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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 57, कुल 649 में से

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पृष्ठ 57

भूमिका । ५५

है। इस विषय पर 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' की 'विद्वत्तोषिणी'
टीका में श्रीबालराम उदासीन साधुने 'कर्मकाण्डोन्मूलन
परिणामिका एक विशाल वक्तृता दिखलाई है जिसके प्राति-
स्विक विचार का अवकाश यहां नहीं है।
और 'संज्ञपन' को सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म भी नहीं
स्थिर कर सकते क्योंकि 'चत्वार्यब्दसहस्राणि-' इस व्यास-
वाक्य से भी त्रेताग्निनसाध्य कर्मों का अनुष्ठान कलि में प्राप्त
होता है, वह देशकालपात्र के संकोच से कुछ दिन के लिये
कहागया है यह दूसरी बात है। और 'गोसंज्ञप्तिश्च गोसवे'
इत्यादि विशेष संज्ञपन तो श्रुति-स्मृति से सुतरां निषिद्ध हैं।
पर अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, सोम आदि कतिपय यज्ञ निषिद्ध
नहीं हैं, अतएव उनके प्रातिस्विक निषेध वाक्य भी नहीं
प्राप्त होते और वे दाक्षिणात्यशिष्टों में अद्य भी कथमपि किये
जाते हैं। रहगया 'कलिवर्ज्य' प्रकरण लेख, वह 'श्वानं
युवानं मघवानमाह' इस के समान है। यह अवश्य विचार-
णीय क्या बल्कि महान् विचारणीय विषय है कि जब स्मृति
से श्रुति का बाध नहीं हो सकता और देश, काल, पात्र के
संकोच से अनेक कर्मों के अनुष्ठान से सुकृत के बदले दुष्कृत
खड़े होने की पूरी आशङ्का है तब महानुभावों ने 'कलिवर्ज्य'
व्यवस्था की। जिसमें श्रुतिविहित, स्मृतिविहित, सामर्थ्य-
विहित और आचारविहित कितने एक कर्मोंका निषेध तथा


१ आपने स्वपरिष्कृत पातञ्जलयोगभाष्य के प्रारम्भ में एक 'योगतत्त्वसमीक्षा'
नाम की भूमिका लिखी है जिसमें वेदान्त सिद्धान्तों को आड़े हाथों से संभाला है,
उसका उद्धार वेदान्तपरिभाषा की सगणप्रभा-शिखामणि टीका की भूमिका
में श्रीगोविन्द सिंह निर्मल साधुने किया है।