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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पहला अध्याय । २१

पहला अध्याय । २१
एवमाचारतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम् ।
सर्वस्य तपसो मूलमाचारं जगृहुः परम् ॥ ११० ॥
अपने आचार से हीन ब्राह्मण वेदफल को नहीं पाता । और
जो आचारयुक्त है वह फलभागी होता है । इस प्रकार मुनियों
ने, आचार से धर्म प्राप्ति देखकर, धर्ममूल आचारं को ग्रहण
किया है ॥ १०६-११० ॥
जगतश्च समुत्पत्तिं संस्कारविधिमेव च ।
व्रतचर्योपचारं च स्नानस्य च परं विधिम् ॥ १११ ॥
दाराधिगमनं चैव विवाहानां च लक्षणम् ।
महायज्ञविधानं च श्राद्धकल्पश्च शाश्वतः ॥ ११२ ॥
वृत्तीनां लक्षणं चैव स्नातकस्य व्रतानि च ।
भक्ष्याभक्ष्यं च शौचं च द्रव्याणां शुद्धिमेव च ॥११३॥
स्त्रीधर्मयोगतापस्यं मोक्षं संन्यासमेव च ।
राज्ञश्च धर्ममखिलङ्कार्याणां च विनिर्णयम् ॥ ११४ ॥
साक्षिप्रश्नविधानं च धर्मं स्त्रीपुंसयोरपि ।
विभागधर्मं द्यूतं च कण्टकानां च शोधनम् ॥ ११५ ॥
अब इस धर्मशास्त्र में मनु ने, किन किन विषयों को कहे हैं, उस
की संख्या बतलाते हैं-जगत् की उत्पत्ति, संस्कारों की विधि, ब्रह्म-
चारियों के व्रताचरण, गुरुवन्दन, उपासना आदि, स्नानविधि,
स्त्रीगमन, विवाहों का लक्षण, महायज्ञ-वैश्वदेवादि, श्राद्धविधि,
जीव्नोपाय, गृहस्थ के व्रतनियम, भक्ष्य-अभक्ष्य का विचार, आ-
शौचनिर्णय, द्रव्यशुद्धि, स्त्रियों के धर्मोपाय, वानप्रस्थ आदि तपों
के धर्म, मोक्ष और संन्यासधर्म, राजाओं के संपूर्ण धर्म, कार्यों
का निर्णय-साखी-गवाहियों से प्रश्नविधि, स्त्री पुरुषों के धर्म,
हिस्सा-बाँट और जुआरी, चोरोंका शोधन कह।गयाहै॥१११-११५॥

२२ मनुस्मृति ।
वैश्यशूद्रोपचारं च सङ्कीर्णानां च सम्भवम् ।
आपद्धर्मं च वर्णानां प्रायश्चित्तविधिं तथा ॥ ११६ ॥
संसारगमनं चैव त्रिविधं कर्मसम्भवम् ।
निःश्रेयसं कर्मणां च गुणदोषपरीक्षणम् ॥ ११७ ॥
देशधर्मान् जातिधर्मान् कुलधर्मांश्च शाश्वतान् ।
पाखण्डगणधर्मांश्च शास्त्रेऽस्मिन्नुक्तवान् मनुः॥ ११८ ॥
वैश्य और शूद्रों के धर्मानुष्ठान का प्रकार, वर्णसङ्करों की
उत्पत्ति, वर्णों का आपद्धर्म और प्रायश्चित्तविधि, उत्तम, मध्यम,
अधम इन तीन प्रकार के कर्मों से देहगति का निर्णय, मोक्ष का
स्वरूप, और कर्मों के गुण दोष की परीक्षा, देश धर्म, जाति का
धर्म, कुल का धर्म जो परंपरा से चला आता है । पाखण्डियों के
कर्म, गण-वैश्य आदि के धर्म इस शास्त्र में भगवान् मनु ने
कहा है ॥ ११६-११८ ॥
यथेदमुक्तवान् शास्त्रं पुरा पृष्टो मनुर्मया ।
तथेद्ं यूयमप्यद्य मत्सकाशान्निबोधत ॥ ११९ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
प्रथमोऽध्यायः ॥
जिस प्रकार, मनु से पूर्वकाल में मैंने पूछा, तब यह शास्त्र उन्हों
ने उपदेश किया । उसी प्रकार अब आप मेरे से सुनिये ॥ ११९ ॥
पहला अध्याय समाप्त ॥