मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
तीसरा अध्याय । ६६
तीसरा अध्याय । ६६
हविष्मन्त अङ्गिरा के पुत्र, आज्यपा पुलस्त्य के पुत्र और सुका-
लिन् वशिष्ठ के पुत्र हैं। अग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद्,
अग्निष्वात्त और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं। ये पितरों के मुख्य
गण कहे गये हैं, इनके अनन्त जो पुत्र-पौत्र हैं उनको भी पितर
जानना चाहिए ॥ १६७-२०० ॥
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः ।
देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ २०१ ॥
राजतैर्भाजनैरेषामथो वा राजतान्वितैः ।
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्प्यते ॥ २०२ ॥
देवकार्याद्द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते ।
दैवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं श्रुतम् ॥ २०३ ॥
तेषामारक्षभूतं तु पूर्वं दैवं नियोजयेत् ।
रक्षांसि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम् ॥२०४॥
मरीचि आदि ऋषियों से पितर हुए हैं, पितरों से देवता और
मनुष्य हुए हैं। देवताओं से क्रम से स्थावर, जङ्गम रूप जगत्
उत्पन्न हुआ है। इन सब पितरों को चांदी के पात्र से वा चांदी
लगे पात्र से जलदान करने से अक्षय तृप्ति होती है। देवकार्य से
पितृकार्य द्विजों के लिए विशेष गिना जाता है। पितृश्राद्ध प्र-
धान कर्म है और देवकर्म उसका अङ्ग गिना जाता है। देवकर्म
पूर्व करने से पितृकर्म की पुष्टि होती है। पितृकर्म का रक्षक देव-
कर्म पूर्व करे, क्योंकि रक्षारहित श्राद्ध का राक्षस नाश कर
देते हैं ॥ २०१-२०४ ॥
दैवाद्यन्तं तदीहेत पित्र्याद्यन्तं न तद्भवेत् ।
पित्र्याद्यन्तं त्वीहमानः क्षिप्रं नश्यति सान्वयः ॥२०५॥
शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ।
दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत् ॥ २०६ ॥
१०० मनुस्मृति।
अवकाशेषु चोक्षेषु नदीतीरेषु चैव हि ।
विविक्तेषु च तुष्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ २०७ ॥
आसनेषूपक्लृप्तेषु बर्हिष्मत्सु पृथक् पृथक् ।
उपस्पृष्टोदकान् सम्यग्विप्रान्स्तानुपवेशयेत् ॥ २०८ ॥
इस कारण श्राद्ध में आरम्भ और समाप्ति देवतापूर्वक करे,
पित्रादिपूर्वक न करे । उसको करनेवाला वंशसहित नष्ट होजाता
है । एकान्त और पवित्र देश में गोबर से भूमि लीपकर उसमें
दक्षिण को झुकी वेदी बनावे । खुला स्थान, पवित्र देश, नदीतीर
या निर्जन देश में श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं। उस स्थान
में अलग अलग बिछे हुए कुशासनों पर निमन्त्रित ब्राह्मणों को
बैठाना चाहिए ॥ २०५-२०८ ॥
उपवेश्य तु तान् विप्रानासनेष्वजुगुप्सितान् ।
गन्धमाल्यैः सुरभिभिरर्चयेद्देवपूर्वकम् ॥ २०६ ॥
येषामुदकमानीय सपवित्रांस्तिलानपि ।
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह ॥ २१० ॥
अग्नेः सोमयमाभ्यां च कृत्वाप्यायनमादितः ।
हविर्दानेन विधिवत्पश्चात्संतर्पयेत् पितॄन् ॥ २११ ॥
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् ।
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥२१२॥
उन सदाचारी ब्राह्मणों को आसनों पर बैठाकर सुगन्ध, चन्दन,
पुष्प, धूप आदि से पहिले विश्वेदेव फिर पितरों का पूजन करे।
उसके बाद कुश और तिल मिला अर्घ्यजल दान करे और सब
की आज्ञा लेकर श्राद्ध करनेवाला ब्राह्मणों के साथ अग्नि में हवन
करे । पहले हवन से अग्नि, सोम और यम को तृप्त करे फिर अन्न
आदि हवि से पितरों को तृप्त करना चाहिए । यदि अग्नि न हो तो