मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
नवां अध्याय। ३१६
नवां अध्याय। ३१६
स्त्री स्वतन्त्र होने योग्य नहीं है। समय पर कन्यादान न करने से
पिता, ऋतुकाल में सहवास न करने से पति और पिता के बाद
माता की रक्षा न करने से पुत्र निन्दा का पात्र होता है। साधारण
कुसंगों से भी स्त्रियों को बचावे क्योंकि अरक्षित स्त्रियां दोनों
कुलों को दुःख देती हैं। इसप्रकार संपूर्ण वर्णों का धर्म है। दुर्बल
पति भी अपनी स्त्रियों की रक्षा का उपाय करते हैं ॥ १-६ ॥
स्वां प्रसूतिं चरित्रं च कुलमात्मानमेव च ।
स्वं च धर्मं प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति ॥ ७ ॥
पतिर्भार्या संप्रविश्य गर्भो भूत्वेह जायते ।
जायायास्तद्धि जायात्वं यदस्यां जायते पुनः ॥ ८ ॥
यादृशं भजते हि स्त्री सुतं सूते तथाविधम् ।
तस्मात्प्रजाविशुद्ध्यर्थं स्त्रियं रक्षेत् प्रयत्नतः ॥ ९ ॥
न कश्चिद्योषितः शक्तः प्रसह्य परिरक्षितुम् ।
एतैरुपाययोगैस्तु शक्यास्ताः परिरक्षितुम् ॥ १० ॥
स्त्रियों की रक्षा करने से पुरुष अपनी संतान को वर्णसङ्कर
होने से बचाता है, अपने चरित्र को निर्दोष रखता है, अपने कुल
की मर्यादा बढ़ाता है, अपनी और अपने धर्म की रक्षा करता
है। पति स्त्री में वीर्यरूप से प्रवेश करके जगत् में पुत्ररूप से जन्म
लेता है। अपनी स्त्री में फिर जन्मता है इसीसे स्त्री जाया कह-
लाती है। जैसे पुरुष को स्त्री सेवन करती है उसी भांति का पुत्र
पैदा करती है। इसलिए प्रजा की पवित्रता के लिए स्त्री की रक्षा
यत्नपूर्वक करे। कोई बलात्कार से स्त्रियों की रक्षा नहीं कर स-
कता, किन्तु इन उपायों से उनकी रक्षा कर सकता है ॥ ७-१० ॥
अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयेत् ।
शौचे धर्मेऽन्नपक्त्यां च पारिणाह्यस्य वैक्षणे ॥ ११ ॥
३२० मनुस्मृति ।
अरक्षिता गृहे रुद्धाः पुरुषैराप्तकारिभिः ।
आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः ॥ १२ ॥
पानं दुर्जनसंसर्गः पत्या च विरहोऽटनम् ।
स्वप्नोऽन्यगेहवासश्च नारीसंदूषणानि षट् ॥ १३ ॥
नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थितिः ।
सुरूपं वा विरूपं वा पुमानित्येव भुञ्जते ॥ १४ ॥
धन-संग्रह, खर्च, सफ़ाई, पतिसेवा, धर्म, रसोई और घरके
सँभाल में स्त्री को लगावै । विश्वास पात्र मनुष्यों से घरमें रखवाली
कराने से रक्षित नहीं होती किन्तु जो अपनी रक्षा आपही करे
वेही सुरक्षित होसकती हैं । मद्यपान, दुर्जनसंग, पति से वियोग,
घूमना, सोना, दूसरे के घर रहना ये छः भांति के स्त्रियों में दूषण
होते हैं । व्यभिचारिणी स्त्रियां रूप और अवस्था को नहीं देखतीं,
केवल पुरुष देखकर ही मोहित होजाती हैं, वह कुरूप हो या
सुरूप ॥ ११-१४ ॥
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च नैस्नेह्याच्च स्वभावतः ।
रक्षिता यत्नतोऽपीह भर्तृष्वेता विकुर्वते ॥ १५ ॥
एवं स्वभावं ज्ञात्वाऽऽसां प्रजापतिनिसर्गजम् ।
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषो रक्षणं प्रति ॥ १६ ॥
शय्यासनमलङ्कारं कामं क्रोधमनार्जवम् ।
द्रोहभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत् ॥ १७ ॥
नास्ति स्त्रीणां क्रिया मन्त्रैरिति धर्मो व्यवस्थितः ।
निरिन्द्रिया ह्यमन्त्राश्च स्त्रियोऽनृतमिति स्थितिः॥१८॥
व्यभिचारिणी होनेसे, चित्तकी चञ्चलतासे, स्वभावसे रूखापनसे,