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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

५० मनुस्मृति ।
मन्त्रा नियतं दारलक्षणम् ॥ २२७ ॥ ” “ नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु
नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ॥ ६५ ॥ ” इत्यादि वाक्यों से पुन-
र्विवाह का निषेध किया है। और शास्त्रीय युक्ति भी है कि
जब एक बार कन्याद्रव्य का दान वरको करदिया गया, तब
दाता का पुनः कन्याद्रव्य में अधिकार न रहा, और अधिकारी
वर मृत हो गया तथा अन्यद्रव्य के समान अधिकारी के संवं-
धियों का अधिकार नहीं प्राप्त होता, उस दशा में ‘विधवा’
को देनेलेनेवाला चोर के सिवाय और कौन हो सकता है ?
और-
‘नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतितेऽपतौ ।
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते॥' (४अ. ३०श्लो.)
इस पराशरस्मृति वचन से जो पुनर्विवाह की सिद्धि
करते हैं उनकी बड़ी भूल है; क्योंकि प्रथम तो वैवाहिक श्रुति
(मन्त्र) के साथ उक्त स्मृति का विरोध होता है, जिस के बारे
में भगवान् मनु ने लिखा है कि 'पाणिग्रहणिका मन्त्राः कन्या-
स्वेव प्रतिष्ठिताः' (८ अ. २२६ श्लो. )। दूसरे, गृह्यस्मृतियों
में पुनर्विवाह विधिके न होने से उक्त स्मृति का गृह्यस्मृतियों के
साथ विरोध स्पष्ट है। तीसरे, पतिके पतित होने पर ‘आशुद्धेः
संप्रतीक्ष्यो हि महापातकदूषितः' (आ. ७७ श्लो. ) इस
याज्ञवल्क्य-स्मृति के अनुसार पत्यन्तर की प्राप्ति नहीं होती,
किंतु प्रायश्चित्त करने बाद वही पति व्यवहार्य होता है। अत-
एव यह कहा जा सकता है कि उक्त, स्मृति-वाक्य स्वतन्त्ररूप
१ पति स्त्रीका दाता किसी अवस्था में होता है। जैसे राजा हरिश्चन्द्र...।
२ 'अर्यमणं तु देवं कन्या अग्निमयक्षत' इत्यादि मन्त्र और प्रस्तुतविचार विद्यासुधाकर में स्पष्ट है।

भूमिका । ५१
से 'पुनर्विवाह' अथवा 'नियोग' का विधायक नहीं
हो सकता, किंतु व्यवस्था की अपेक्षा रखता है। जैसा—
वाग्दान के बाद पाणिग्रहण के पहले अपति, अर्थात् पतिभिन्न
पति सदृश वर; यदि लापता हो जाय, वा मर जाय, वा संन्यासी
हो जाय, वा नपुंसक हो जाय, वा महापातक से दूषित हो जाय
इन पांच आपत्तियों में 'च' कार से यदि विकर्मा, वा विरुद्ध-
धर्मा, वा समान गोत्र, वा समान प्रवर ज्ञात होय तो कन्या
दूसरे वर को दी जाय। यही आशय धर्माधिकारि नन्द पण्डित
ने विद्वन्मनोहरा में दिखलाया है ।
नियोगकर्म । यह इन्द्रियदौर्बल्य के कारण कलि में सर्वथा
असंभव है। इसीलिये वृहस्पति ने कहा है—
'उक्ता नियोगा मुनिना निषिद्धाः स्वयमेव तु ।
युगक्रमादशक्योऽयं कर्तुमन्यैर्विधानतः ॥'
इत्यादि ।
और मनु ने भी कहा है—
'अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।'
( ९ अ. ६६ श्लो. )
नियोग कर्म तो दूर रहा, इस समय भी पुनर्विवाह त्रैवर्णिक-
कातिरिक्त शूद्र जाति में हीनदृष्टि से व्यवहार्य है। भले ही
त्रैवर्णिक-महाशय उसकी कोशिश में रहें। और "अक्षमाला
वशिष्ठेन—' ९ । २३ 'अजीगर्तः सुतं हन्तुं—' १० । १०५
१ 'अपति' ऐसा छेद करने से 'उत्पत्स्यमानपतित्ववान्' ऐसी व्याख्या
की आवश्यकता नहीं है और नञ्समास होने से 'अपतौ' की साधुता भी
हो जाती है।
२ देखिये भारत में धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा पाण्डवों की उत्पत्ति के
प्रकरण ।

५२ मनुस्मृति ।
'श्वमांसमिच्छन्–' १० । १०६ 'भरद्वाजः–' १० । १०७
'विश्वामित्रः–' १० । १०८ ।" इत्यादि मनूक्तवृत्तान्त; तथा
तारा, मन्दोदरी, द्रौपदी आदि के कतिपय वृत्तान्त वर्तमान
काल में कथमपि दृष्टान्त बनकर विधेय नहीं होसकते।
यज्ञ और पशु । 'कलिवर्ज्य' के अनुसार अग्निहोत्र
संन्यास आदि कतिपय कर्म कलि में वर्जित हैं तो भी उनका
विधान (प्रतिप्रसववाक्य) प्राप्त होता है—
'यावद्वर्णविभागोऽस्ति यावद्वेदः प्रवर्तते ।
संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत्कुर्यात्कलौयुगे ॥'
अर्थात् जब तक वेद और वर्णविभाग चल रहा है तब
तक अग्निहोत्र और संन्यास का भी चलाना इष्ट है । 'च'
कार से यथासंभव कर्मान्तर और आश्रमान्तर का ग्रहण करना
योग्य है । अतएव यथा कथंचिद् ब्रह्मचर्य, चातुर्मास्य, सोमयाग
आदि कतिपय कर्म कहीं कहीं शिष्टजनों में दिखाई पड़ते हैं
(अकरणान्मन्दकरणं श्रेयः) ।
और जो यह व्यासवचन है—
'चत्वार्यब्दसहस्राणि चत्वार्यब्दशतानि च ।
कलेर्यदा गमिष्यन्ति तदा त्रेतापरिग्रहः ।
संन्यासश्च न कर्तव्यो ब्राह्मणेन विजानता ॥'
कलि के चार हज़ार चार सौ वर्ष व्यतीत होने बाद सुज्ञ
ब्राह्मण, अग्निहोत्र और संन्यास का ग्रहण न करें । यह
निषेध भी वर्तमानकालिक वर्णाश्रमव्यवहार को सूक्ष्मदृष्टि से
देखने से समुचित ज्ञात होता है ।
और जो यज्ञ में 'पशु' के संज्ञपने को भ्रान्तिमूलक सिद्ध
१ संज्ञपन=आलम्भ, यह 'संज्ञप॑यान्वगग्नित्येव ब्रूयात् ६।५।२१' इस
कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार भाष्य है ।

' भूमिका । ' ५३
करते हैं, वा उसको सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म बतलाते हैं,
वा उसको पिष्टपशुसाध्य कहते हैं, वे सब भ्रान्त अथवा
स्वार्थान्ध हैं। जब ' पशुसंज्ञपन ' की चर्चा एक स्थल में
नहीं हज़ार स्थलों में है, वेद से लेकर पुराणतक संज्ञपन छिपा नहीं
है, वेदद्रोही उसपर 'पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति ।
स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हन्यते ॥' इत्यादि मज़ाक
करते आये हैं, तब क्या संज्ञपन हमारे छिपाने से छिप सकता
है ? कथमपि नहीं, और सच्ची बात छिपाकर पापभागी क्यों
बना जाय ? जैसे 'अश्वालम्भ' 'अश्वमेध' शब्द का 'अश्व-
संज्ञपन' अर्थ छोड़कर 'अश्वस्पर्शन' वा 'अश्वसंगम' अर्थ करते
हैं सो सरासर झूठा है। क्योंकि इस कपोलकल्पित अर्थ के
अभिप्राय से उक्त शब्द का प्रयोग कहीं न मिलेगा ....इत्यादि ।
ऐसी दशा में संज्ञपन भ्रान्तिमूलक क्योंकर सिद्ध हो सकता
है ? और इस बारे में श्रीभाष्याचार्य-श्रीरामानुजाचार्य ने
तथा वेदान्तपारिजातसौरभाचार्य श्रीनिम्बार्काचार्य के
शिष्य-वेदान्तकौस्तुभाचार्य श्रीश्रीनिवासाचार्य ने यह श्रुति
लिखी है—
'न वा उ एतन् म्रियसे न रिष्यसि देवान् इदेषि पथिभिः
सुगेभिः। यत्र यन्ति सुकृतो नापि दुष्कृतस्तत्रत्वा देवः सविता
दधातु ॥'

१-२ ' अश्वः आलभ्यते वध्यतेऽत्र । अश्वः मेध्यते वध्यतेऽत्र ' यों ये
योगरूढ़ शब्द हैं, केवल यौगिक नहीं हैं । देखिये, वाल्मीकीय रामायण बाल-
काण्ड १४ सर्ग ।

५४ मनुस्मृति ।
और पूर्णप्रज्ञ दर्शनाचार्य श्रीमध्वाचार्य ने यह वाराह-
पुराण का वाक्य लिखा है—
' हिंसा त्ववैदिकी या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत् ।
वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथंचन ॥'
यह विचार ' अशुद्धमिति चेन्न, शब्दात् ३ । १ । २५ ।'
इस ब्रह्मसूत्र के भाष्य में किया है। इस व्यवस्था से
' ओषधयः पशवः- ' ४ । ४० यह मनुवचन भी सहानुभूति
रखता है।
और जो सांख्यकारिका में आनुश्रविक-कर्म ( त्रेताग्नि-
साध्य अनुष्ठान ) को अविशुद्धि, क्षय, अतिशय, इन तीन
दोषों से ग्रस्त बतलाया है उसमें कर्मसाध्य स्वर्ग को अनि-
त्यता से क्षयवान्, और कर्मफल को न्यूनाधिकभाव से
अतिशयवान् बतलाना न्यायसिद्ध है; परंतु कर्म में एकान्ततः
अविशुद्धि बतलाना न्यायविरुद्ध है और उपजीव्य ( सांख्य-
दर्शन ) से बहिर्भूत है; क्योंकि किसी सांख्यसूत्र से उक्तकर्म
की अविशुद्धि नहीं सिद्ध होती प्रत्युत ' अशुद्धमिति चेन्न,
शब्दात् ' इस ब्रह्मसूत्र के साथ विरोध खड़ा होता है और इसी
सूत्र के शारीरकभाष्य में आचार्य श्री ६ शंकर स्वामी ने
' न हिंस्यात् सर्वाभूतानि' इस शास्त्र को उत्सर्ग और 'अग्नी-
षोमीयं पशुमालभेत ' इस शास्त्र को अपवाद व्यवस्थित किया
है। और ' अग्निहोत्रादि तु तत्कार्यायैव तद्दर्शनात् ४।१। १३,
इस ब्रह्मसूत्र से आनुश्रविक-कर्म विशेष का ज्ञान में उपयोग
बतलाया है । ऐसी स्थिति में 'अविशुद्धिः=सोमादियागस्य
पशुबीजादिवधसाधनता ' यह लेख कारिकार्पक्ष-रक्षणार्थ

टीका में श्रीबालराम उदासीन साधुने 'कर्मकाण्डोन्मूलन

भूमिका । ५५

है। इस विषय पर 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' की 'विद्वत्तोषिणी'
टीका में श्रीबालराम उदासीन साधुने 'कर्मकाण्डोन्मूलन
परिणामिका एक विशाल वक्तृता दिखलाई है जिसके प्राति-
स्विक विचार का अवकाश यहां नहीं है।
और 'संज्ञपन' को सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म भी नहीं
स्थिर कर सकते क्योंकि 'चत्वार्यब्दसहस्राणि-' इस व्यास-
वाक्य से भी त्रेताग्निनसाध्य कर्मों का अनुष्ठान कलि में प्राप्त
होता है, वह देशकालपात्र के संकोच से कुछ दिन के लिये
कहागया है यह दूसरी बात है। और 'गोसंज्ञप्तिश्च गोसवे'
इत्यादि विशेष संज्ञपन तो श्रुति-स्मृति से सुतरां निषिद्ध हैं।
पर अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, सोम आदि कतिपय यज्ञ निषिद्ध
नहीं हैं, अतएव उनके प्रातिस्विक निषेध वाक्य भी नहीं
प्राप्त होते और वे दाक्षिणात्यशिष्टों में अद्य भी कथमपि किये
जाते हैं। रहगया 'कलिवर्ज्य' प्रकरण लेख, वह 'श्वानं
युवानं मघवानमाह' इस के समान है। यह अवश्य विचार-
णीय क्या बल्कि महान् विचारणीय विषय है कि जब स्मृति
से श्रुति का बाध नहीं हो सकता और देश, काल, पात्र के
संकोच से अनेक कर्मों के अनुष्ठान से सुकृत के बदले दुष्कृत
खड़े होने की पूरी आशङ्का है तब महानुभावों ने 'कलिवर्ज्य'
व्यवस्था की। जिसमें श्रुतिविहित, स्मृतिविहित, सामर्थ्य-
विहित और आचारविहित कितने एक कर्मोंका निषेध तथा


१ आपने स्वपरिष्कृत पातञ्जलयोगभाष्य के प्रारम्भ में एक 'योगतत्त्वसमीक्षा'
नाम की भूमिका लिखी है जिसमें वेदान्त सिद्धान्तों को आड़े हाथों से संभाला है,
उसका उद्धार वेदान्तपरिभाषा की सगणप्रभा-शिखामणि टीका की भूमिका
में श्रीगोविन्द सिंह निर्मल साधुने किया है।

[Page Header]
५६ मनुस्मृति ।

[Main Text]
किसी किसी निषिद्ध का विधान भी किया है । और वैदिक
' पशुसंज्ञपन ' पिष्टपशु साध्य है, यह भी नहीं कह सकते ।
क्योंकि ' न वा उ एतन्म्रियसे-' इस उक्त श्रुति का विरोध
होता है, तथा ' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपायै मेदसोऽनुब्रूहि '
इत्यादि श्रुतियों का पैष्टिक पशु में अत्यन्त बाध है तथा
पिष्टपशु करने का विधिवाक्य भी नहीं है जो ' श्रूयते हि पुरा
कल्पे नृणां व्रीहिमियः पशुः ' इत्यादि वाक्यों से विधि की कल्पना
की जाती है वह ' पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते '
इसके समान उपेक्षणीय है । और जिस लक्ष्य से पिष्टपशु का
विधित्व माना जाता है उससे भी छूटना असंभव है क्योंकि-
' व्युत्थानावस्थायां रागादीनां वशप्रवृत्तायाम् । म्रियतां जीवो
मा वा धावतये ध्रुवं हिंसा ॥ ' तो अशास्त्रीयकर्म में अहंभाव से
पड़कर क्या फल है ? धन, नहीं निधन....इत्यादि ।
अग्निपुराण की शिक्षा है कि-
' अग्निष्टोमादिकर्माणि सापायानि कलौयुगे ।
गङ्गास्नानं हरेर्नाम निरपायमिदं द्वयम् ॥ '
संस्कार-व्यय । जातीय संस्कार ( द्विजत्वघटक-संस्कार )
में अल्पव्यय है । यदि ऐसा न होता तो धनिक ही जातिमान्
बन सकते; यह बात गृह्यस्मृतियों के देखने से साफ जाहिर है ।
पारस्कर गृह्यस्मृति के प्रधान व्याख्याता कर्काचार्य आव-
सथ्याधान के ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ' इस अन्तिम सूत्र की
व्याख्या में सिद्धान्त करते हैं कि एक ब्राह्मण भोजन कराना ।
आशय यह है कि जहां प्रकृत के समान संख्या का ज्ञान न
हो वहां एक ब्राह्मण लेना और जहां ' ब्राह्मणान् भोजयित्वा'

[Footnote]
१ बृहन्नार में ।

भूमिका । ५७
ऐसा लिखा है वहां पर तीन ब्राह्मण लेना योग्य है । भगवान्
मनु ने भी कहा है कि-
‘ द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ ’
यद्यपि यह श्राद्ध का विषय है तो भी आतिदेशिक विधि
के अनुसार कर्मान्तर में भी इसका अनुरोध करना अनुचित
न होगा, यदि कोई प्रामाणिक विशेष वाक्य न उपस्थित हो।
यदि गृह्यस्मृति के अनुसार ब्राह्मण संख्या न्यून प्रतीत हो
तो इस यज्ञपार्श्व के वाक्य का आलम्बन करो-
‘ गर्भाधानादिसंस्कारे ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ।
शतं विवाहसंस्कारे पञ्चाशन्मेखलाविधौ ॥
आवसथ्ये त्रयस्त्रिंशच्छ्रौताधाने शतात्परम् ।
अष्टकं भोजयेद् भक्त्या तत्तत्संस्कारसिद्धये ॥
सहस्रं भोजयेत् सोमे ब्राह्मणानां शतं पशौ ।
चातुर्मास्ये तु चत्वारि शतानि पञ्च सुराग्रहे ॥
अयुतं वाजपेये च ह्यश्वमेधे चतुर्गुणम् ।
आग्रयणे प्रायश्चित्ते ब्राह्मणान् दश पञ्च च ॥’
२ । उपासनाकाण्ड । सर्वोपास्य-परमेश्वर, निर्विशेष
और सविशेष अर्थात् निर्गुण (अवाङ्मनसगोचर), सगुण
( वाङ्मनसगोचर ) श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास में अनेक
प्रकार से वर्णित है ।
निर्विशेष-परमेश्वर ( ब्रह्म )-
‘ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।

५८ मनुस्मृति ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ '
कठोपनिषत्.
इस यजुर्वेदीय-कठशाखीय-श्रुति से ज्ञेय है । और
सविशेष परमेश्वर ( ब्रह्म )-
' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्य-
श्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः, तस्य यथा
कप्यासपुण्डरीकमेवमक्षिणी, तस्योदिति नाम, स एष सर्वेभ्यः
पाप्मभ्य उदितः, उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद,
इत्यधिदैवतम् । '
इस सामवेदीय-छान्दोग्य श्रुति से विज्ञेय है ।
विश्वरूपधारी श्रीनारायण ने नारद मुनि से कहा है कि-
' माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ।
सर्वभूतगुणैर्युक्तं, नैवं मां ज्ञातुमर्हसि ॥ '
शारीरकभाष्य.
अर्थात् हे नारद ! मैंने यह माया रची है जिससे तुम
मेरे को सविशेष देख रहे हो; नहीं तो तुम मेरे को ऐसा नहीं
जान सकते ।
इसी अभिप्राय से ' अन्तस्तद्धर्मापदेशात् १ । १ । २० '
इस ब्रह्मसूत्र के ' कल्पतरु ' में यह वचन लिखा है-
' निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः ।
ये मन्दास्तेऽनुकम्पन्ते सविशेषनिरूपणैः ॥
वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात् ।
तदेवाविर्भवेत् साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ '

उपास्योपबृंहण । जैसे पूर्वकाण्ड ( श्रौत-स्मार्त कर्म) में

भूमिका । ५६
अर्थात् निर्गुणोपासन में असमर्थ सगुणोपासन करें, चित्त के
निश्चल होने पर वही निर्गुण (निरुपाधि-ब्रह्म) प्रकट होगा।
उपास्योपबृंहण । जैसे पूर्वकाण्ड ( श्रौत-स्मार्त कर्म) में
प्रधानतः अग्नि, इन्द्र और देवता; उनकी भक्ति अर्थात् लोक,
सवन, ऋतु, छन्द, स्तोम, साम, देवगण, कर्म; तथा भक्तिविशेष
(अवान्तर भेद) और उन्हींको संस्तावक देवता; तथा ८ वसु,
११ रुद्र, १२ आदित्य, १ इन्द्र और १ प्रजापति का यजन
व्यष्टिरूप से कहा है । वैसा इस उपासनाकाण्ड में भी प्रधानतः
विष्णु, शिव, शक्ति, गणेश और सूर्य इन पांच देवताओं का
यजन कहा है । इन सब के अवान्तर भेद अपरिच्छिन्न
हैं। जैसे चतुर्दश विद्या-प्रस्थान, वा अष्टादश विद्या-प्रस्थान का
संक्षेप (बीज) प्रणव (ओ ३ म् ) है; अर्थात् वाङ्मयमात्र
का बीज प्रणव (अक्षर) है। वैसाही सब देवताओं का मूल
ईश्वर (अक्षर) है। अर्थात् देवतामात्र ईश्वर से अभिन्न है।
और देवताओं की विभूति के विषय में यह श्रुति है-
'त्रीणि शता त्रीणि सहस्रायग्निं
त्रिंशच्चदेवा नवं चासपर्यन् ।' य. ३३ । ७ ।
'त्रयश्च त्री च शता त्रयश्च त्रीं च सहस्रेति' बृ. ।
१-४ 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष. ईश्वरः १ । २४' अविद्या
आदि क्लेश, शुभाशुभ कर्मों के फल और वासना से निर्लेप पुरुष विशेष (पुरुषो-
त्तम) ईश्वर है। 'तस्य वाचकः प्रणवः १ । २७' उस ईश्वर का वाचक (बोधक)
प्रणव है। अर्थात् ईश्वर वाच्य और प्रणव वाचक है। ये सब उपासना के विषय
योगदर्शन में स्पष्ट हैं । प्रणव की महिमा माण्डूक्य में कही है । प्रणव वह
'अक्षर' है जो शब्दतः भी ईश्वर से अलग नहीं है । व्याससूत्र में लिखा है
कि 'अक्षरमम्बरान्तधृतेः १ । ३ । १०' इससे अर्थावगति के अभाव में भी मन्त्र जप
से ईश्वर का प्रसन्न होना निर्विवाद है । उपास्य ईश्वर, उपासक (योगी) से
परमार्थ में पृथक् नहीं है। उपनिषद में कहा है कि 'तत् त्वम् असि' इत्यादि ।

६० मनुस्मृति ।
फिर बृहदारण्यक में 'महिमान एवैषां—' इस कथन से
एकही देवता के अनेक रूप बतलाये हैं। इसी वैदिक दर्शन
से भगवान् व्यास ने 'विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्ते-
र्दर्शनात् १।३।२७' यह विग्रहसूचक सूत्र बनाया और
पुराण इतिहासों में विष्णु, शिव, शक्ति आदि भिन्न भिन्न
विग्रह तथा एकही विष्णु आदि के अनेक विग्रह कहे गये हैं।
और महाभारत के प्रारम्भ में पुराण तथा इतिहास के
द्वारा वैदिक ज्ञान को बढ़ाने को कहा—
'इतिहासपुराणाभ्यां वेदार्थमुपबृंहयेत् ।
बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरेदिति ॥'
आजान सिद्ध देवताओं की महिमा का तो कहना ही क्या
है; पर कर्मसिद्ध योगियों की महिमा भी श्रुति स्मृति से
विलक्षण ज्ञात होती है—
'पृथ्व्यप्तेजोनिलखे समुत्थे
पञ्चात्मके योगगुणे प्रवृत्ते ।
न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः
प्राप्तस्य योगाग्निमयं शरीरम् ॥'
श्वेता० २।१२.
'आत्मनो वै शरीराणि बहूनि भरतर्षभ ।
योगी कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥


१ मन्त्रलिङ्गों से ज्ञात देवविग्रहादिकों का संग्राहक श्लोक—
'विग्रहो हविषां भोग ऐश्वर्यं च प्रसन्नता ।
फलप्रदानमित्येतत् पञ्चकं विग्रहादिकम् ॥'
शारीरकव्याख्या.

भूमिका । ६१
प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् ।
संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥ '
शारीरकभाष्य.
समानतन्त्र-सांख्यदर्शन में भी लिखा है कि-
'योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्नापलपनीयाः ५।१२८'
औषध मन्त्रसिद्धि के समान योगसिद्धि भी निराकरण
करने योग्य नहीं है । यही दृष्टान्त न्यायदर्शन में वेद के
प्रामाण्य सिद्ध करने में दिया गया है । योगसिद्धि पातञ्जल-
दर्शन के विभूतिपाद में लिखी हैं, इन्हींके न जानने से भारत
के क्षुद्रहृदय ( अभागे ) पौराणिक वा ऐतिहासिक विषयों
को गप्प कहा करते हैं ।
दैवतभाषण । प्रणव आदि इष्टमन्त्र के यथाविधि जप
करने से इष्टदेवता के साथ संभापणादि व्यवहार की सिद्धि
होती है यह बात पातञ्जलदर्शन में लिखी है-
'स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः २ । ४४ '
और 'भावं तु बादरायणोऽस्ति हि १।३।३३' इस
ब्रह्मसूत्र के भाष्य में भगवत्पाद ने भी कहा है-
'तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति
स्मर्यते । यस्तु ब्रूयाद् इदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवा-
दिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधयेत् । इदानी-
मिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽस्तीति ब्रूयात्, ततश्च
राजसूयादिचोदना उपरुन्ध्यात् । इदानीमिव च कालान्तरे-
१ ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् २ । १ । ६७ '

६२ मनुस्मृति ।

ऽप्यव्यवस्थितप्रायान् वर्णाश्रमधर्मान् प्रतिजानीत, ततश्च
व्यवस्थाविधायि शास्त्रमनर्थकं स्यात् । तस्माद् धर्मोत्कर्षवशा-
चिरंतना देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवजह्रुरिति श्लिष्यते ।' इति ।
अवतार। जब उक्त श्रुति स्मृति पुराण इतिहास से देवता
जडरूप भौतिकमात्र नहीं हैं; किंतु योगियों के समान ऐश्वर्य-
वान् चेतन हैं; एकही काल में नानाविधरूप धारण करने को
समर्थ हैं; जगत् के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप कर्मों के अनुसार
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र हैं; वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ
नाम से विभक्त कर्मेन्द्रिय के अग्नि, इन्द्र, उपेन्द्र, मृत्यु और
प्रजापति नाम से विख्यात अधिष्ठाता हैं; श्रोत्र, त्वक्, चक्षु,
रसन और घ्राण नाम से विभक्त ज्ञानेन्द्रिय के दिक्, वात,
अर्क, वरुण और अश्वी नाम से प्रसिद्ध अधिष्ठाता हैं; मन,
बुद्धि, चित्त और अहंकार नाम से विभक्त अन्तःकरण के
चन्द्र, चतुर्मुख, शंकर और अच्युत नाम से प्रसिद्ध स्वामी हैं;
तथा वे पिण्डाण्ड में ब्रह्माण्ड के दैवत भावनानुसार नाना-
नामधारी हैं; और इस जगद् की सारी व्यवस्था (प्राकृतिक
नियम) एकस्वामिक के समान व्यवस्थित देखने में आती
है; न कि 'मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना तुण्डे तुण्डे सरस्वती' के
न्याय से जैसे अनेक अधिकारियों से एक अधिकार अव्यव-
स्थित होता है, वैसी जगत् की कोई व्यवस्था अव्यवस्थित
नज़र आती है; तब अगत्त्या गुणकर्मानुसारी नानाविध नाम-
रूप का उपसंहार करके जगत् का एकस्वामी 'परमेश्वर'
अङ्गीकार करना पड़ता है । ऐसी दशा में जगत् के कल्या-
णार्थ गुणकर्मानुसारी नामरूपधारी अवतार अङ्गीकार करने
में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; यदि कहाजाय कि व्याप-

[Header]
भूमिका । ६३
[/Header]

कता नहीं बनपड़ेगी, सो भ्रममात्र है; देखो-अग्नि विद्युद्रूप
से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता में क्या बाधा है ? कुछ
भी नहीं; वायु वात्यारूप से प्रकट हुआ तो उसकी व्यापकता
में क्या बाधा है ? कुछ भी नहीं; जगत् के बहुतेरे कार्य
सामान्यरूप से नहीं सिद्ध होसकते किंतु विशेषरूप से ही
सिद्ध होते हैं जैसे सामान्य अग्नि से पाक नहीं होसकता,
सामान्य वायु अग्नि को नहीं चमका सकता, सामान्य जल
पिपासा को नहीं शान्त करसकता .... .... इत्यादि ।
कितने एक अवतारों का लेख वेद में भी प्राप्त होता है ।
जैसे शतपथब्राह्मण के हविर्यज्ञ नामक प्रथमकाण्ड में
अग्निहोत्र वेदी के इतिहास प्रसङ्ग में ‘ वामनो ह विष्णुरास ’
इत्यादि से विष्णु के वामने बनने का उल्लेख, तथा संहिता
के सौमिक वेदी प्रतिपादक पञ्चमाध्याय के पन्द्रहवें मन्त्र से
विष्णु के त्रिविक्रमत्व का उल्लेख, तथा शतपथ के प्रथम
काण्डही में ‘ मनवे हवै प्रातः—’ इत्यादि श्रुति से मत्स्या-
वतार की कथा । एवं त्रिपुर आदि का इतिहास । बलराम
और कृष्णका अवतार निम्न लिखित श्रुतियोंसे स्पष्ट होताहै-
‘ जज्ञान एव व्यबाधत स्पृधः
प्रापश्यद् वीरो अभिपौंस्यं रणम् ।
अवश्चिदद्रिमत्र सस्यदः सृज-
दस्तभ्नान्नकं स्वपस्यया पृथुम् ॥ ’
१ सामान्यशब्द का अर्थ कार्यानुसार व्यवस्थित स्वीकार किया गया है ।
२ विस्तार भय से श्रुतियां छोड़ दी हैं । इसी बहाने जिज्ञासु लोग उनकी
देखभाल करें ।

६४ मनुस्मृति ।
जिसने (जज्ञान एव) प्रकट होतेही (स्पृधः) स्पर्धा
करनेवाले पूतनादि शत्रुओं को (व्यबाधत) बाधित किया।
(अद्रिं) गोवर्धन पर्वत को (अवशिश्चद्) धारण किया।
(सस्यदः) धान्य देनेवाले वर्षते मेघों को (अवसृजत्)
विसर्जित किया। (स्वपस्यया) अपनी माया से (पृथुं)
महान् (नाकं) इन्द्र को (अस्तभ्नात्) स्तम्भित किया।
(वीरः) महावीर होकर भी (अभिपौंस्यं) पौरुषसाध्य
(रणं) भारत युद्ध को निरस्त्र (प्रापश्यत्) देखा।
‘द्वे विरूपे चरतः स्वर्थे
अन्यान्‍या वत्समुपधापयेते ।
हरिरन्यस्यां भवति स्वधावा-
ञ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुवर्चाः ॥’
(अन्यान्‍या) अलग अलग (स्वर्थे) कार्य में तत्पर
(विरूपे) निराली छविवाले (द्वे) वे दो बालक (चरतः)
विचर रहे हैं। (वत्सं) बछरों को (उपधापयेते) समीप में
दूध पिलावरहे हैं। उनमें (अन्यस्यां) एक (स्वधावान्)
अखण्डैश्वर्य (हरिः) श्यामवर्ण (भवति) है, (अन्यस्यां)
दूसरा (सुवर्चाः) तेजस्वी (शुक्रः) गौरवर्ण (ददृशे)
दिखलाई देता है।
‘पूर्वापरं चरतो माययैतौ
शिशू क्रीडन्तौ परियातो अध्वरम्।
विश्वान्यन्यो भुवनानि चष्ट
ऋतून्यन्यो विदधज्जायते पुनः ॥’
तैत्तिरीयश्रुति.

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भूमिका । ६५

[Main Text]
(एतौ) ये दोनों राम-कृष्ण (पूर्वापरं) आगे पीछे
(चरतः) विचरते हुए (मायया) माया से (शिशू) बाल-
रूप (क्रीडन्तौ) क्रीड़ा करते करते (अध्वरं) कंस के धनु-
र्यज्ञ को (परियातः) जा पहुँचे। इनमें (अन्यः) एक कृष्ण
योगेश्वर होने से (विश्वानि-भुवनानि) सारे ब्रह्माण्ड को
(वि-चष्टे) जानता है। (अन्यः-पुनः) दूसरा राम (ऋतून्-
दधत्) समयानुसार (जायते) अवतीर्ण हुआ। अर्थात्
बलराम ने कृष्ण के समान 'तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं-'
इत्यादि अद्भुतरूप से नहीं अवतार का ग्रहण किया।

नाम-रूप-लिङ्ग। परमेश्वर के नाम-रूप-लिङ्ग का दिग्द-
र्शन किया जाता है जिसके जानने से साकारोपासना तथा
निराकारोपासना की दृढ़ता होती है। पहले अवतारों की सिद्धि
होचुकी है वे श्रीमद्भागवतानुसार ये हैं—

पहिला अवतार हिरण्यगर्भादि पदवाच्य, दूसरा वराह
(रसातल में गई पृथ्वी के उद्धर्ता) तीसरा नारद (देवर्षि
भाव को प्राप्त होकर सात्वततन्त्र अर्थात् पञ्चरात्रनामक वैष्ण-


[Footnotes]
१ 'हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं
द्यामुतेमाम्' इति ऋक्श्रुति । 'स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते । आदि-
कर्ता स भूतानां ब्रह्माग्रे समवर्त्तत ॥' इति स्मृतिः । 'जगृहे पौरुषं रूपं-' इत्यादि
भागवत ।

६६ मनुस्मृति ।
वागप के कर्ता ) चौथा नर-नारायण ( धर्मपत्नी से उत्पन्न
होकर दुश्चर तप करनेवाले ) पांचवां कपिल ( कालवशसुप्त-
सांख्य को आसुरिनाम ब्राह्मण को बतलानेवाले ) छठां
दत्तात्रेय ( अत्रि से अनसूया में जन्म लेकर प्रह्लाद आदि को
अध्यात्म-विद्या पढ़ानेवाले ) सातवां यज्ञ ( रुचि से आकूति में
पैदा होकर अपने यामादिक पुत्रों के साथ स्वायंभुव मन्वन्तर
के पालक ) आठवां ऋषभ ( नाभि से मेरुदेवी में उत्पन्न-
अत्याश्रमी ) नवां पृथु ( पृथ्वी को दुहनेवाले ) दशवां मत्स्य
( मनु के रक्षक ) ग्यारहवां कूर्म ( समुद्र-मथन के समय मन्दराद्रि
को अपने पीठ पर धारण करनेवाले ) बारहवां धन्वन्तरि
( आयुर्वेदके प्रकाशक ) तेरहवां मोहिनी ( स्त्रीरूप से असुरों
को मोहित करके सुरों को अमृत पिलानेवाले ) चौदहवां नृसिंह
( हिरण्यकशिपु के नाशकर्ता ) पन्द्रहवां वामन ( बलिको बांध-
नेवाले ) सोलहवां परशुराम ( इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार
करनेवाले ) सत्रहवां व्यास ( पराशर से सत्यवती में जन्म
लेकर वेदों के विभाग करनेवाले ) अठारहवां राम ( दशरथ
के पुत्र बन कर रावण के विध्वंसक ) उन्नीसवां राम-कृष्ण
( यदुकुल में प्रकट होकर भूभार के हर्ता ) बीसवां बुद्ध ( अजन
के पुत्र देवद्वेषियों के मोहक ) इक्कीसवां कल्कि का अवतार
( विष्णुयशा के पुत्र चौरप्राय राजाओं के विनाशक ) ।
१-३ कहीं राम, तथा कृष्ण की अलग २ अवतार संख्या दी है; नर और
नारायण की एकही संख्या दी है; बुद्ध के पितृनाम में 'जिन' यह पाठान्तर
श्रीधरी टीका से प्राप्त होता है ।
४ ' अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः ' इससे अवतारों की असंख्ये-
यता, तथा ' एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः । मायागुणैर्विरचितं महदादिभि-
रात्मनि ॥ ' इससे रूपाभ्यास, तथा ' यथा नभसि मेघौघो रेणुर्वा पार्थिवोऽनिले ।
एवं द्रष्टरि दृश्यत्वमारोपितमबुद्धिभिः ॥ ' यह दृष्टान्त दिया है । देखो श्रीधरी ।

और दशावतार का संग्राहक यह श्लोक है—

' भूमिका । ६७
और दशावतार का संग्राहक यह श्लोक है—
' मत्स्यः कूर्मोऽथ वाराहो नरसिंहोऽथ वामनः ।
रामो रामश्च रामश्च बुद्धः कल्की च ते दश ॥ '
उक्त अवतारों से औपासनिक नाम-रूप-लिङ्ग का बोध
स्पष्टरूप से होता है । परन्तु वैदिक निघण्टु में ऐसे नाम नहीं
प्राप्त होते जिनसे चतुर्भुजादि आकार का परिचय हो; विष्णु
आदि नाम प्राप्त होकर भी पूर्वकाण्ड में अग्नि आदि अन्य
देवता के समान हविर्मात्र के भागी हैं; उत्तरकाण्ड में निरा-
कार हैं; ' अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ' इत्यादि स्थल में उपास-
नार्थ साकार होकर भी किसी नियत आकार के बोधक नहीं
हैं; जहां विष्णु आदि नाम नामान्तर के साथ पढ़े हैं—जैसे
' आग्नावैष्णवं—' इत्यादि—वहां पर भी अर्थान्तर के बोधक
हैं; और ' यथाभिमतध्यानाद्वा ' इत्यादि दार्शनिक लिङ्ग
भी नियत आकार के व्यवस्थापक नहीं हैं। ऐसी दशा में विष्णु
आदि पदार्थ के उपबृंहक इतिहास-पुराण ही शरण हैं; उनमें
जिस आकार का जो उपबृंहक प्रकरण है उसके अनुसार
आकार-प्रतिपादक नाम और सहपठित निराकार-प्रतिपादक
नाम, व्यावहारिक तथा पारमार्थिक दशा की सिद्धि के लिये
पर्यायरूप मानने चाहिये । अतएव अग्निपुराण आदि के
आधार से रचे नाम-लिङ्गानुशासनों ( कोषों ) में ब्रह्मादि
देवताओं के नाम एकत्र किये गये, जिनमें वैदिक सिद्धान्त-
सिद्ध भेदक और अभेदक ये दोनों नाम हैं । यह विषय आगे
स्पष्ट होगा ।

६८ मनुस्मृति ।
नाम-रूप-लिङ्ग की उपबृंहक श्रुतियां—
“अथ यो ह खलु वा वास्य राजसोंऽशोऽसौ स योऽयं
ब्रह्मा, अथ यो ह खलु वा वास्य तामसोंऽशोऽसौ स योऽयं
रुद्रः, अथ यो ह खलु वा वास्य सात्त्विकोंऽशोऽसौ स योऽयं
विष्णुः” इति मैत्रेयोपनिषत् ।
“उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं
त्रिलोचनं नीलकण्ठं प्रशान्तम् ।
ध्यात्वा मुनिर्गच्छति भूतयोनिं
समस्तसाक्षिं तमसः परस्तात् ॥”
कैवल्योपनिषत् ।
“स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां
हैमवतीं ताँह् होवाच किमेतद् यक्षमिति ।”
सामवेदीय-तलवकारोपनिषत् ।
“तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् ॥
दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरसितरसे नमः ॥”
नारायणोपनिषत् ।
इत्यादि ।
पदार्थ के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप अवस्था भेद के अनु-
सार परमेश्वर के ब्रह्मा-विष्णु-रुद्ररूप अवस्था भेद वेद-दृष्टि
१ ‘त्र्यम्बकं यजामहे—’ (य० ३ । ६१) इत्यादि ।
२ ‘नीलग्रीवः—’ (य० १६ । ७) इत्यादि ।
३ ‘या ते रुद्र शिवा तनूः शिवा विश्वाह भेषजी ।
शिवा रुद्रस्य भेषजी तया नो मृड जीवसे ॥’
(य० १६ । ४६)
४ अन्य देवताओं के आकार के विषय में एवंविध मन्त्रलिङ्ग चारो वेद की
मन्त्रसंहिताओं में तथा तैत्तिरीयमन्त्रसंहिता में नहीं प्राप्त होते (एक बार तो
पढ़ देखिये)।

भूमिका । ६६

`से उत्पन्न हुए; और जड़ तथा चेतन रूप से विभक्त स्थावर-
जङ्गमात्मक पदार्थ के भीतर ऊष्मा, बाहर प्रकाश की आवश्य-
कता के कारण अग्नीषोमात्मक सूर्य उत्पन्न हुए; पदार्थ और
उसकी अवस्था सिद्धि के लिये गणेश उत्पन्न हुए; पदार्थों के
यथायोग्य अवस्थान के निमित्त शक्ति उत्पन्न हुई । उक्त ब्रह्म-
कार्य-उत्पत्ति को शक्ति में अन्तर्भूत मान कर परमेश्वर की
विष्णु आदि पञ्चदेवतात्मक उपासना प्रवृत्त हुई, जिसका
विस्तार विष्णुपुराण, शिवपुराण, मार्कण्डेयपुराण, सूर्यपुराण
और गणेशपुराण में भली भांति किया है । किं बहुना; सारे
पुराण, उपपुराण और इतिहासों का उपसंहार इन्हीं विष्णु-
शिव-शक्ति-गणेश तथा सूर्य की विभूतियों में हुआ है। जैसे
पदार्थ के उत्पत्ति आदि तीन भाव-विकार से ब्रह्मा आदि
तीन देवता कहे हैं वैसे ही पदार्थ के ऊष्मा तथा प्रकाश के कारण
अन्य भाव-विकार से सूर्य, और नियमित भाव-विकार के
लाभार्थ गणेश कहे हैं । और भाव-विकार ही से वेदान्त-दर्शन
में परमेश्वर का तटस्थ-लक्षण किया है । शब्दार्थरूप जगत् में
यह अर्थ-सृष्टि की व्यवस्था है, एवं शब्द-सृष्टि की भी व्यवस्था
जाननी चाहिये ।


१ पदार्थ की अवस्था ।
२ "जायतेऽस्ति, विपरिणमते वर्धते,ऽपक्षीयते विनश्यति" वाष्र्यायणि ।
३ 'विनायकः कर्म विघ्न--' याज्ञवल्क्य ।
४ 'जन्माद्यस्य यतः' वेदव्यास ।
५ 'नित्यानन्दवपुर्निरन्तरगलत्पञ्चाशदर्णैः क्रमाद् व्याप्तं येन चराचरात्मकमिदं
शब्दार्थरूपं जगत् । शब्दब्रह्म यदूचिरे सुकृतिनश्चैतन्यमन्तर्गतं तद्वोऽव्यादनिशं
शशाङ्कसदृशं वाचामधीशं महः ॥' शारदातिलककार ।