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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २६७

आठवां अध्याय । २६७
कूटसाक्ष्यं तु कुर्वाणांस्त्रीन्वर्णान् धार्मिको नृपः ।
प्रवासयेद्दण्डयित्वा ब्राह्मणं तु विवासयेत् ॥ १२३ ॥
दश स्थानानि दण्डस्य मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ।
त्रिषु वर्णेषु यानि स्युरक्षतो ब्राह्मणो व्रजेत् ॥ १२४ ॥
इनमें किसी एक कारण से जो झूठी गवाही दे उसके दण्डों
का निर्धार क्रम से इस प्रकार है:—लोभ से झूठी गवाही देने पर
हज़ार पण दण्ड, मोहसे कहनेवाले पर प्रथम साहस अर्थात्
२५० पण, भय से देनेपर मध्यम साहस का दूना और मित्रता के
कारण से प्रथम साहस का चौगुना—१००० पण दण्ड देय। काम से
दशगुना पूर्व साहस, क्रोध से तिगुना मध्यम साहस, अज्ञान से
पूरे २०० पण और मूर्खता से झूठ कहने पर १०० पण दण्ड-जु-
र्माना करे। सत्य धर्म की रक्षा और अधर्म को रोकने के लिए ऋ-
षियों ने इन दण्डों को कहा है। धार्मिक राजा झूठी गवाही देने
वाले तीनों वर्णों को अपराध के अनुसार दण्ड देकर देश से
निकालदे और ब्राह्मण को दण्ड न देकर देशनिकाला ही करे ।
स्वायम्भुमनु ने दण्ड देने के दश स्थान कहे हैं पर ब्राह्मण को
देशनिकाले की ही सज़ा है ॥ ११६-१२४ ॥
उपस्थमुदरं जिह्वा हस्तौ पादौ च पञ्चमम् ।
चक्षुर्नासा च कर्णौ च धनं देहस्तथैव च ॥ १२५ ॥
अनुबन्धं परिज्ञाय देशकालौ च तत्त्वतः ।
सारापराधौ चालोक्य दण्डं दण्ड्येषु पातयेत् ॥१२६॥
लिङ्ग, पेट, जीभ, हाथ, पैर और आँख, नाक, कान, धन और
शरीर ये दश दण्ड देने के स्थान हैं। अपराध और दण्ड सहनेकी
शक्ति और देश, कालका विचार करके अपराधियों को दण्ड
देवे ॥ १२५-१२६ ॥

२६८ मनुस्मृति ।
अधर्मदण्डनं लोके यशोघ्नं कीर्तिनाशनम् ।
अस्वर्ग्यं च परत्रापि तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥ १२७ ॥
अदण्ड्यान्दण्डयन् राजा दण्ड्यांश्चैवाप्यदण्डयन् ।
अयशो महदाप्नोति नरकं चैव गच्छति ॥ १२८ ॥
वाग्दण्डं प्रथमं कुर्याद्धिग्दण्डं तदनन्तरम् ।
तृतीयं धनदण्डं तु वधदण्डमतः परम् ॥ १२६ ॥
वधेनापि यदा त्वेतान्निग्रहीतुं न शक्नुयात् ।
तदैषु सर्वमप्येतत्प्रयुञ्जीत चतुष्टयम् ॥ १३० ॥
अन्याय से दण्ड देना, इस लोक में यश और कीर्ति का नाशक
है। परलोक का बाधक है। निरपराधियों को दण्ड और अपरा-
धियों को दण्ड न देने से राजा की बड़ी अकीर्ति होती है। अयश
मिलता है और नरक में पड़ता है। प्रथम अपराध में वाग्दण्ड-स-
मझा देय, फिर अपराध करे तो धिक्कार-लानत दे। उसके बाद
करे तो जुर्माना करे। फिर भी करे तो शरीर दण्ड देवे। जब
देह दण्ड से भी अपराधियों को वश में न कर सके तो इन चारों
दण्डों का प्रयोग करे ॥ १२७-१३०॥
लोकसंव्यवहारार्थं याः संज्ञाः प्रथिता भुवि ।
ताम्ररूप्यसुवर्णानां ताः प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ १३१ ॥
जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः ।
प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते ॥ १३२ ॥
लोक में व्यवहार के लिये सोना, चांदी आदि की जो संज्ञा
माप-तौल प्रसिद्ध है वह यहां कही जाती है:—मकान के झरोखे से
आनेवाली सूर्यकिरणों में जो छोटे छोटे धूल के कण दिखलाई देते
हैं वह प्रथम मान है उसको त्रसरेणु कहते हैं ॥ १३१-१३२ ॥