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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

नवां अध्याय । ३२५

नवां अध्याय । ३२५
यथा बीजं न वप्तव्यं पुंसा परपरिग्रहे ॥ ४२ ॥
धान, साठा, मूंग, तिल, उड़द, जव, लसुन और ईख बोने पर
अपने बीज के अनुसार ही उगते हैं। वीज दूसरा, वृक्ष दूसरा उगे
यह नहीं होता। जो बीज होता है, उसीका वृक्ष पैदा होता है।
इसलिए बुद्धिमान् , विनीत, ज्ञान-विज्ञान-विशारद को परस्त्री
में बीज न बोना चाहिए। प्राचीन इतिहास के ज्ञाता ऋषि इस
विषय में वायु की गाई गाथा गाते हैं-परस्त्री में पुरुष को बीज
न बोना चाहिए ॥ ३६-४२ ॥
नश्यतीषुर्येथा विद्धः खे विद्धमनुविध्यतः ।
तथा नश्यति वै क्षिप्रं बीजं परपरिग्रहे ॥ ४३ ॥
पृथोरपीमां पृथिवीं भार्यां पूर्वविदो विदुः ।
स्थाणुच्छेदस्य केदारमाहुः शल्यवतो मृगम् ॥ ४४ ॥
एतावानेव पुरुषो यज्जायात्मा प्रजेति ह ।
विप्राः प्राहुस्तथा चैतद्यो भर्ता सा स्मृताङ्गना ॥ ४५ ॥
न निष्क्रयविसर्गाभ्यां भर्तुर्भार्या विमुच्यते ।
एवं धर्मं विजानीमः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥ ४६ ॥
जैसे दूसरे के वेधे मृग को फिर मारने से बाण निष्फल होता
है, ऐसे परस्त्री में बोया बीज शीघ्र निष्फल होता है। इस पृथिवी
को जो पहले राजा पृथुकी भार्या थी, अब भी लोग पृथुकी भार्या
ही जानते हैं। जो वृक्ष काटकर साफ़ करता है उसका खेत और
जिसका पहले बाण लगे उसका वह मृग कहलाता है। स्त्री आप और
सन्तान ये तीनों मिलकर एक पुरुष कहलाता है। वेदज्ञ ब्राह्मण
भी कहते हैं कि जो भर्ता है वही भार्या है * । बेंचने वा छोड़ने से

  • शतपथब्राह्मण में श्रुति है—'अर्धो ह वा एव आत्मनस्तस्माद्यायां न विन्दते
    नैतावत्प्रजायते, असर्वो हि तावद्भवति । अथ यदैव जायां विन्दतेऽथ प्रजायते तर्हि
    सर्वो भवति' ।

३२६ मनुस्मृति।
भार्या अपने पति से नहीं छूटती । ऐसी धर्ममर्यादा, प्रजापति
की रची हम जानते हैं ॥ ४३-४६ ॥
सकृदंशो निपतति सकृत्कन्या प्रदीयते ।
सकृदाह ददानीति त्रीण्येतानि सतां सकृत् ॥ ४७ ॥
यथा गोऽश्वोष्ट्रदासीषु महिष्यजाविकासु च ।
नोत्पादकः प्रजाभागी तथैवान्याङ्गनास्वपि ॥ ४८ ॥
येऽक्षेत्रिणो बीजवन्तः परक्षेत्रप्रवापिणः ।
ते वै शस्यस्य जातस्य न लभन्ते फलं क्वचित् ॥ ४६ ॥
यदन्यगोषु वृषभो वत्सानां जनयेच्छतम् ।
गोमिनामेव ते वत्सा मोघं स्कन्दितमार्षभम् ॥ ५० ॥
तथैवाक्षेत्रिणो बीजं परक्षेत्रप्रवापिणः ।
कुर्वन्ति क्षेत्रिणामर्थं न बीजी लभते फलम् ॥ ५१ ॥
भाइयों का बँटवारा एक बार ही होता है । कन्यादान एक
बार होता है और दान भी एकही बार कहने से होजाता है—सत्पु-
रुष इन तीन बातों को एकवार ही करते हैं । जैसे गौ, घोड़ी,
ऊंटनी, दासी, भैंस, बकरी और भेड़ आदि में सन्तान पैदा करने
वाला उस सन्तान का स्वामी नहीं माना जाता, ऐसेही परस्त्री
में सन्तान का भागी नहीं होता । जो क्षेत्र स्वामी न होकर, बीज
बोनेवाले हों, वे उस खेत के अन्नादि फल को नहीं पासकते हैं ।
एक बैल दूसरे की गायों में सैकड़ों बछड़े पैदा करता है, वे गौ
वालों के होते हैं और बैल का वीर्य निष्फल जाता है, वैसे ही
परक्षेत्र में बोनेवाले खेतवाले का काम करते हैं, बीजवाला फल
नहीं पाता ॥ ४७-५१ ॥
फलं त्वनभिसंधाय क्षेत्रिणां बीजिनां तथा ।