मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
तीसरा अध्याय । ७३
तीसरा अध्याय । ७३
विवाहों से अच्छी और बुरे से बुरी सन्तान पैदा होती हैं। इसलिए
निन्दित विवाहों को न करना चाहिए। विवाह-संस्कार अपने
वर्ण-जाति की कन्या के साथ करना उत्तम है और दूसरे वर्ण की
कन्या के साथ विवाहविधि इसप्रकार जाननी चाहिए ॥४०-४३॥
शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया ।
वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्टवेदने ॥ ४४ ॥
ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा ।
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया ॥ ४५ ॥
ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडशः स्मृताः ।
चतुर्भिरितरैः सार्धमहोभिः सद्भिर्गर्हितैः ॥ ४६ ॥
तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दितेकादशी च या ।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दशरात्रयः ॥ ४७ ॥
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम् ॥ ४८ ॥
ब्राह्मण के साथ क्षत्रिय कन्या का विवाह हो तो वर का हाथ
न पकड़ कर उसके हाथ का बाण पकड़े। वैश्य की कन्या प्रतोद-
पशु हांकने का दण्डा, को और शूद्र कन्या पहने वस्त्र का किनारा
पकड़ लेवे। ऋतुकाल में अपनी स्त्री से संभोग करे और अमा-
वास्या आदि पांच पर्व दिनों को छोड़ देवे। स्त्रियों की स्वाभाविक
ऋतुरात्रि सोलह हैं। उन में शुरू के चार दिन निन्दित हैं। उन
सोलह रात्रियों में शुरू की चार रात्रि, ग्यारहवीं और तेरहवीं भोग
के लिए निन्दित हैं बाकी दशरात्रि अच्छी हैं। युग्म-सम-छठी,
आठवीं—दशवीं आदि रात्रि में भोग करने से पुत्र और अयुग्म-
पांचवीं, सातवीं-नवीँ रात्रि में कन्या उत्पन्न होती है। इसलिए
पुत्र की इच्छा से युग्म रात्रि में भोग करना चाहिए ॥ ४४-४८ ॥
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९. मनुस्मृति।
पुमान्पुंसोऽधिके शुक्रे स्त्री भवत्यधिके स्त्रियाः ।
समे पुमान्पुंस्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः ॥ ४६ ॥
निन्द्यास्वष्टासु चान्यासु स्त्रियो रात्रिषु वर्जयन् ।
ब्रह्मचार्येव भवति यत्र तत्राश्रमे वसन् ॥ ५० ॥
पुरुष का वीर्य अधिक होने पर पुत्र और स्त्री के अधिक में
कन्या होती है। और दोनों के समान होने पर नपुंसक सन्तान या
जोड़ा पैदा होता है। वीर्य क्षीण होने से सन्तान नहीं होती।
पहले की दूषित आठ रात्रियों को छोड़कर, बाकी रात्रि में, जिस
आश्रम का पुरुष स्त्रीभोग करता है, वह ब्रह्मचारी के समान
माना जाता है ॥ ४६-५० ॥
न कन्यायाः पिता विद्वान् गृह्णीयाच्छुल्कमण्वपि ।
गृह्णञ्शुल्कं हि लोभेन स्यान्नरोऽपत्यविक्रयी ॥ ५१ ॥
स्त्रीधनानि तु ये मोहादुपजीवन्ति बान्धवाः ।
नारीयानानि वस्त्रं वा ते पापा यान्त्यधोगतिम् ॥५२॥
आर्षे गोमिथुनं शुल्कं केचिदाहुर्मृषैव तत् ।
अल्पोऽप्येवं महान् वापि विक्रयस्तावदेव सः ॥५३॥
यासां नाददते शुल्कं ज्ञातयो न स विक्रयः ।
अर्हणं तत्कुमारीणामानृशंस्यं च केवलम् ॥ ५४ ॥
विद्वान् पिता, कन्यादान में, कुछ भी उसके बदले में मूल्य न
लेवे, यदि लोभ से कुछ ले लेता है तो वह सन्तान बेंचनेवाला है।
कन्या का धन वाहन, वस्त्र आदि जो पिता, भाई आदि अपने भोग
में लाते हैं वे नरक में पड़ते हैं । आर्ष-विवाह में जो एक एक वा
दो दो गौ बैल वर से लिया जाता है-कोई आचार्य कहते हैं-वह
मूल्य है, पर यह मिथ्या है। क्योंकि विक्रय का मूल्य कभी अधिक
कभी कम होता है पर वह नियत है, इसलिये मूल्य नहीं है । जिस