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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय। २४६

आठवां अध्याय। २४६
का लोप न करना चाहिए । मृत्युसमय में भी एकमात्र मित्र
धर्म ही पीछे चलता है और सब शरीर के साथ ही नाश को
प्राप्त होजाता है ॥ १५-१७ ॥
पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति ।
पादः सभासदः सर्वान् पादो राजानमृच्छति ॥ १८ ॥
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः ।
एनो गच्छति कर्तारं निन्दार्हो यत्र निन्यते ॥ १९ ॥
जातिमात्रोपजीवी वा कामं स्याद् ब्राह्मणब्रुवः ।
धर्मप्रवक्ता नृपतेर्न तु शूद्रः कथञ्चन ॥ २० ॥
यस्य शूद्रस्तु कुरुते राज्ञो धर्मविवेचनम् ।
तस्य सीदति तद्राष्ट्रं पङ्के गौरिव पश्यतः ॥ २१ ॥
यद्राष्ट्रं शूद्रभूयिष्ठं नास्तिकाक्रान्तमद्विजम् ।
विनश्यत्याशु तत्कृत्स्नं दुर्भिक्षव्याधिपीडितम् ॥ २२॥
न्याय करते समय उसका एक चौथाई अधर्म अन्याय करने
वाले को, एक चौथाई झूठे गवाह को, एक चौथाई सभासद् और
एक चौथाई राजा को अधर्म लगता है। जिस सभा में अन्यायी
पुरुष की ठीक ठीक निन्दा कीजाती है, वहां राजा और सभा-
सद् दोष से छूट जाते हैं। और उस अधर्मी को ही पाप लगता
है। जिसकी जातिमात्र से जीविका है कुछ विद्या, योग्यता से
नहीं वही चाहे न्यायकर्ता नियुक्त किया जाय, पर शूद्र को कभी
अधिकार न देवे । जिस राजा का न्यायाधीश शूद्र होता है
उसका राज्य कीचड़ में गौ की भांति फँसकर पीड़ा पाता है।
जिस राज्य में शूद्र और नास्तिक, अधिक हों, द्विज न हों वह
सम्पूर्ण राज्य दुर्भिक्ष और व्याधि से पीड़ित होकर शीघ्रही नष्ट
होजाता है ॥ १८-२२ ॥
३२

२५० मनुस्मृति ।
धर्मासनमधिष्ठाय संवीताङ्गः समाहितः ।
प्रणम्य लोकपालेभ्यः कार्यदर्शनमारभेत् ॥ २३ ॥
अर्थानर्थावुभौ बुद्ध्वा धर्माधर्मौ च केवलौ ।
वर्णक्रमेण सर्वाणि पश्येत्कार्याणि कार्यिणाम् ॥ २४ ॥
बाह्यैर्विभावयेल्लिङ्गैर्भावमन्तर्गतं नृणाम् ।
स्वरवर्णेङ्गिताकारैश्चक्षुषा चेष्टितेन च ॥ २५ ॥
आकारैरिङ्गितैर्गत्या चेष्टया भाषितेन च ।
नेत्रवक्त्रविकारैश्च गृह्यतेऽन्तर्गतं मनः ॥ २६ ॥
राजा न्यायासन पर वस्त्र वगैरह पहन कर बैठे और आठ
लोकपालों को प्रणाम करके सावधानी से विचारकार्य का आरम्भ
करे। प्रजा की लाभ और हानि को, धर्म और अधर्म को सोचकर
वादियों के दावों को ब्राह्मणादि वर्ण के क्रम से देखना शुरू
करे। मनुष्यों के बाहरी लक्षण, स्वर (आवाज़) शरीर का वर्ण,
नीचे ऊपर देखना, आकार रोमांच होना आदि, आँख, हाथ, पैर
की चेष्टा वगैरह से भीतरी हाल पहचानना। आकार, नीचे ऊपर
देखना, गति, चेष्टा, बोली, आँख, मुँह के विकार से मन का भाव
जाना जाता है ॥ २३-२६ ॥
बालदायादिकं रिक्थं तावद्राजानुपालयेत् ।
यावत्स स्यात्समावृत्तो यावच्चातीतशैशवः ॥ २७ ॥
वशाऽपुत्रासु चैव स्याद्रक्षणं निष्कुलासु च ।
पतिव्रतासु च स्त्रीषु विधवास्वातुरासु च ॥ २८ ॥
जीवन्तीनां तु तासां ये तद्धरेयुः स्वबान्धवाः ।
ताञ्छिष्याच्चौरदण्डेन धार्मिकः पृथिवीपतिः ॥ २६ ॥