मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पांचवां अध्याय । १६५
पांचवां अध्याय । १६५
प्राणस्यान्नमिदं सर्वं प्रजापतिरकल्पयत् ।
स्थावरं जङ्गमं चैव सर्वं प्राणस्य भोजनम् ॥ २८ ॥
चराणामन्नमचरा दंष्ट्रिणामप्यदंष्ट्रिणः ।
अहस्ताश्च सहस्तानां शूराणां चैव भीरवः ॥ २६ ॥
मांसभक्षण-व्यवस्था।
यज्ञ में वेदमन्त्रों से प्रोक्षण किया मांस खाना और ब्राह्मणों की
इच्छा से हुआ हो तो खाना। देवकार्य और पितृकार्य में, निमन्त्रण
होने पर या प्राण जाने का भय हो तो खाना उचित है । ब्रह्मा ने
इस जगत् के प्राण को अन्नरूप से बनाया है। इसलिए चराचर
जगत् सब प्राण का भोजन है। स्थावर, घास आदि जङ्गमों का
भोजन है, विना दाढ़वाले दाढ़वालों का भोजन है। विना हाथवाले,
हाथवालों का जैसे मनुष्यों का मछली भोजन है और मृग आदि
सिंहादि के भोजन हैं ॥ २७-२६ ॥
नात्तादुष्यत्यदन्नद्यान्प्राणिनोऽहन्यहन्यपि ।
धात्रैव सृष्टा ह्याद्याश्च प्राणिनोऽत्तार एव च ॥ ३० ॥
यज्ञाय जग्धिर्मांसस्येत्येष दैवो विधिः स्मृतः ।
अतोऽन्यथा प्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधिरुच्यते ॥ ३१ ॥
क्रीत्वा स्वयं वाप्युत्पाद्य परोपकृतमेव वा ।
देवान् पितॄंश्चार्चयित्वा खादन्मांसं न दोषभाक् ॥३२॥
नाद्यादविधिना मांसं विधिज्ञोऽनापदि द्विजः ।
जग्ध्वा ह्यविधिना मांसं प्रेत्य तैरद्यतेऽवशः ॥ ३३ ॥
न तादृशं भवत्येनो मृगहन्तुर्धनार्थिनः ।
यादृशं भवति प्रेत्य वृथा मांसानि खादतः ॥ ३४ ॥
१६६ मनुस्मृति ।
नियुक्तस्तु यथान्यायं यो मांसं नात्ति मानवः ।
स प्रेत्य पशुतां याति सम्भवानेकविंशतिम् ॥ ३५ ॥
असंस्कृतान्पशून्मन्त्रैर्नाद्याद्विप्रः कदाचन ।
मन्त्रैस्तु संस्कृतानद्याच्छाश्वतं विधिमास्थितः ॥ ३६ ॥
कुर्याद्घृतपशुं सङ्गे कुर्यात् पिष्टपशुं तथा ।
न त्वेव तु वृथा हन्तुं पशुमिच्छेत्कदाचन ॥ ३७ ॥
जो भक्षण के योग्य प्राणी हैं उनको प्रतिदिन खाने से, खाने
वाला दोषभागी नहीं होता । क्योंकि, भक्षण करने योग्य प्राणी
और उनके भक्षकों को, परमात्मा ने ही रचा है । यज्ञ के निमित्त
से मांसभक्षण दैवी विधि कहलाती है। लेकिन देवार्पण के बिना
मांस खाना राक्षसविधि कही जाती है । मोल लेकर, या आप
ही मारकर, या दूसरे ने लाकर दिया हो, ऐसे मांस को देवता
और पितरों को अर्पण करके खाने से दोष नहीं होता । आपत्ति-
काल न हो तो विधि को जाननेवाला द्विज कभी मांसभक्षण
अविधि से न करे—क्योंकि बिना विधि से जो मांसभक्षण करता
है, उसके मरने पर उसका मांस वे प्राणी खाते हैं । रोज़गार के
लिए जो पशु मारते हैं उनको वैसा पाप नहीं होता जैसा बिना
देवता और पितरों को चढ़ाये मांस खानेवाले को होता है। श्राद्ध
आदि में विधि से जो मांसभक्षण नहीं करता, वह मरके इक्कीस
वार पशुयोनि में जन्म लेता है। मन्त्रों से जिनका संस्कार नहीं
हुआ उन पशुओं को ब्राह्मण कभी न खावे । पर सनातन वेद
विधि के अनुसार संस्कार किया गया हो तो अवश्य खोवे । मांस
खाने ही की इच्छा हो तो घृत का पशु या मैदा का पशु बनाकर
विधि से मांस खावे । पर देव निमित्त के बिना पशु मारने की
इच्छा कभी न करना चाहिए ॥ ३०-३७ ॥
यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो ह मारणम् ।
वृथा पशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि ॥ ३८ ॥