मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
ग्यारहवां अध्याय । ४०७
ग्यारहवां अध्याय । ४०७
निन्द्यैर्हि लक्षणैर्युक्ता जायन्तेऽनिष्कृतैनसः ॥ ५४ ॥
ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वङ्गनागमः ।
महान्ति पातकान्याहुः संसर्गश्चापि तैः सह ॥ ५५ ॥
अनृतं च समुत्कर्षे राजगामि च पैशुनम् ।
गुरोश्चालीकनिर्वन्धः समानि ब्रह्महत्यया ॥ ५६ ॥
इसलिए पापशुद्धि के लिये नित्य प्रायश्चित्त करना चाहिएं ।
जो लोग नहीं करते वे दूषित लक्षणयुक्त होजाते हैं । ब्रह्महत्या,
मद्यपान, सुवर्ण की चोरी, गुरुस्त्री से व्यभिचार और इन महा-
पापों के करनेवाले का संसर्ग ये सब महापातक कहे हैं । अपनी
बड़ाई में झूठ कहना, राजा से किसी की चुगली करना और गुरु
को झूठा दोष लगाना—ये पाप ब्रह्महत्या के समान हैं ॥५४—५६॥
ब्रह्मोञ्झता वेदनिंदा कौटसाक्ष्यं सुहृद्वधः ।
गर्हितान्नाद्ययोर्जग्धिः सुरापानसमानि षट् ॥ ५७ ॥
निक्षेपस्यापहरणं नराश्वरजतस्य च ।
भूमिवज्रमणीनां च रुक्मस्तेयसमं स्मृतम् ॥ ५८ ॥
रेतः सेकः स्वयोनीषु कुमारीष्वन्त्यजासु च ।
सख्युः पुत्रस्य च स्त्रीषु गुरुतल्पसमं विदुः ॥ ५९ ॥
गोवधोऽयाज्यसंयाज्यपारदार्यात्मविक्रयाः ।
गुरुमातृपितृत्यागः स्वाध्यायाग्न्योः सुतस्य च ॥ ६० ॥
परिवित्तितानुजेऽनूढे परिवेदनमेव च ।
तयोर्दानं च कन्यायास्तयोरेव च याजनम् ॥ ६१ ॥
कन्याया दूषणं चैव वार्धुष्यं व्रतलोपनम् ।
तडागारामदाराणामपत्यस्य च विक्रयः ॥ ६२ ॥
४०८ मनुस्मृति ।
व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च ।
भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥ ६३ ॥
सर्वाकरेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् ।
हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥ ६४ ॥
वेद को भूलजाना, वेद की निंदा करना, झूठी गवाही देना,
मित्र का वध करना और अभक्ष्य को खाना, ये छः मद्यपान के
समान हैं । धरोहर का मारना, मनुष्य, घोड़ा, चांदी, भूमि, हीरा
और मणि चुराना सुवर्णचोरी के माफिक है । सहोदर बहन,
कुमारी कन्या, चाण्डालिनी, मित्र और पुत्र की स्त्री से समागम
करना गुरुपत्नी के साथ समागम के समान हैं । गोहत्या करना,
व्रात्य, शूद्रों को यज्ञ कराना, परस्त्री से व्यभिचार, अपने को दास-
रूप से बेचना, योग्य गुरु को त्यागना, निर्दोष माता-पिता को
त्यागना, स्वाध्याय न करना, स्मार्त्ताग्नि को छोड़ना ये सब उप-
पातक हैं। छोटा भाई पहले विवाह करके अग्निहोत्र धारण करे
तो बड़ा भाई 'परिवित्ति' कहाता है, उस बड़े और छोटे भाई
को कन्या देना, उनको ऋत्विज् बनाना, कन्या को दूषण लगाना,
शास्त्रमर्यादा से ब्याज अधिक लेना, व्रत को तोड़ना, तालाब,
बगीचा, स्त्री और सन्तान को बेचना, समय पर संस्कार न करना,
बांधवों का पालन न करना, शिष्यों से मासिक लेकर पढ़ाना,
नौकरी देकर पढ़ना, न बेचने योग्य घी-दूध आदि बेचना, सोने
की खानों पर राजाज्ञा से अधिकारी होना, बड़े यन्त्र-कलों का
चलाना, हरी जड़ी बूटियों को काटना, स्त्री से जीविका करना,
अभिचार करना और वशीकरण करना-ये सब उपपातक हैं॥५७-६४॥
इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् ।
आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ॥ ६५ ॥
अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामनपक्रिया ।
असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥ ६६ ॥