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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 649 में से

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पृष्ठ 60

५८ मनुस्मृति ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥ '
कठोपनिषत्.
इस यजुर्वेदीय-कठशाखीय-श्रुति से ज्ञेय है । और
सविशेष परमेश्वर ( ब्रह्म )-
' अथ य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्य-
श्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात् सर्व एव सुवर्णः, तस्य यथा
कप्यासपुण्डरीकमेवमक्षिणी, तस्योदिति नाम, स एष सर्वेभ्यः
पाप्मभ्य उदितः, उदेति ह वै सर्वेभ्यः पाप्मभ्यो य एवं वेद,
इत्यधिदैवतम् । '
इस सामवेदीय-छान्दोग्य श्रुति से विज्ञेय है ।
विश्वरूपधारी श्रीनारायण ने नारद मुनि से कहा है कि-
' माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद ।
सर्वभूतगुणैर्युक्तं, नैवं मां ज्ञातुमर्हसि ॥ '
शारीरकभाष्य.
अर्थात् हे नारद ! मैंने यह माया रची है जिससे तुम
मेरे को सविशेष देख रहे हो; नहीं तो तुम मेरे को ऐसा नहीं
जान सकते ।
इसी अभिप्राय से ' अन्तस्तद्धर्मापदेशात् १ । १ । २० '
इस ब्रह्मसूत्र के ' कल्पतरु ' में यह वचन लिखा है-
' निर्विशेषं परं ब्रह्म साक्षात्कर्तुमनीश्वराः ।
ये मन्दास्तेऽनुकम्पन्ते सविशेषनिरूपणैः ॥
वशीकृते मनस्येषां सगुणब्रह्मशीलनात् ।
तदेवाविर्भवेत् साक्षादपेतोपाधिकल्पनम् ॥ '