मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
आठवां अध्याय । २६५
आठवां अध्याय । २६५
करे। गवाह को सात दिन के भीतर रोग, अग्नि, स्त्री पुत्रादि के
मृत्यु की आपत्ति होजाय तो उसको दण्ड न करे। जिन वादी
और प्रतिवादियों के गवाह न हों, उनका ठीक तत्त्व समझ में
न आवे तो शपथ-क़सम से भी निर्णय करलेवे। महर्षि और
देवताओं ने भी शपथ की थी। विश्वामित्रने वशिष्ठपर हत्या लगाई,
थी तब उन्होंने राजा पैजवनके समीप शपथ कीथी ॥१०३-११०॥
न वृथा शपथं कुर्यात्स्वल्पेऽप्यर्थे नरो बुधः ।
वृथा हि शपथं कुर्वन् प्रेत्य चेह च नश्यति ॥ १११ ॥
कामिनीषु विवाहेषु गवां भक्ष्ये तथेन्धने ।
ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् ॥ ११२॥
सत्येन शापयेद्विप्रं क्षत्रियं वाहनायुधैः ।
गोबीजकाञ्चनैर्वैश्यं शूद्रं सर्वैस्तु पातकैः ॥ ११३ ॥
अग्निं वाहारयेदेनमप्सु चैनं निमज्जयेत् ।
पुत्रदारस्य वाप्येनं शिरांसि स्पर्शयेत् पृथक् ॥ ११४॥
यमिद्धो न दहत्यग्निरापो नोन्मज्जयन्ति च ।
न चार्तिमृच्छति क्षिप्रं स ज्ञेयः शपथे शुचिः॥ ११५ ॥
बुद्धिमान् पुरुष थोड़ी बात के लिए शपथ न करे । वृथा शपथ
से लोक-परलोक दोनों बिगड़ते हैं। स्त्रियों में, विवाह में, गौवों
के कुछ नुक़सान करने में यज्ञार्थ काष्ठसंग्रह में और ब्राह्मण की
आपत्ति में झूठा शपथ करने से पाप नहीं लगता । ब्राह्मण को
सत्य की शपथ दे, क्षत्रिय को सवारी और शस्त्र की देय, वैश्य
को गौ, अन्न और सुवर्ण की और शूद्र को सब पातक लगने की
शपथ देय । अथवा शूद्र से शपथ में अग्नि उठवावे, जल में गोता
लगवावे और उसके पुत्र या स्त्री के ऊपर हाथ रखवावे। जिसको
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२६६ मनुस्मृति ।
अग्नि न जळावे, जल में न डूबे और अचानक शिर पर आपत्ति
न पड़जाय उसको शपथ में पवित्र जानना ॥ १११-११५ ॥
वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसा।
नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥ ११६ ॥
यस्मिन्यस्मिन् विवादे तु कौटसाक्ष्यं कृतं भवेत् ।
तत्तत्कार्यं निवर्त्तेत कृतं चाप्यकृतं भवेत् ॥ ११७ ॥
लोभान्मोहाद्भयान्मैत्रात्कामात्क्रोधात्तथैव च।
अज्ञानाद्बालभावाच्च साक्ष्यं वितथमुच्यते ॥ ११८॥
पूर्व काल में वत्सऋषि के ऊपर उनके छोटे भाई ने कलङ्क
लगाया था कि तू शूद्रा के गर्भ का है। तब वत्स ने अग्नि में
प्रवेश किया था, पर सत्यवश अग्नि ने उनका एक रोम भी
नहीं जलाया। जिन जिन मुक़द्मों में झूठी गवाही दी ऐसा नि-
श्चय हो-उनको फिर से उलट कर परीक्षा करे। लोभ, मोह,
भय, मित्रता, काम, क्रोध, अज्ञान और लड़कपन से गवाही झूठी
कही जाती है ॥ ११६-११८ ॥
एषामन्यतमे स्थाने यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ।
तस्य दण्डविशेषांस्तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ११९ ॥
लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्व तु साहसम् ।
भयाद्द्वौ मध्यमौ दण्डौ मैत्रात्पूर्व चतुर्गुणम् ॥ १२०॥
कामाद्दशगुणं पूर्वं क्रोधात्तु त्रिगुणं परम् ।
अज्ञानाद् द्वे शते पूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥ १२१ ॥
एतानाहुः कौटसाक्ष्ये प्रोक्तान्दण्डान्मनीषिभिः ।
धर्मस्याव्यभिचारार्थमधर्मानियमाय च ॥ १२२ ॥