मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
तीसरा अध्याय। ८१
तीसरा अध्याय। ८१
पितृभ्यो बलिशेषं तु सर्व दक्षिणतो हरेत् ॥ ९१ ॥
शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम् ।
वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद्भुवि ॥ ९२ ॥
विश्वेदेव के निमित्त आकाश में बलि देवे। दिन देवता और रात्रि
देवता को बलि देवे। घर के सब से ऊंचे भाग में 'सर्वात्मभूतये
नमः' कहकर बलि देवे और बलिशेष को 'पितृभ्यो नमः' कहकर
दक्षिण दिशा में पितरों को बलि देना चाहिए। कुत्ता, पतित,
चाण्डाल, कोढ़ी, पापी, रोगी, कौआ, कीड़ों को धीरे से ज़मीन में
ही बलि देना चाहिए ॥ ९०-९२ ॥
एवं यः सर्वभूतानि ब्राह्मणो नित्यमर्चति ।
स गच्छति परं स्थानं तेजोमूर्त्तिः पथर्जुना ॥ ९३ ॥
कृत्वैतद्बलिकर्मैवमतिथिं पूर्वमाशयेत् ।
भिक्षां च भिक्षवे दद्याद्विधिवद्ब्रह्मचारिणे ॥ ९४ ॥
यत्पुण्यफलमाप्नोति गां दत्त्वा विधिवद्गुरोः ।
तत्पुण्यफलमाप्नोति भिक्षां दत्त्वा द्विजो गृही ॥ ९५ ॥
भिक्षामप्युदपात्रं वा सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ।
वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणायोपपादयेत् ॥ ९६ ॥
नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् ।
भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद्दत्तानि दातृभिः ॥ ९७ ॥
विद्यातपः समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु ।
निस्तारयति दुर्गाच्च महतश्चैव किल्विषात् ॥ ९८ ॥
इस प्रकार जो गृहस्थ ब्राह्मण बलि देकर प्राणियों का सत्कार
करता है, वह तेजस्वी परमधाम को प्राप्त होता है। बलिकर्म के
बाद अतिथिसत्कार करे फिर संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा
दान करना चाहिए। गुरु को गोदान करने से जो पुण्य फल
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मिलता है, वही संन्यासी और ब्रह्मचारी को भिक्षा देने से मिलता
है। वेदविशारद ब्राह्मण का आदर करके भिक्षा वा एक जलपात्र
देवे। वेदपाठरहित, मूर्ख ब्राह्मण को अज्ञान से जो भोजन दान
दियाजाता है वह सब निष्फल होजाता है । विद्या और तपसे युक्त
ब्राह्मणों के मुख रूप अग्नि में जो हवन-भोजन कराता है, वह महा-
दुःख और पापों से उबारता है ॥ ६३-६८ ॥
संप्राप्ताय त्वतिथये प्रदद्यादासनोदके ।
अन्नं चैव यथाशक्ति सत्कृत्य विधिपूर्वकम् ॥ ६६ ॥
अतिथि-सत्कार ।
गृहस्थ को आये हुए अतिथि का आसन, जल और अन्नसे यथा-
शक्ति सत्कार करना चाहिए ॥ ६६ ॥
शिलानप्युञ्छतो नित्यं पञ्चाग्नीनपि जुह्वतः ।
सर्वं सुकृतमादत्ते ब्राह्मणोऽनर्चितो वसन् ॥ १०० ॥
तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता ।
एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १०१ ॥
एकरात्रं तु निवसंन्नतिथिर्ब्राह्मणः स्मृतः ।
अनित्यं हि स्थितो यस्मात्तस्मादतिथिरुच्यते ॥ १०२ ॥
नैकग्रामीणमतिथिं विप्रं साङ्गतिकं तथा ।
उपस्थितं गृहे विद्याद्भार्या यत्राग्नयोऽपि वा ॥ १०३ ॥
जो उञ्छवृत्ति 'खेतों से अन्न बीनकर निर्वाह' करता हो और
पञ्चाग्नि में हवन करता हो वह भी यदि अतिथि का सत्कार न
करे तो अतिथि उसके सब पुण्य को ले लेता है । अन्न न हो तोभी
तृणासन, भूमि, जल और मीठी बात ये सत्पुरुषों के यहां सदा
रहते हैं। जो ब्राह्मण एक रात्रि गृहस्थ के यहां निवास करता है
उसको अतिथि कहते हैं । वह नित्य नहीं रहता इसी लिए अतिथि
कहाजाता है। एक गांव में रहनेवाला, हँसी, मज़ाक करके साथ