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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

दसवाँ अध्याय। ३७७

दसवाँ अध्याय। ३७७
शूद्रादायोगवः क्षत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम्।
वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसंकराः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण से वैश्यकन्या में अम्बष्ठ जाति का पुत्र होता है और
शूद्रकन्या में निषाद * ओर पारशव कहा जाता है। क्षत्रिय से
शूद्रकन्या में क्रूर आचारवाला पुत्र उग्रजाति का कहलाता है,
क्योंकि उसका शरीर क्षत्रिय और शूद्रा से हुआ है। ब्राह्मण के
क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र जाति की कन्या से, क्षत्रिय के वैश्य-शूद्र-
कन्या से और वैश्य के शूद्र जाति की कन्या से उत्पन्न हुए पुत्र
अपसद-नीच कहलाते हैं। क्षत्रिय से ब्राह्मणीकन्या में पैदा हुआ
पुत्र जाति से सूत होता है। वैश्य से ब्राह्मणी में वैदेह जाति का
और वैश्य से क्षत्रिया में मागध जाति का होता है। शूद्र से
वैश्या, क्षत्रिया और ब्राह्मणी में क्रम से अयोगव, क्षत्ता और चा-
ण्डाल जाति के पुत्र होते हैं और ये मनुष्यों में अधम-वर्णसङ्कर
कहलाते हैं ॥ ८-१२ ॥
एकान्तरे त्वानुलोम्यादम्बष्ठोग्रौ यथा स्मृतौ ।
क्षतृवैदेहकौ तद्वत्प्रातिलोम्येऽपि जन्मनि ॥ १३ ॥
पुत्रा येऽनन्तरस्त्रीजाः क्रमेणोक्ता द्विजन्मनाम् ।
ताननन्तरनाम्नस्तु मातृदोषात्प्रचक्षते ॥ १४ ॥
ब्राह्मणादुग्रकन्यायामावृत्तो नाम जायते ।
आभीरोऽम्बष्ठकन्यायामायोगव्यां तु धिग्वणः ॥ १५ ॥
एक एक जाति के अन्तर से अर्थात् ब्राह्मण से वैश्या में अनुलोम
से उत्पन्न पुत्र जैसे अम्बष्ठ और उग्र कहे हैं वैसे प्रतिलोम से
अर्थात् शूद्र से क्षत्रिया में उत्पन्न पुत्र क्षत्ता और वैदेह कहलाते

  • निषाद संकर जाति का बोधक है। निरुक्त में 'निषादः पञ्चमः' लेख है। यहां
    पर जो वैश्य और शूद्रकन्याओं का ग्रहण है उसको विवाहिता समझना चाहिए।
    क्योंकि याज्ञवल्क्य का वचन है:—‘विन्नास्वेष विधिः स्मृतः ।’
    ४८

३७८ मनुस्मृति ।
हैं। द्विजों के नीचे जाति की स्त्री में माता के दोष से उत्पन्न पुत्र
'अनन्तर' कहलाते हैं। ब्राह्मण से उग्र की कन्या में आवृत जाति
का अम्बष्ठकन्या में आभीर जाति का और आयोगवी में धिग्बण
जाति का पुत्र कहलाता है ॥ १३-१५ ॥
आयोगवश्च क्षत्ता च चाण्डालश्चाधमो नृणाम् ।
प्रातिलोम्येन जायन्ते शूद्रादपसदास्त्रयः ॥ १६ ॥
वैश्यान्मागधवैदेहौ क्षत्रियात्सूत एव तु ।
प्रतीपमेते जायन्ते परेऽप्यपसदास्त्रयः ॥ १७ ॥
जातो निषादाच्छूद्रायां जात्या भवति पुक्कसः ।
शूद्राज्जातो निषाद्यां तु स वै कुक्कुटकः स्मृतः ॥ १८ ॥
क्षत्तृर्जातस्तथोग्रायां श्वपाक इति कीर्त्यते ।
वैदेहकेन त्वम्बष्ठायामुत्पन्नो वेण उच्यते ॥ १६ ॥
द्विजातयः सवर्णासु जनयन्त्यव्रतांस्तु यान् ।
तान् सावित्री परिभ्रष्टान् व्रात्यानिति विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥
व्रात्यात्तु जायते विप्रात्पापात्मा भूर्जकण्टकः ।
आवन्त्यवाटधानौ च पुष्पधः शैख एव च ॥ २१ ॥
झल्लो मल्लश्च राजन्याद्व्रात्यान्निच्छिविरेव च ।
नटश्च करणश्चैव खसो द्रविड एव च ॥ २२ ॥
वैश्यात्तु जायते व्रात्यात्सुधन्वाचार्य एव च ।
कारुषश्च विजन्मा च मैत्रः सात्वत एव च ॥ २३ ॥
आयोगव, क्षत्ता और चाण्डाल ये शूद्र से प्रतिलोमभाव से
पैदा तीन मनुष्यों में अधमहैं अपसदहैं । वैश्य से मागध और वैदेह
और क्षत्रिय से सूत, ये तीन भी प्रतिलोमभाव से पैदा होते हैं

अपसद् हैं। निषाद से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र 'पुक्कस' जाति का और
शूद्र से निषादकन्या में कुक्कुट जाति का पुत्र होता है। इसीप्रकार
क्षत्ता से उग्रकन्या में 'श्वपाक' और वैदेह से अम्बष्ठी में 'वेण'
कहलाता है। द्विजाति अपनी सवर्णा स्त्री में उत्पन्न पुत्रों का सं-
स्कार जो न करें तो वे गायत्रीभ्रष्ट 'व्रात्य' कहलाते हैं। व्रात्य
ब्राह्मण से पापी-भूर्जकंटक उत्पन्न होते हैं, उन की आवन्त्य, वाट-
धान, पुष्पध और शैखसंज्ञा होती है। व्रात्य-क्षत्रिय से उत्पन्न
पुत्र झल्ल, मल्ल, निच्छिवि, नट, करण, खस और द्रविड़ कहलाते
हैं। व्रात्य-वैश्य से उत्पन्न पुत्र सुधन्वाचार्य, कारुष, बिजन्मा, मैत्र
और सात्वत कहलाते हैं ॥ १६-२३ ॥
व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च ।
स्वकर्मणां च त्यागेन जायन्ते वर्णसंकराः ॥ २४ ॥
संकीर्णयोनयो ये तु प्रतिलोमानुलोमजाः ।
अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च तान् प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २५ ॥
सूतो वैदेहकश्चैव चण्डालश्च नराधमः ।
मागधः क्षत्तृजातिश्च तथाऽयोगव एव च ॥ २६ ॥
एते षट् सदृशान्वर्णान्जनयन्ति स्वयोनिषु ।
मातृजात्यां प्रसूयन्ते प्रवरासु च योनिषु ॥ २७॥
तथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते ।
आनन्तर्यात्स्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ॥२८॥
ब्राह्मणादि वर्णों में आपस के व्यभिचार से, अपने सगोत्रा के
साथ विवाह न करने से और अपने वर्णाश्रम धर्मों को छोड़ने से
वर्णसङ्कर उत्पन्न होते हैं। जो सङ्कीर्णयोनि, प्रतिलोम और अनु-
लोम के परस्पर सम्बन्ध से उत्पन्न होती हैं उनको विशेषरीति से
कहते हैं:-सूत, वैदेह, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता और आयोगव ये छः
पुरुष अपनी माता की जाति में और अपने से ऊंची जाति में जो

३८० मनुस्मृति ।
सन्तान पैदा करें वे अपनी जाति की होती हैं। और जैसे ब्राह्मण
का तीनों वर्गों में से क्षत्रिय और वैश्यकन्या में और अपनी जाति
की कन्या में पैदा पुत्र द्विज कहाजाता है, वैसे क्षत्रिय से ब्राह्मणी,
वैश्य से क्षत्रिया और ब्राह्मणीकन्या में उत्पन्न पुत्र उत्तम गिने
जाते हैं ॥ २४-२८ ॥
ते चापि बाह्यान्सुबहूंस्ततोऽप्यधिकदूषितान् ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥ २९ ॥
यथैव शूद्रो ब्राह्मण्यां बाह्यं जन्तुं प्रसूयते ।
तथा बाह्यतरं बाह्यश्चातुर्वर्ण्ये प्रसूयते ॥ ३० ॥
प्रतिकूलं वर्तमाना बाह्याद्वाह्यतरान् पुनः ।
हीना हीनान् प्रसूयन्ते वर्णान् पञ्चदशैव तु ॥ ३१ ॥
आयोगव आदि छः प्रतिलोम पुत्र परस्पर में अपने से अधम
जाति के पुत्रों को पैदा करते हैं । जैसे शूद्र ब्राह्मण की कन्या में
वर्णसंकर चाण्डाल पुत्र पैदा करता है वैसे चाण्डाल चारोंवर्ण
की कन्याओं में अपने से भी नीच-जाति के पुत्रों को उत्पन्न करता
है। चाण्डाल वगैरह अपनी दूसरी पाँच प्रतिलोम जातियों में
अति अधम पुत्रों को उत्पन्न करते हैं और प्रतिलोम जाति के वर्ण-
संकर अपने से उत्तम जाति की कन्या में हीन जाति के पन्द्रह
पुत्रों को उत्पन्न करता है । अर्थात् चारोंवर्ण की स्त्रियों में तीन
अधमों के तीन तीन पुत्र बारह हुए और उनके पिता तीन अधम
मिलकर १५ हुए ॥ २९-३१ ॥
प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ।
सैरन्ध्रं वागुरावृत्तिं सूते दस्युरयोगवे ॥ ३२ ॥
मैत्रेयकं तु वैदेहो माधूकं संप्रसूयते ।
नृन्प्रशंसत्यजस्रं यो घण्टाताडोऽरुणोदये ॥ ३३ ॥