मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
सातवां अध्याय। २०६
सातवां अध्याय। २०६
ठीक ठीक विचार कर, अपने राजधर्म की सिद्धि के लिए अनेक
रूप कभी क्षमा, कभी कोप, कभी मित्रता इत्यादि धारण करता
है। जिसकी प्रसन्नता में लक्ष्मी, पराक्रम में जय और क्रोध में
मृत्यु का वास है, वह राजा सर्वतेजोमय है। उसके साथ अज्ञान
से जो द्वेष करता है, वह निःसंदेह नष्ट होजाता है। क्योंकि
उसके नाश का विचार शीघ्रही राजा मन में करता है ॥ ८-१२ ॥
तस्माद्धर्मं यमिष्टेषु स व्यवस्येन्नराधिपः ।
अनिष्टं चाप्यनिष्टेषु तं धर्मं न विचालयेत् ॥ १३ ॥
तस्यार्थे सर्वभूतानां गोप्तारं धर्ममात्मजम् ।
ब्रह्मतेजोमयं दण्डमसृजत्पूर्वमीश्वरः ॥ १४ ॥
तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
भयाद्भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ १५ ॥
इसलिए राजा अपने अनुकूल मित्र और शत्रु के लिए जिस
धर्म क़ानून का स्थापन करे उसको कभी न तोड़ना चाहिए।
प्रजापति ने राजा के लिए सब प्राणियों की रक्षा करनेवाले,
ब्रह्मतेजोमय, धर्मरूप और अपने पुत्ररूप दण्ड को पहले ही से
पैदा किया है। दण्ड के भय से चराचर सब प्राणी अपने भोग
को प्राप्त होते हैं और धर्म से विचलित नहीं होते ॥ १३-१५ ॥
तं देशकालौ शक्तिं च विद्यां चावेक्ष्य तत्त्वतः ।
यथार्हतः संप्रणयेन्नरेष्वन्यायवर्तिषु ॥ १६ ॥
स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ १७ ॥
दण्डो शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति ।
दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः ॥ १८ ॥
२७
२१० मनुस्मृति ।
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः ।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः ॥ १६ ॥
यदि न प्रणयेद्राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः ।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान्बलवत्तराः ॥ २० ॥
देश, काल, शक्ति और विद्या का विचार करके यथायोग्य अप-
राधियों को दण्ड देवे । वह दण्ड ही राजा है, पुरुष है, वही राज्य
को नियम में रखनेवाला है, शासक है और वही चारों आश्रमधर्म
का प्रतिभू-ज़ामिन है। दण्ड सम्पूर्ण प्रजा का शासन करता है,
दण्ड ही रक्षा करता है, सोते हुए दण्ड ही जागता है, विद्वान्
लोग दण्ड को ही धर्म मानते हैं । उस दण्ड का विचारपूर्वक
प्रयोग होने से वह सब प्रजा प्रसन्न करता है और अविचार से,
सब तरह से नाशकारक होता है । यदि राजा निरालस होकर
अपराधियों को दण्ड न दे तो काँटे में मछलियों की भांति बल-
वान् लोग निर्बलों को भून डालें ॥ १६-२० ॥
अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद्धविस्तथा ।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम् ॥ २१ ॥
सर्वो दण्डजितो लोको दुर्लभो हि शुचिर्नरः ।
दण्डस्य हि भयात्सर्वं जगद्भोगाय कल्पते ॥ २२ ॥
देवदानवगन्धर्वरक्षांसि पतगोरगाः ।
तेऽपि भोगाय कल्पन्ते दण्डेनैव निपीडिताः ॥ २३ ॥
राजा दण्ड न करे तो कौआ पुरोडाश खा जायँ, कुत्ता यज्ञ
बलि चाट जायँ, कोई किसी का स्वामी न हो सके और सब
ऊंची नीची बातों का विचार भ्रष्ट हो जाय । पवित्र मन का पुरुष
दुर्लभ है। सब लोग दण्डही से सन्मार्ग में रहते हैं और जगत् के
वैभव को भोग सकते हैं। देव, दानव, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी और सर्प