मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें५२ मनुस्मृति ।
'श्वमांसमिच्छन्–' १० । १०६ 'भरद्वाजः–' १० । १०७
'विश्वामित्रः–' १० । १०८ ।" इत्यादि मनूक्तवृत्तान्त; तथा
तारा, मन्दोदरी, द्रौपदी आदि के कतिपय वृत्तान्त वर्तमान
काल में कथमपि दृष्टान्त बनकर विधेय नहीं होसकते।
यज्ञ और पशु । 'कलिवर्ज्य' के अनुसार अग्निहोत्र
संन्यास आदि कतिपय कर्म कलि में वर्जित हैं तो भी उनका
विधान (प्रतिप्रसववाक्य) प्राप्त होता है—
'यावद्वर्णविभागोऽस्ति यावद्वेदः प्रवर्तते ।
संन्यासं चाग्निहोत्रं च तावत्कुर्यात्कलौयुगे ॥'
अर्थात् जब तक वेद और वर्णविभाग चल रहा है तब
तक अग्निहोत्र और संन्यास का भी चलाना इष्ट है । 'च'
कार से यथासंभव कर्मान्तर और आश्रमान्तर का ग्रहण करना
योग्य है । अतएव यथा कथंचिद् ब्रह्मचर्य, चातुर्मास्य, सोमयाग
आदि कतिपय कर्म कहीं कहीं शिष्टजनों में दिखाई पड़ते हैं
(अकरणान्मन्दकरणं श्रेयः) ।
और जो यह व्यासवचन है—
'चत्वार्यब्दसहस्राणि चत्वार्यब्दशतानि च ।
कलेर्यदा गमिष्यन्ति तदा त्रेतापरिग्रहः ।
संन्यासश्च न कर्तव्यो ब्राह्मणेन विजानता ॥'
कलि के चार हज़ार चार सौ वर्ष व्यतीत होने बाद सुज्ञ
ब्राह्मण, अग्निहोत्र और संन्यास का ग्रहण न करें । यह
निषेध भी वर्तमानकालिक वर्णाश्रमव्यवहार को सूक्ष्मदृष्टि से
देखने से समुचित ज्ञात होता है ।
और जो यज्ञ में 'पशु' के संज्ञपने को भ्रान्तिमूलक सिद्ध
१ संज्ञपन=आलम्भ, यह 'संज्ञप॑यान्वगग्नित्येव ब्रूयात् ६।५।२१' इस
कात्यायन श्रौतसूत्र के अनुसार भाष्य है ।