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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २७६

आठवां अध्याय । २७६
बह जाय, आग में जल जाय तो यदि साहूकार ने उसमें से कुछ
न लिया हो, तो देनी नहीं पड़ती। जो धरोहर न लौटावे या जो
बिना रक्खेही जाल से मांगे उन दोनों का साम आदि उपाय
और वैदिक शपथों (हलफ़) से राजा निर्णय करे। जो धरोहर
नहीं देता, या जो बिना रक्खे ही मांगता है, उन दोनों को राजा
चोर के समान दण्ड देवे और धरोहर के बराबर जुर्माना
करे ॥ १८४-१६१ ॥
निक्षेपस्यापहर्त्तारं तत्समं दापयेद्दमम् ।
तथोपनिधिहर्त्तारमविशेषेण पार्थिवः ॥ १६२ ॥
उपदाभिश्च यः कश्चित्परद्रव्यं हरेन्नरः ।
स सहायः स हन्तव्यः प्रकाशं विविधैर्वधैः ॥ १६३ ॥
निक्षेपो यः कृतो येन यावांश्च कुलसन्निधौ ।
तावानेव स विज्ञेयो विब्रुवन् दण्डमर्हति ॥ १६४ ॥
मिथोदायः कृतो येन गृहीतो मिथ एव वा ।
मिथ एव प्रदातव्यो यथादायस्तथा ग्रहः ॥ १६५ ॥
निक्षिप्तस्य धनस्यैवं प्रीत्योपनिहितस्य च ।
राजा विनिर्णयं कुर्यादक्षिपन्न्यासधारिणम् ॥ १६६ ॥
धरोहर और उपनिधि मारलेनेवालों को भी राजा यही दण्ड
देवे। छल, कपट करके पराया धन हरनेवालों को उनके मदद-
गारों के साथ सबके सामने अनेक पीड़ा दण्ड देवे। गवाहों के
सामने जितना धरोहर हो उतना स्वीकार करने से पीछे, बखेड़ा
करनेवाला दण्डनीय होता है। जिसने एकान्त में धरोहर रक्खी
और एकान्त में ली हो, वह एकान्त में ही देना चाहिए। जैसे
लेवे, वैसे देवे। धरोहर और प्रेमसे भोगार्थ दिए धन का फ़ैसला
ऐसा करना चाहिए, जिसमें धरोहर करनेवाले को कोई दुःख न
पहुँचे ॥ १६२-१६६ ॥

२८० मनुस्मृति ।
विक्रीणीते परस्य स्वं योऽस्वामी स्वाम्यसंमतः ।
न तं नयेत साक्ष्यं तु स्तेनमस्तेनमानिनम् ॥ १९७ ॥
अवहार्यो भवेच्चैव सान्वयः षट्शतं दमम् ।
निरन्वयोऽनपसरः प्राप्तः स्याच्चौरकिल्विषम्॥ १९८॥
अस्वामिना कृतो यस्तु दायो विक्रय एव वा ।
अकृतः स तु विज्ञेयो व्यवहारे यथास्थितिः ॥ १९६ ॥
दूसरे की वस्तु विना मालिक की आज्ञा जिसने बेंची हो उस
चोर व साहूकार को विना गवाह चोर की भांति दण्ड देवे । दूसरे
की वस्तु बेंचनेवाला यदि उस धन के मालिक के वंश में हो तो
छः सौ पण दण्ड देवे और सम्बन्धी या बेंचने का अधिकार न
रखता हो तो चोर के मुवाफ़िक़ दण्ड योग्य है । इस प्रकार विना
मालिक की आज्ञा, बेंचा या दियाहुआ कोई पदार्थ नाजायज़ है ।
यही धर्मशास्त्र (क़ानून) की मर्यादा है ॥ १९७–१९६ ॥
सम्भोगो दृश्यते यत्र न दृश्येतागमः क्वचित् ।
आगमः कारणं तत्र न सम्भोग इति स्थितिः ॥ २०० ॥
विक्रियाद्यो धनं किञ्चिद् गृह्णीयात्कुलसन्निधौ ।
क्रयेण स विशुद्धं हि न्यायतो लभते धनम् ॥ २०१ ॥
अथ मूलमनाहार्यं प्रकाशक्रयशोधितः ।
अदण्ड्यो मुच्यते राज्ञा नाष्टिको लभते धनम् ॥ २०२ ॥
नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमहति ।
न चासारं न च न्यूनं न दूरेण तिरोहितम् ॥ २०३ ॥
जिसको कोई वस्तु भोगते देखे पर खरीदते न देखा हो तो
दूसरे का खरीद का लेख आदि प्रमाण होगा। भोग प्रमाण न
होगा। यह व्यवहार की मर्यादा है। जो ज़ाहिर तौर से विकती