मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
दूसरा अध्याय । ५६
दूसरा अध्याय । ५६
या यज्ञकर्म में शिष्य हो तो भी वेद का अध्यापक होने से गुरु-
तुल्य मान्य होता है ॥ २०४-२०८ ॥
उत्सादनं च गात्राणां स्नापनोच्छिष्टभोजने ।
न कुर्याद्गुरुपुत्रस्य पादयोश्चावनेजनम् ॥ २०६ ॥
गुरुवत्प्रतिपूज्याः स्युः सवर्णा गुरुयोषितः ।
असवर्णास्तु संपूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः ॥ २१० ॥
अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च ।
गुरुपत्न्या न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम् ॥ २११ ॥
गुरु के समान गुरुपुत्र के तैल मलना, स्नान कराना, पैर
दबाना और झूठा खाना इतना काम न करना चाहिए। गुरु की
स्त्री सजातीय हो तो गुरुसमान पूज्य है, नहीं तो उसको उठकर
प्रणाम करले-यही सेवा है। तैल मलना, स्नान कराना, शरीर
दाबना, फूलों से बाल गूंथना, ये काम गुरुस्त्री के न करना
चाहिए ॥ २०६-२११ ॥
गुरुपत्नी तु युवतिर्नाभिवाद्येह पादयोः ।
पूर्णविंशतिवर्षेण गुणदोषौ विजानता ॥ २१२ ॥
स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम् ।
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः ॥ २१३ ॥
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः ।
प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ॥ २१४ ॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ २१५ ॥
कामं तु गुरुपत्नीनां युवतीनां युवा भुवि ।
विधिवद्वन्दनं कुर्यादसावहमिति ब्रुवन् ॥ २१६ ॥
६० मनुस्मृति ।
पूरे बीस साल का जवान और भला बुरा जाननेवाला शिष्य
जवान गुरुस्त्री के पैर छूकर प्रणाम न करे, दूर से सदा करे। यह
स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पुरुषों को दोष लगा देना, इस
लिए बुद्धिमान् स्त्रियों से सदा सावधान रहते हैं। संसार में
पुरुष पण्डित हो या मूर्ख, उसको काम, क्रोध के वश कुमार्ग में
लेजाने को स्त्रियां बड़ी समर्थ होती हैं। माता, बहन वा लड़की
के साथ भी एकान्त में न बैठे, क्योंकि इन्द्रियां ऐसी प्रबल हैं कि
विद्वान् के मनको भी खींच लेती हैं। यदि इच्छा हो तो युवा
शिष्य युवती गुरुपत्नी को 'मैं अमुक हूं' कहकर दूर से प्रणाम
करलेवे ॥ २१२–२१६ ॥
विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम् ।
गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ २१७ ॥
यथा खनन्खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति ।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ २१८ ॥
मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवा स्याच्छिखाजटः ।
नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत् सूर्यो नाभ्युदयात्क्वचित् ॥ २१६ ॥
विदेश से आने पर पैर छूकर और रोज़ दूर से, गुरुस्त्री को
प्रणाम करना चाहिए। यही शिष्यों का आचार है। जैसे पुरुष
कुदाल-फावड़े से भूमि खोदता हुआ जल पाता है वैसे सेवा से
गुरुविद्या को पाता है। ब्रह्मचारी, मुण्डित या शिखावाला, या
जटाधारी हो उसको गाँव के भीतर सूर्योदय और सूर्यास्त न
होना चाहिए। अर्थात् दोनों काल में गाँव के बाहर सन्ध्या-गायत्री
की उपासना में रहना चाहिए ॥ २१७–२१६ ॥
तं चेदभ्युदियात्सूर्यः शयानं कामचारतः ।
निम्लोचेद्वाप्यविज्ञानाज्जपन्नुपवसेद्दिनम् ॥ २२० ॥
सूर्येण ह्यभिनिर्मुक्तः शयानोऽभ्युदितश्च यः।
प्रायश्चित्तमकुर्वाणो युक्तः स्यान्महतेनसा ॥ २२१ ॥