मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । ३१
दूसरा अध्याय । ३१
कृष्णमृग, रुरुमृग और अज इनके चर्म को क्रम से तीनों वर्ण
के ब्रह्मचारी धारण करें और सन, क्षौम (अलसी) और ऊन का
वस्त्र धारण करें। मूंज की तिलड़ी और चिकनी मेखला ब्राह्मण
की बनावे, क्षत्रिय की मूर्वा नामक वेल के रेसे की गुणसी बनावे,
और वैश्य की सन के डोरे की बनाना चाहिए। यदि मूँज न मिले
तो कुश, अश्मन्तक, बल्वज तृणों से तीनों वर्णों की मेखला बनावे।
यह तीन लर की एक, तीन, वा पाँच गांठ लगाकर धारण करना
चाहिए ॥ ४१-४३ ॥
कार्पासमुपवीतं स्याद्विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् ।
शणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसौत्रिकम् ॥ ४४ ॥
ब्राह्मणो बैल्वपालाशौ क्षत्रियो वाटखादिरौ ।
पैलवौदुम्बरौ वैश्यो दण्डानर्हन्ति धर्मतः ॥ ४५ ॥
केशान्तिको ब्राह्मणस्य दण्डः कार्यः प्रमाणतः ।
ललाटसंमितो राज्ञः स्यात्तु नासान्तिको विशः ॥ ४६ ॥
ऋजवस्ते तु सर्वे स्युरव्रणाः सौम्यदर्शनाः ।
अनुद्वेगकरा नॄणां सत्वचो नाग्निदूषिताः ॥ ४७ ॥
ब्राह्मण का यज्ञोपवीत सूत का, क्षत्रिय का सन का और वैश्य
का भेड़ की ऊन का, ऊपर को बटा हुआ (दाहिने हाथ से) तीन
लर का होना चाहिए । धर्मशास्त्र के अनुसार, ब्राह्मण बेल वा
पलाश का दण्ड, क्षत्रिय वट वा खैर की लकड़ी का, वैश्य पीलू
वा गूलर का धारण करे। ब्राह्मण का दण्ड ऊंचाई में शिखा तक,
क्षत्रिय का मस्तक तक और वैश्य का नाक तक होना चाहिए ।
ये सब दण्ड सीधे, छेदरहित, देखने में सुन्दर, दूसरे को भय
न करनेवाले, वकले के सहित और आग में न जले हुए, होने
चाहिए ॥ ४४-४७ ॥
प्रतिगृह्येप्सितं दण्डमुपस्थाय च भास्करम् ।
प्रदक्षिणं परीत्याग्निं चरेद्भैक्ष्यं यथाविधि ॥ ४८ ॥
३२ : मनुस्मृति ।
भवत्पूर्वं चरेद्भैक्ष्यमुपनीतो द्विजोत्तमः ।
भवन्मध्यं तु राजन्यो वैश्यस्तु भवदुत्तरम् ॥ ४६ ॥
मातरं वा स्वसारं वा मातुर्वा भगिनीं निजाम् ।
भिक्षेत भिक्षां प्रथमं याचैनं नावमानयेत् ॥ ५० ॥
ब्रह्मचारी दण्ड लेकर, सूर्य का आराधन और अग्नि की प्रद्-
क्षिणा करके विधिपूर्वक भिक्षा मांगे । ब्राह्मण ब्रह्मचारी भिक्षा
मांगते समय, ‘भवति भिक्षां देहि’ क्षत्रिय ‘भिक्षां भवति देहि,’
वैश्य ‘भिक्षां देहि भवति’ ऐसा बोले । ब्रह्मचारी को, पहले माता
से, माता की बहन से, बहन से और जो ब्रह्मचारी का अपमान
न करती हो उस से भिक्षा मांगना चाहिए ॥ ४८-५० ॥
समाहृत्य तु तद्भैक्ष्यं यावदर्थममायया ।
निवेद्य गुरवेऽश्नीयादाचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ॥ ५१ ॥
आयुष्यं प्राङ्मुखो भुङ्क्ते यशस्यं दक्षिणामुखः ।
श्रियं प्रत्यङ्मुखो भुङ्क्ते ऋतं भुङ्क्ते ह्युदङ्मुखः॥५२॥
उपस्पृश्य द्विजो नित्यमन्नमद्यात्समाहितः ।
भुक्त्वा चोपस्पृशेत्सम्यगद्भिः खानि च संस्पृशेत्॥५३॥
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् ।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ॥ ५४ ॥
पूजितं ह्यशनं नित्यं बलमूर्जं प्रयच्छति ।
अपूजितं तु तद्भुक्तमुभयं नाशयेदिदम् ॥ ५५ ॥
अपने प्रयोजन भर को निष्कपटभाव से भिक्षा लाकर, गुरु को
निवेदन करे और पवित्रता से पूर्वदिशा को मुख करके आचमन-
पूर्वक भोजन करे । आयु के लिए पूर्वमुख, यश के लिए दक्षिण
मुख, संपत्ति के लिए पश्चिम मुख, सत्य के लिए उत्तरमुख होकर
भोजन करे। द्विजों को नित्य सावधानी से आचमनपूर्वक भोजन