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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २८३

आठवां अध्याय । २८३
लोभ से उस धन का दावा करे तो राजा, चोर मान कर एक
सुवर्ण उस पर जुर्माना करे। इस प्रकार दिये धन को लौटाने का
निर्णय धर्मानुसार किया है। अब नौकर को वेतन न देने का निर्णय
कहा जायगा ॥ २१२-२१४ ॥
भृतोऽनार्त्तो न कुर्याद्यो दर्पात्कर्म यथोदितम् ।
स दण्ड्यः कृष्णलान्यष्टौ न देयं चास्य वेतनम्॥२१५॥
नौकर का वेतन-तनख्वाह ।
जो नौकर बिना बीमारी के घमंड से ठहराव के अनुसार
काम न करे तो उसपर आठ कृष्णल जुर्माना करे और वेतन
न देय ॥ २१५ ॥
आर्त्तस्तु कुर्यात्स्वस्थः सन् यथाभाषितमादितः ।
स दीर्घस्यापि कालस्य तल्लभेतैव वेतनम् ॥ २१६ ॥
यथोक्तमार्त्तः सुस्थो वा यस्तत्कर्म न कारयेत् ।
न तस्य वेतनं देयमल्पोनस्यापि कर्मणः ॥ २१७ ॥
एष धर्मोऽखिलेनोक्तो वेतनादानकर्मणः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि धर्मं समयभेदिनाम् ॥ २१८ ॥
परन्तु जो बीमार हो और नीरोग होकर ठहराव के अनुसार
काम करे तो अधिक दिन बीमार रहा हो तो भी वेतन पावेगा ।
रोगी हो या नीरोग हो ठहरें हुए काम को न करे या दूसरे से न
करा दे अथवा कुछ कम काम करे तो उसको वेतन न देये । यह
धर्मानुसार वेतन न देने का निर्णय कहा है । अब प्रतिज्ञाभङ्ग
करनेवालों का निर्णय किया जायगा ॥ २१६-२१८ ॥
यो ग्रामदेशसङ्घानां कृत्वा सत्येन संविदम् ।
विसंवदेन्नरो लोभात्तं राष्ट्राद्विप्रवासयेत् ॥ २१९ ॥

३८४ मनुस्मृति ।
निगृह्य दापयेच्चैनं समयव्यभिचारिणम् ।
चतुःसुवर्णान् षण्णिष्काञ्छतमानं च राजतम् ॥२२०॥
एतद्दण्डविधिं कुर्याद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
ग्रामजातिसमूहेषु समयव्यभिचारिणाम् ॥ २२१ ॥
प्रतिज्ञाभङ्ग-इकरार तोड़ना ।
जो मनुष्य गाँव या देश के लोगों से किसी काम के लिए सत्य-
प्रतिज्ञा करके लोभ से उसको छोड़ देवे तो राजा उसको राज्य
से निकाल दे और उस नियमभङ्ग करनेवाले को पकड़कर चार
निष्क वा छः सुवर्ण या एक चांदी का शतमान दण्ड करे ।
धार्मिक राजा गाँव या जातिमण्डल में प्रतिज्ञाभङ्ग करनेवाले को
इस भांति दण्ड करे ॥ २१६-२२१ ॥
क्रीत्वा विक्रीय वा किञ्चिद्यस्येहानुशयो भवेत् ।
सोऽन्तर्दशाहात्तद्द्रव्यं दद्याच्चैवाददीत च ॥ २२२ ॥
परेण तु दशाहस्य न दद्यान्नापि दापयेत् ।
आददानो ददच्चैव राज्ञा दण्ड्यः शतानि षट् ॥ २२३ ॥
किसी वस्तु को खरीद वा बेंचकर जिसको पसंद न हो वह
दश दिन के भीतर उसको वापस कर दे या लेवे । परन्तु दश दिन
के बाद न वापस करे न करावे । क्योंकि समय-भङ्ग करने से
६०० पण दण्ड उस पर किया जायगा ॥ २२२-२२३ ॥
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्याय प्रयच्छति ।
तस्य कुर्यान्नृपो दण्डं स्वयं षण्णवतिं पणान् ॥२२४॥
अकन्येति तु यः कन्यां ब्रूयाद् द्वेषेण मानवः ।
स शतं प्राप्नुयाद्दण्डं तस्या दोषमदर्शयन् ॥ २२५ ॥