मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
टीका में श्रीबालराम उदासीन साधुने 'कर्मकाण्डोन्मूलन
भूमिका । ५५
है। इस विषय पर 'सांख्यतत्त्वकौमुदी' की 'विद्वत्तोषिणी'
टीका में श्रीबालराम उदासीन साधुने 'कर्मकाण्डोन्मूलन
परिणामिका एक विशाल वक्तृता दिखलाई है जिसके प्राति-
स्विक विचार का अवकाश यहां नहीं है।
और 'संज्ञपन' को सामान्यतः युगान्तरीय-धर्म भी नहीं
स्थिर कर सकते क्योंकि 'चत्वार्यब्दसहस्राणि-' इस व्यास-
वाक्य से भी त्रेताग्निनसाध्य कर्मों का अनुष्ठान कलि में प्राप्त
होता है, वह देशकालपात्र के संकोच से कुछ दिन के लिये
कहागया है यह दूसरी बात है। और 'गोसंज्ञप्तिश्च गोसवे'
इत्यादि विशेष संज्ञपन तो श्रुति-स्मृति से सुतरां निषिद्ध हैं।
पर अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, सोम आदि कतिपय यज्ञ निषिद्ध
नहीं हैं, अतएव उनके प्रातिस्विक निषेध वाक्य भी नहीं
प्राप्त होते और वे दाक्षिणात्यशिष्टों में अद्य भी कथमपि किये
जाते हैं। रहगया 'कलिवर्ज्य' प्रकरण लेख, वह 'श्वानं
युवानं मघवानमाह' इस के समान है। यह अवश्य विचार-
णीय क्या बल्कि महान् विचारणीय विषय है कि जब स्मृति
से श्रुति का बाध नहीं हो सकता और देश, काल, पात्र के
संकोच से अनेक कर्मों के अनुष्ठान से सुकृत के बदले दुष्कृत
खड़े होने की पूरी आशङ्का है तब महानुभावों ने 'कलिवर्ज्य'
व्यवस्था की। जिसमें श्रुतिविहित, स्मृतिविहित, सामर्थ्य-
विहित और आचारविहित कितने एक कर्मोंका निषेध तथा
१ आपने स्वपरिष्कृत पातञ्जलयोगभाष्य के प्रारम्भ में एक 'योगतत्त्वसमीक्षा'
नाम की भूमिका लिखी है जिसमें वेदान्त सिद्धान्तों को आड़े हाथों से संभाला है,
उसका उद्धार वेदान्तपरिभाषा की सगणप्रभा-शिखामणि टीका की भूमिका
में श्रीगोविन्द सिंह निर्मल साधुने किया है।
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५६ मनुस्मृति ।
[Main Text]
किसी किसी निषिद्ध का विधान भी किया है । और वैदिक
' पशुसंज्ञपन ' पिष्टपशु साध्य है, यह भी नहीं कह सकते ।
क्योंकि ' न वा उ एतन्म्रियसे-' इस उक्त श्रुति का विरोध
होता है, तथा ' अग्नीषोमाभ्यां छागस्य वपायै मेदसोऽनुब्रूहि '
इत्यादि श्रुतियों का पैष्टिक पशु में अत्यन्त बाध है तथा
पिष्टपशु करने का विधिवाक्य भी नहीं है जो ' श्रूयते हि पुरा
कल्पे नृणां व्रीहिमियः पशुः ' इत्यादि वाक्यों से विधि की कल्पना
की जाती है वह ' पुराकल्पे तु नारीणां मौञ्जीबन्धनमिष्यते '
इसके समान उपेक्षणीय है । और जिस लक्ष्य से पिष्टपशु का
विधित्व माना जाता है उससे भी छूटना असंभव है क्योंकि-
' व्युत्थानावस्थायां रागादीनां वशप्रवृत्तायाम् । म्रियतां जीवो
मा वा धावतये ध्रुवं हिंसा ॥ ' तो अशास्त्रीयकर्म में अहंभाव से
पड़कर क्या फल है ? धन, नहीं निधन....इत्यादि ।
अग्निपुराण की शिक्षा है कि-
' अग्निष्टोमादिकर्माणि सापायानि कलौयुगे ।
गङ्गास्नानं हरेर्नाम निरपायमिदं द्वयम् ॥ '
संस्कार-व्यय । जातीय संस्कार ( द्विजत्वघटक-संस्कार )
में अल्पव्यय है । यदि ऐसा न होता तो धनिक ही जातिमान्
बन सकते; यह बात गृह्यस्मृतियों के देखने से साफ जाहिर है ।
पारस्कर गृह्यस्मृति के प्रधान व्याख्याता कर्काचार्य आव-
सथ्याधान के ' ततो ब्राह्मणभोजनम् ' इस अन्तिम सूत्र की
व्याख्या में सिद्धान्त करते हैं कि एक ब्राह्मण भोजन कराना ।
आशय यह है कि जहां प्रकृत के समान संख्या का ज्ञान न
हो वहां एक ब्राह्मण लेना और जहां ' ब्राह्मणान् भोजयित्वा'
[Footnote]
१ बृहन्नार में ।
भूमिका । ५७
ऐसा लिखा है वहां पर तीन ब्राह्मण लेना योग्य है । भगवान्
मनु ने भी कहा है कि-
‘ द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ ’
यद्यपि यह श्राद्ध का विषय है तो भी आतिदेशिक विधि
के अनुसार कर्मान्तर में भी इसका अनुरोध करना अनुचित
न होगा, यदि कोई प्रामाणिक विशेष वाक्य न उपस्थित हो।
यदि गृह्यस्मृति के अनुसार ब्राह्मण संख्या न्यून प्रतीत हो
तो इस यज्ञपार्श्व के वाक्य का आलम्बन करो-
‘ गर्भाधानादिसंस्कारे ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ।
शतं विवाहसंस्कारे पञ्चाशन्मेखलाविधौ ॥
आवसथ्ये त्रयस्त्रिंशच्छ्रौताधाने शतात्परम् ।
अष्टकं भोजयेद् भक्त्या तत्तत्संस्कारसिद्धये ॥
सहस्रं भोजयेत् सोमे ब्राह्मणानां शतं पशौ ।
चातुर्मास्ये तु चत्वारि शतानि पञ्च सुराग्रहे ॥
अयुतं वाजपेये च ह्यश्वमेधे चतुर्गुणम् ।
आग्रयणे प्रायश्चित्ते ब्राह्मणान् दश पञ्च च ॥’
२ । उपासनाकाण्ड । सर्वोपास्य-परमेश्वर, निर्विशेष
और सविशेष अर्थात् निर्गुण (अवाङ्मनसगोचर), सगुण
( वाङ्मनसगोचर ) श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास में अनेक
प्रकार से वर्णित है ।
निर्विशेष-परमेश्वर ( ब्रह्म )-
‘ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
५८ मनुस्मृति ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ '
कठोपनिषत्.
इस यजुर्वेदीय-कठशाखीय-श्रुति से ज्ञेय है । और
सविशेष परमेश्वर ( ब्रह्म )-
' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्य-
श्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः, तस्य यथा
कप्यासपुण्डरीकमेवमक्षिणी, तस्योदिति नाम, स एष सर्वेभ्यः
पाप्मभ्य उदितः, उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद,
इत्यधिदैवतम् । '
इस सामवेदीय-छान्दोग्य श्रुति से विज्ञेय है ।
विश्वरूपधारी श्रीनारायण ने नारद मुनि से कहा है कि-
' माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ।
सर्वभूतगुणैर्युक्तं, नैवं मां ज्ञातुमर्हसि ॥ '
शारीरकभाष्य.
अर्थात् हे नारद ! मैंने यह माया रची है जिससे तुम
मेरे को सविशेष देख रहे हो; नहीं तो तुम मेरे को ऐसा नहीं
जान सकते ।
इसी अभिप्राय से ' अन्तस्तद्धर्मापदेशात् १ । १ । २० '
इस ब्रह्मसूत्र के ' कल्पतरु ' में यह वचन लिखा है-
' निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः ।
ये मन्दास्तेऽनुकम्पन्ते सविशेषनिरूपणैः ॥
वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात् ।
तदेवाविर्भवेत् साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ '