मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवां अध्याय । ३२६
नवां अध्याय । ३२६
नान्यस्मिन् विधवा नारी नियोक्तव्या द्विजातिभिः ।
अन्यस्मिन् हि नियुञ्जाना धर्मं हन्युः सनातनम् ॥ ६४॥
नोद्वाहिकेषु मन्त्रेषु नियोगः कीर्त्यते क्वचित् ।
न विवाहविधावुक्तं विधवावेदनं पुनः ॥ ६५ ॥
अयं द्विजैर्हि विद्वद्भिः पशुधर्मो विगर्हितः ।
मनुष्याणामपि प्रोक्तो वेने राज्यं प्रशासति ॥ ६६ ॥
स महीमखिलां भुञ्जन् राजर्षिप्रवरः पुरा।
वर्णानां संकरं चक्रे कामोपहतचेतनः ॥ ६७ ॥
ततः प्रभृति यो मोहात्प्रमीतपतिकां स्त्रियम् ।
नियोजयत्यपत्यार्थं तं विगर्हन्ति साधवः ॥ ६८ ॥
यस्या म्रियेत कन्याया वाचा सत्ये कृते पतिः ।
तामनेन विधानेन निजो विन्देत देवरः ॥ ६६ ॥
यदि नियोग करनेवाले दोनों शास्त्रविधि को छोड़कर मन-
माना व्यवहार करें तो पतित होते हैं। और पुत्रवधू गुरुपत्नी के साथ
गमन करनेवाले माने जाते हैं। द्विजातियों को विधवा स्त्री का
नियोग दूसरे वर्णवाले से न करना चाहिए । अन्य जाति से नि-
योग की हुई स्त्रियाँ धर्म का नाश कर डालती हैं। विवाहसम्बन्धी
मन्त्रों में कहीं नियोग नहीं कहा है और विधवा का पुनर्विवाह भी
कहीं नहीं कहा है । यह नियोगविधि * राजा वेन के राज्य में
- नियोग और विधवा-विवाह वेद-स्मृति से विरुद्ध है । इसी लिए वेन के
समय में प्रचलित नियोग का मनुने खण्डन किया है । दूसरी स्मृतियों से दश-पांच
श्लोक विधवाविवाह के विषय में नवीन मतवाले प्रमाण देते हैं और ऋग्वेद
या अथर्व के दो चार मन्त्र भी प्रमाण में उपस्थित करते हैं। पर वे सब दूसरे
अभिप्राय के हैं, कोई भी विधवाविवाह वा नियोग को सिद्ध नहीं करते ।
‘उदीर्ध्वनार्यभिजीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एहि । हस्तग्रामस्य दिधिषोस्तवेदं पत्युर्जनित्वमभि संवभूथ ।’ ऋग्वेद, १० । १८ । ८ ।
‘उतयत्पतयो दशस्त्रियाः पूर्वे अब्राह्मणाः । ब्रह्मा चेद्धस्तमग्रहीत्स एव पतिरेकधा।’ अथर्व०
५।४।१७ इत्यादि मन्त्रों से सब कुछ सिद्ध करते हैं। परन्तु इनका प्रसङ्ग, सम्बन्ध, अर्थ
दूसरा ही है । श्रीभीमसेनकृत ‘विधवा-विवाहमीमांसा’ में विस्तार से लिखा गया है ।
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३३० मनुस्मृतिः।
प्रचलित हुई थी। परन्तु विद्वान् द्विजों ने इस पशुधर्म की निंदा
की है। राजर्षि वेन जब सारी पृथिवी पर राज्य करता था, उस
समय कामवासना से नष्टबुद्धि होकर वर्णसङ्करता फैलाई थी।
तब से जो पुरुष विधवा स्त्री का सन्तान के लिए नियोग करता
है उसकी साधु पुरुष निंदा करते हैं। जिस कन्या का पति
वाग्दान करने बाद मर जाय तो उसको उस का देवर इस भांति
स्वीकार करे ॥ ६३-६९ ॥
यथाविध्यधिगम्यैनां शुक्लवस्त्रां शुचिव्रताम् ।
मिथो भजेताप्रसवात्सकृत्सकृदृतावृतौ ॥ ७० ॥
न दत्त्वा कस्यचित्कन्यां पुनर्दद्याद् विचक्षणः ।
दत्त्वा पुनः प्रयच्छन् हि प्राप्नोति पुरुषानृतम् ॥ ७१ ॥
विधिवत्प्रतिगृह्यापि त्यजेत्कन्यां विगर्हिताम् ।
व्याधितां विप्रदुष्टां वा छद्मना चोपपादिताम् ॥ ७२ ॥
यस्तु दोषवतीं कन्यामनाख्यायोपपादयेत् ।
तस्य तद्वितथं कुर्यात् कन्यादातुर्दुरात्मनः ॥ ७३ ॥
विधाय वृत्तिं भार्यायाः प्रवसेत् कार्यवान्नरः ।
अवृत्तिकर्षिता हि स्त्री प्रदुष्येत् स्थितिमत्यपि ॥ ७४ ॥
विधाय प्रोषिते वृत्तिं जीवेन्नियममास्थिता ।
प्रोषिते त्वविधायैव जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः ॥ ७५ ॥
प्रोषितो धर्मकामार्थं प्रतीक्ष्योऽष्टौ नरः समाः ।
विद्यार्थं षट् यशोऽर्थं वा कामार्थं त्रींस्तु वत्सरान् ॥ ७
संवत्सरं प्रतीक्षेत द्विषन्तीं योषितं पतिः ।
ऊर्ध्वं संवत्सरात्त्वेनां दायं हृत्वा न संवसेत् ॥ ७७ ॥