मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पहला अध्याय । १७
पहला अध्याय । १७
मुवाफ़िक़ किया करता है । कृतयुग में धर्म पूरा, चार पैर का और
सत्यमय होता है क्योंकि उस समय में अधर्म से मनुष्यों का कोई
कार्य न बनता था । दूसरे युगों में धर्म क्रमसे चोरी, झूठ, माया इन
से धर्म चौथाई चौथाई घटता है । सत्ययुग में सब रोग रहित होते
हैं । सारे मनोरथ पूरे होते हैं । ४०० वर्ष की आयु होती है । आगे
त्रेता आदि में चतुर्थांश घटती जाती है । मनुष्यों को, वेदानुसार
आयु, कर्मों के फल और देह का प्रभाव, सब युगानुसार फल
देते हैं युगों के अनुसार, कृतयुग में दूसरे धर्म, त्रेता में उससे
दूसरा, द्वापर में उस से जुदा, कलिमें कुछ दूसरे ही प्रकार का, यों
बदला करता है और आपस में विलक्षण होता है ॥ ७६-८५ ॥
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ।
द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेकं कलौ युगे ॥ ८६ ॥
सर्वस्यास्य तु सर्गस्य गुप्त्यर्थं स महाद्युतिः ।
मुखबाहूरुपज्जानां पृथक् कर्माण्यकल्पयत् ॥ ८७ ॥
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा ।
दानं प्रतिग्रहं चैव ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥ ८८ ॥
प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च ।
विषयेष्वप्रसक्तिश्च क्षत्रियस्य समासतः ॥ ८९ ॥
पशूनां रक्षणं दानमिज्याध्ययनमेव च ।
वणिक्पथं कुसीदं च वैश्यस्य कृषिमेव च ॥ ९० ॥
एकमेव तु शूद्रस्य प्रभुः कर्म समादिशत् ।
एतेषामेव वर्णानां शुश्रूषामनसूयया ॥ ९१ ॥
कृतयुग में तप मुख्य धर्म है, त्रेतायुग में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ
और कलियुग में एक दान देना मुख्य धर्म है । परमात्मा ने, संसार
की रक्षा के लिये ब्राह्मण आदि चारों वर्णों के काम, अलग अलग
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१८ .मनुस्मृति ।
नियत किये। पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना,
दान लेना, ये छः कर्म ब्राह्मणों के हैं। प्रजा की रक्षा करना, दान
देना, यज्ञ करना, पढ़ना और इन्द्रियों के विषयों में न फँसना, ये
क्षत्रियों के कर्म हैं। पशुओं को पालना, दान देना, यज्ञ करना,
पढ़ना, व्यापार करना, व्याज लेना और खेती करना, ये सब काम
वैश्य के हैं। परमात्माने शूद्रों का एक ही काम बतलाया है-ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य की भक्ति से, सेवा करना ॥ ८८-९१ ॥
ऊर्ध्वं नाभेर्मेध्यतरः पुरुषः परिकीर्तितः ।
तस्मान्मेध्यतमं तस्य मुखमुक्तं स्वयम्भुवा ॥ ९२ ॥
उत्तमाङ्गोद्भवाज्ज्यैष्ठ्याद्ब्राह्मण्याश्चैव धारणात् ।
सर्वस्यैवास्य सर्गस्य धर्मतो ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ९३ ॥
पुरुष नाभि के ऊपर अतिपुनीत माना गया है । उससे भी उस
का मुख अतिपवित्र है । परमात्मा के मुखतुल्य होने से, चारों
वर्णों में बड़ा होने से, और वेद पढ़ाने से, ब्राह्मण सारे जगत्
का प्रभु है ॥ ९२-९३ ॥
तं हि स्वयम्भूः स्वादास्यात्तपस्तप्त्वादितोऽसृजत् ।
हव्यकव्याभिवाह्याय सर्वस्यास्य च गुप्तये ॥ ९४ ॥
यस्यास्येन सदाश्नन्ति हव्यानि त्रिदिवौकसः ।
कव्यानि चैव पितरः किम्भूतमधिकं ततः ॥ ९५ ॥
भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः ।
बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥ ९६ ॥
ब्राह्मणेषु च विद्वांसो विद्वत्सु कृतबुद्धयः ।
कृतबुद्धिषु कर्त्तारः कर्तृषु ब्रह्मवेदिनः ॥ ९७ ॥
उत्पत्तिरेव विप्रस्य मूर्त्तिर्धर्मस्य शाश्वती ।
स हि धर्मार्थमुत्पन्नो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ९८ ॥