मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ६१
प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् ।
संक्षिपेच्च पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव ॥ '
शारीरकभाष्य.
समानतन्त्र-सांख्यदर्शन में भी लिखा है कि-
'योगसिद्धयोऽप्यौषधादिसिद्धिवन्नापलपनीयाः ५।१२८'
औषध मन्त्रसिद्धि के समान योगसिद्धि भी निराकरण
करने योग्य नहीं है । यही दृष्टान्त न्यायदर्शन में वेद के
प्रामाण्य सिद्ध करने में दिया गया है । योगसिद्धि पातञ्जल-
दर्शन के विभूतिपाद में लिखी हैं, इन्हींके न जानने से भारत
के क्षुद्रहृदय ( अभागे ) पौराणिक वा ऐतिहासिक विषयों
को गप्प कहा करते हैं ।
दैवतभाषण । प्रणव आदि इष्टमन्त्र के यथाविधि जप
करने से इष्टदेवता के साथ संभापणादि व्यवहार की सिद्धि
होती है यह बात पातञ्जलदर्शन में लिखी है-
'स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः २ । ४४ '
और 'भावं तु बादरायणोऽस्ति हि १।३।३३' इस
ब्रह्मसूत्र के भाष्य में भगवत्पाद ने भी कहा है-
'तथा च व्यासादयो देवादिभिः प्रत्यक्षं व्यवहरन्तीति
स्मर्यते । यस्तु ब्रूयाद् इदानींतनानामिव पूर्वेषामपि नास्ति देवा-
दिभिर्व्यवहर्तुं सामर्थ्यमिति स जगद्वैचित्र्यं प्रतिषेधयेत् । इदानी-
मिव च नान्यदापि सार्वभौमः क्षत्रियोऽस्तीति ब्रूयात्, ततश्च
राजसूयादिचोदना उपरुन्ध्यात् । इदानीमिव च कालान्तरे-
१ ' मन्त्रायुर्वेदप्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यात् २ । १ । ६७ '