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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

सातवां अध्याय । २२६

सातवां अध्याय । २२६
बेचना, खरीदना, रास्ता का खर्च, रक्षा का खर्च और उनके नि-
र्वाह को देखकर राजा, व्यापारियों से कर (टैक्स) लेवे। उद्यमियौँ
को और राज्य को जिससे नफ़ा पहुँचे ऐसा विचारकर, कर लगाना
उचित है। जैसे जोंक, बछड़ा और भौंरा धीरे धीरे अपनी, खुराक
को खींचते हैं वैसे राजा भी राष्ट्र से थोड़ा थोड़ा सालाना कर लेय।
पशु और सोना के लाभ का पचासवां भाग; अन्नों के लाभ से छठां,
आठवाँ या बारहवाँ भाग कर लेवे। वृक्ष, मांस, शहद, घी, गन्ध,
औषध, रस, फूल, मूल, फल, पत्र, शाक, तृण, चमड़ा, कांस, मिट्टी,
पत्थर के पात्र, इन सबके लाभों में से छठा भाग कर लेय ॥ १२७-१३२॥
म्रियमाणोऽप्याददीत न राजा श्रोत्रियात्करम् ।
न च क्षुधास्य संसीदेच्छ्रोत्रियो विषये वसन् ॥ १३३ ॥
यस्य राज्ञस्तु विषये श्रोत्रियः सीदति क्षुधा ।
तस्यापि तत्क्षुधा राष्ट्रमचिरेणैव सीदति ॥ १३४ ॥
राजा धन की कमी से दुःखी भी हो तो भी श्रोत्रिय ब्राह्मण से
कर न लेय और उसके राज्य में श्रोत्रिय ब्राह्मण भूखों न मरना
चाहिए। अर्थात् उसकी परवरिश रहा करे। जिस राजा के राज्य
में श्रोत्रिय ब्राह्मण क्षुधा से पीड़ित होता है, उस राजा का राज्य
थोड़े ही दिनों में उसकी भूख से नष्ट होजाता है ॥ १३३-१३४ ॥
श्रुतवृत्ते विदित्वास्य वृत्तिं धर्म्यां प्रकल्पयेत् ।
संरक्षेत्सर्वतश्चैनं पिता पुत्रमिवौरसम् ॥ १३५ ॥
संरक्ष्यमाणो राज्ञा यं कुरुते धर्ममन्वहम् ।
तेनायुर्वर्धते राज्ञो द्रविणं राष्ट्रमेव च ॥ १३६ ॥
यत्किंचिदपि वर्षस्य दापयेत् करसंज्ञितम् ।
व्यवहारेण जीवन्तं राजा राष्ट्रे पृथग्जनम् ॥ १३७ ॥

२३० मनुस्मृति ।
कारूकांश्चिल्पिनश्चैव शूद्रांश्चात्मोपजीविनः ।
एकैकं कारयेत्कर्म मासि मासि महीपतिः ॥ १३८ ॥
नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णया ।
उच्छिन्दन्ह्यात्मनोमूलमात्मानंतांश्चपीडयेत्॥१३६॥
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्यं वीक्ष्य महीपतिः ।
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति संमतः ॥ १४० ॥
राजा, इस श्रोत्रिय के वेदाध्ययन और सदाचार को जानकर
कोई धर्मविषय की जीविका बाँध दे और पिता जैसे पुत्र की रक्षा
करता है वैसे ही रक्षा करे। क्योंकि राजा से रक्षित श्रोत्रिय के धर्म-
पालन से राजा का आयुर्बल, द्रव्य और राज्य बढ़ता है । अपने
राज्य में, व्यापारवाले से भी कुछ सालाना कर दिलावे। लोहार,
बढ़ई, आदि और दासों से महीने में एक एक दिन बेगार में काम
करावे। प्रजा के स्नेह से अपना कर न लेना अपना मूलोच्छेद करना
है और लोभ से ज्यादा कर लेना प्रजाको सताना है, इसलिए राजा
ऐसा काम कभी न करे जिसमें राज्य और प्रजा दोनों को कष्ट
उठाना पड़े। राजा को कभी तीखा और कभी सीधा स्वभाव रखने
से उसको सब मानते हैं ॥ १३५-१४० ॥
अमात्यमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्गतम् ।
स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम् ॥ १४१ ॥
राजा खुद, राज्य के कार्यों को और दूसरे के कामों को देखने में
किसी कारण से असमर्थ हो तो, चतुर, धर्मात्मा, कुलीन प्रधान
मन्त्री को अपने न्यायासन पर, काम देखने के लिए नियुक्त
कर देवे ॥ १४१ ॥
एवं सर्वं विधायेदमितिकर्त्तव्यमात्मनः ।
युक्तश्चैवाप्रमत्तश्च परिरक्षेदिमाः प्रजाः ॥ १४२ ॥