाष्य की
पुस्तक मूल संस्कृत पुस्तकों के चाहनेवालों के लिए सुलभ हो जायगी । (२) एवं
प्रशस्तपादभाष्य और न्यायकन्दली का अर्थ हिन्दी संसार के सामने स्पष्ट हो
जायगा ।
पुस्तक का सम्पादक हो या अनुवादक, सब के लिए यह अलिखित कर्त्तव्य
निर्दिष्ट-सा हो गया है कि पुस्तक के साथ वह कोई भूमिका अवश्य लिखे ।
तदनुसार मैं भी एक भूमिका लिख रहा हूँ ।
शास्त्रों के ज्ञान-लाभ करने के लिए पद और पदार्थों का सम्यक् ज्ञान
आवश्यक है । इनमें पद-ज्ञान के लिए जिस प्रकार व्याकरणशास्त्र की शरण लेना
अनिवार्य है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान के लिए कणादनिर्मित इस दर्शन की भी
आवश्यकता है । वैशेषिकदर्शन की इस आवश्यकता को "काणादं पाणिनीयञ्च
सर्वशास्त्रोपकारकम्" इत्यादि उक्तियाँ भी समर्थन करती हैं। अतएव वैशेषिक-
दर्शन की उपादेयता में तो कोई सन्देह ही नहीं है ।
वैशेषिकदर्शन और इसके सूत्र
इसके तीन नाम अधिक प्रसिद्ध हैं-(१) वैशेषिकदर्शन, (२) औलूक्यदर्शन
और (३) काणाददर्शन ।
इनमें 'वैशेषिक' नाम के प्रसङ्ग में ६ प्रकार की युक्तियाँ प्रचलित हैं-(१)
'अन्यत्र अन्त्येभ्यो विशेषेभ्यः' (१।२।६) इस सूत्र के अनुसार 'अन्त्य' विशेष पदार्थ
के साथ सम्बद्ध जो 'दर्शन' वही 'वैशेषिकदर्शन' है; क्योंकि दूसरे किसी भी दर्शन
में इस प्रकार का 'विशेष' पदार्थ स्वीकृत नहीं है । अतः 'विशेष' रूप स्वतन्त्र
पदार्थ के निरूपण के द्वारा यह अन्य दर्शनों से अलग समझा जा सकता है । अतः
दूसरे दर्शनों से इसको अलग समझानेवाली यह 'वैशेषिकदर्शन' संज्ञा है ।
(२) न्यायदर्शन में दुःखों की पूर्ण निवृत्ति को 'मोक्ष' कहा गया है । इस दर्शन
में आत्मा के सभी विशेष गुणों के पूर्ण विनाश को 'अपवर्ग' माना गया है । अतः
सभी दर्शनों के द्वारा समान प्रतिपाद्य मोक्ष के प्रसङ्ग में यह 'विशेषगुण' का

४ प्रशस्तपादभाष्यम्
अवलम्बन कर उसके मूलतः उच्छेद को 'मुक्ति' माना है, अतः 'विशेष एव
वैशेषिकः' इस स्वार्थिक प्रत्यय के द्वारा निष्पन्न 'वैशेषिक' शब्द के द्वारा मोक्ष के
प्रसङ्ग में इस का उक्त असाधारण्य ही प्रतिपादित होता है, अतः इसका नाम
'वैशेषिकदर्शन' है । फलतः 'विशेष' से, अर्थात् 'विशेषगुण' से मोक्ष के प्रसङ्ग में
जो शास्त्र सम्बद्ध हो वही 'वैशेषिक-दर्शन' है ।
(३) 'विगतः शेषो यस्य तत् विशेषम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार निर्विशेष ही
प्रकृत 'विशेष' शब्द का अर्थ है । 'विशेष एव वैशेषिकम्' इस प्रकार स्वार्थिक
प्रत्यय करके यह 'वैशेषिक' शब्द निष्पन्न है । अर्थात् नैयायिकादि पदार्थों की
षोडशादि संख्याओं को स्वीकार कर प्रमाणादि जिन पदार्थों को स्वीकार किया है,
वे सभी वैशेषिकों से स्वीकृत सात पदार्थों में ही 'निरवशेष' होकर अन्तर्भूत हो
जाते हैं । कोई भी अन्तर्भूत होने से अवशिष्ट नहीं रहते, अतः इस दर्शन का
नाम 'वैशेषिक-दर्शन' है ।
(४) 'विशेषणं विशेषः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार लक्षणपरीक्षादि के क्रम से
पदार्थों का प्रतिपादन ही प्रकृत में 'विशेष' शब्द का अभिप्रेत अर्थ है । उक्त
प्रतिपादन रूप कार्य जिस शास्त्र के द्वारा हो वही 'वैशेषिकदर्शन' है । इस प्रकार
से व्याख्या करनेवालों का अभिप्राय है कि सांख्य, वेदान्तादि दर्शनों में मोक्ष के
लिये साक्षात् उपयोगी आत्मा एवं अन्तःकरणादि पदार्थ और सृष्टितत्त्व प्रभृति ही
विशेष रूप से विवेचित हुए हैं । इससे जगत् के और पदार्थों से तत्त्व यथावत्
परिस्फुट नहीं होते । आत्मतत्त्व को समझने के लिये भी आत्मा के सजातीय और
विजातीय दोनों प्रकार के पदार्थों का ज्ञान आवश्यक है । अतः आत्मा और उनके
सजातीय और विजातीय सभी पदार्थों की ओर 'विशेष' रूप से मुमुक्षुओं की दृष्टि
आकृष्ट करने के कारण ही इस दर्शन का नाम वैशेषिकदर्शन' है ।
(५) प्रकृत 'विशेष' शब्द के 'भेद' और 'विशेष गुण' दोनों ही अर्थ हैं । इन
दोनों अर्थों के साथ सम्बद्ध जो दर्शन वही 'वैशेषिकदर्शन' है । वेदान्तदर्शन के
अनुसार आत्मा में भेद और विशेष गुण ये दोनों ही नहीं हैं । इस दर्शन में
आत्माओं में परस्पर भेद और ज्ञान, इच्छा प्रभृति विशेष गुण दोनों ही स्वीकृत
हैं । सांख्यदर्शन में आत्माओं में परस्पर भेद यद्यपि स्वीकृत है, फिर भी वे आत्मा
में विशेष गुण की सत्ता नहीं मानते । तस्मात् आत्मा में उक्त भेद और विशेष गुण
इन दोनों 'विशेषों' का प्रतिपादन करते हुए महर्षि कणाद ने इस नाम के द्वारा
यह सूचित किया है कि वेदान्त और सांख्यदर्शन से यह दर्शन गतार्थ नहीं है । 1

  1. टिप्पणी-ये पाँच व्युत्पत्तियाँ म. म. विद्वद्वर श्रीयुत कालीपदतर्काचार्य महोदय के द्वारा
    सम्पादित सूक्ति और उनकी टीका के साथ संस्कृतसाहित्यपरिषद् से प्रकाशित
    'प्रशस्तपादभाष्य' की भूमिका से ली गयी हैं । अतः उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ ।