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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २८७

आठवां अध्याय । २८७
शम्यापातास्त्रयो वापि त्रिगुणो नगरस्य तु ॥ २३७ ॥
तत्रापरीवृतं धान्यं विहिंस्युः पशवो यदि ।
न तत्र प्रणयेद्दण्डं नृपतिः पशुरक्षिणाम् ॥ २३८ ॥
गाँव के चारों तरफ़ चार सौ हाथ या तीन लकड़ी फेंकने पर
जितनी दूर गिरें वहां तक और नगर के आसपास उसकी
तिगुनी भूमि पशुओं के लिए छोड़ रखना उचित है, इस भूमि को
'परिहार' कहते हैं । उस भूमि में बाड़ न होने से अन्न कोई
पशु खालें तो राजा चरवाह को दण्ड न देय ॥ २३७-२३८॥
वृत्तिं तत्र प्रकुर्वीत यामुष्ट्रो न विलोकयेत् ।
छिद्रं च वारयेत्सर्वं श्वसूकरमुखानुगम् ॥ २३६ ॥
पथि क्षेत्रे परिवृते ग्रामान्तीयेऽथवा पुनः ।
स पालः शतदण्डार्हो विपालांश्चारयेत्पशून् ॥ २४० ॥
क्षेत्रेष्वन्येषु तु पशुः सपादं पणमर्हति ।
सर्वत्र तु सदो देयः क्षेत्रिकस्येति धारणा ॥ २४१ ॥
अनिर्दशाहां गां सूतां वृषान् देवपशूंस्तथा ।
स पालांवाविपालान्वानदण्ड्यान्मनुरब्रवीत्॥२४२।
क्षेत्रियस्यात्यये दण्डो भागाद्दशगुणो भवेत् ।
ततोऽर्धदण्डो भृत्यानामज्ञानात्क्षेत्रियस्य तु ॥ २४३ ॥
एतद्विधानमातिष्ठेद्धार्मिकः पृथिवीपतिः ।
स्वामिनां च पशूनां च पालानां च व्यतिक्रमे ॥ २४४ ॥
उस भूमि के बचाने को इतनी ऊंची वाड़ करे जिसमें ऊंट न
देख सकें और छोटे छेदों को बंद करदें जिसमें सुअर, कुत्ता का
मुँह न जासके। गाँव के या रास्ते के पास बाड़ से घिरे खेतों का

२८८ मनुस्मृति ।
अन्न पशु खालें तो चरवाह को सौ पण दण्ड करे और विना चर-
वाह के पशुओं को हाँक देवे। दूसरे खेतों में पशु हानि करे तो
चरवाह पर सवां पण दण्ड करे। और खेत के स्वामी की हानि
तो सब हालत में देनो ही चाहिए। दश दिन के भीतर की वियाई
गो, सांड़ और देवार्पण करके छोड़े हुए पशु खेत खालें तो चर-
वाह साथ हो या न हो, दण्ड नहीं होसकता-मनुजी फ़रमाते
हैं। यदि खेतवालेही के पशु खेत चरें तो राजा हानि से दश-
गुणा दण्ड करे और हलवाहों की भूल से हो तो उसका आधा
दण्ड करे। इसभांति पशुओं के स्वामी, पशु और चरवाह के
अपराध होनेपर धार्मिक राजा न्याय करे ॥ २३६-२४४ ॥
सीमां प्रति समुत्पन्ने विवादे ग्रामयोर्द्वयोः ।
ज्येष्ठे मासि नयेत्सीमां सुप्रकाशेषु सेतुषु ॥ २४५ ॥
सीमावृक्षांश्च कुर्वीत न्यग्रोधाश्वत्थकिंशुकान् ।
शाल्मलीन्सालतालांश्च क्षीरिणश्चैव पादपान्॥२४६॥
सीमा-सरहद् का निर्णय ।
यदि दो गाँवों के हद का झगड़ा उठे तो जेठ मास में जब
ज़मीन साफ़ हो तब उसका निश्चय करना। हद जानने के लिए
बड़, पीपल, ढाक, सैमर, साल, ताल और दूधवाले कोई वृक्ष
स्थापित करे ॥ २४५-२४६ ॥
गुल्मान्वेणूंश्च विविधाञ्छमीवल्लीस्थलानि च ।
शरान् कुब्जक गुल्मांश्च तथा सीमा न नश्यति॥२४७॥
तडागान्युदपानानि वाप्यः प्रस्रवणानि च ।
सीमासंधिषु कार्याणि देवतायतनानि च ॥ २४८ ॥
उपच्छन्नानि चान्यानि सीमलिङ्गानि कारयेत् ।
सीमाज्ञाने नृणां वीक्ष्य नित्यं लोके विपर्ययम् ॥ २४६॥