मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
हिन्दीभाषानुवाद-टिप्पण-विषयसूची-श्लोकसूची
॥ श्रीः ॥
मनुस्मृति
अर्थात्
मानवधर्मशास्त्र।
࿘
हिन्दीभाषानुवाद-टिप्पण-विषयसूची-श्लोकसूची
और विस्तृत-भूमिका-सहित।
अनुवादक,
पण्डित गिरिजाप्रसाद द्विवेदी
हेड पण्डित,
'नवलकिशोरविद्यालय' गोमती तट,
लखनऊ
बाबू मनोहरलाल भार्गव, बी. ए., सुपरिंटेंडेंट के प्रबन्ध से
मुंशी नवलकिशोर सी. आई. ई., के छापेख़ाने में छपी
सन् १६१७ ई०
मनुस्मृति की
भूमिका ।
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद्भद्रं तन्न आसुव ॥ (यजु० अ० ३० मं० ३)
धर्म ।
धर्मशास्त्र के अत्यावश्यक कुछ विषय संक्षेप से लिखते
हैं जिनके न जानने से वर्तमान काल में बड़ी भारी हानि है।
ये विषय प्रायः धर्मसंहिता नामक निबन्ध ग्रन्थ से लिये
गये हैं ।
यहां धर्म शब्द, पङ्कजशब्द के समान योग रूढ़ है । गिरते
हुए मनुष्य का जो आधार होकर धारण करता है वह धर्म
है। यह धर्म शब्द का अक्षरार्थ कहलाता है । और अनिष्ट से
संबन्ध न रखनेवाले इष्टफल का साधन धर्म है । यह धर्मशब्द
का प्रसिद्ध अर्थ कहलाता है । भगवान् कणाद मुनि ने
वैशेषिकदर्शन में 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः'
यह धर्म का लक्षण कहा है । अर्थात् जिस से लौकिक और
पारलौकिक सुख प्राप्त हो वह धर्म है। और भगवान् जैमिनि
मुनि ने मीमांसादर्शन में 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' यह
क्रियासापेक्ष धर्म का लक्षण कहा है । अर्थ-जिस वाक्य के
सुनने से कर्तव्य तथा अकर्तव्य कर्म का ज्ञान होवे उस (वाक्य)
का चोदना, प्रेरणा, उपदेश और विधि नाम है; जिससे
१ यह ग्रन्थ पूज्यपाद श्री ६ दुर्गाप्रसाद द्विवेदीजी, प्रधानाध्यापक, संस्कृत कालेज-
जयपुर, का बनाया हुआ है । इसमें धर्मशास्त्र के गूढ़तत्त्वों का विशिष्ठ विवेचन है ।
जिसकी पहिचान होवे वह उसका लक्षण कहलाता है;
चोदना-लक्षण है जिस का ऐसा अर्थ=कल्याण के साधन
अग्निहोत्र आदि कर्म, धर्म है। यहां पर आचार्यों ने उक्त सूत्र
की यों भी योजना की है-
‘धर्मः चोदनालक्षणः अर्थः ’=धर्म, विधिरूप; कल्याण-
साधन है। इस प्रकार सूत्र की योजना करने से धर्म में
प्रमाण का लाभ और दो नियम सिद्ध होते हैं । पहला
नियम—‘यो धर्मः तत्र चोदनैव प्रमाणम् ’ अर्थात् जो धर्म है।
उसमें विधिवाक्यही प्रमाण है । इससे ‘अग्नि, धूम आदि
पदार्थों के समान धर्म के साधन में प्रत्यक्ष आदि प्रमाण समर्थ
नहीं हैं’ यह बात सिद्ध हुई। पहले नियम के फल को दिख-
लानेवाला प्रत्यक्ष सूत्र है-‘सत्संप्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां
बुद्धिजन्म तत्प्रत्यक्षमनिमित्तं विद्यमानोपलम्भनत्वात् ’
( मी० द० १ । १ । ४ ) अर्थ-परीक्षक की चक्षु आदि
इन्द्रियों का वर्तमान विषयों के साथ संयोगरूप संवन्ध होने पर
जो ज्ञान उत्पन्न होता है वह प्रत्यक्ष कहाजाता है । प्रत्यक्ष
(प्रमाण) धर्म (प्रमेय) के ज्ञान करने में कारण नहीं है,
क्योंकि वर्तमान वस्तुओं ही की इन्द्रियों से उपलब्धि होती है।
अर्थात् ज्ञानकाल में वर्तमान न रहने के कारण धर्म इन्द्रिय
द्वारा प्रत्यक्ष होने के योग्य नहीं है। इसी अभिप्राय को लेकर
चातुर्वर्ण्यशिक्षा में कहा है-
‘प्रत्यक्षयोगं सहते न धर्म-
स्ततोऽनुमापि प्रतिरुद्धवीर्या ।
१ यह ग्रन्थत्न भी पूज्यपाद श्री ६ द्विवेदीजी कृत है !
• भूमिका । ३
मानं तु लिङ्-लोट्-मुखभावनया
सा चोदनैवात्र वरीवृतीति ॥ '
दूसरा नियम— ' यो धर्मः तत्र चोदना प्रमाणमेव ' जो धर्म
है उसमें विधिवाक्य प्रमाण ही है। इससे 'वेदों के रहस्य
को न जानकर उसपर जो जो दोष ठहराये हैं वा ठहराये जाते
हैं वे सब व्यर्थ हैं ' यह बात सिद्ध हुई। इस दूसरे नियम के
फल को दिखलानेवाला औत्पत्तिकसूत्र है—' औत्पत्तिकस्तु
शब्दस्यार्थेन संबन्धस्तस्य ज्ञानमुपदेशोऽव्यतिरेकश्चार्थे-
ऽनुपलब्धे तत्प्रमाणं बादरायणस्यानपेक्षत्वात् '
( मी० द० १ । १ । ५) अर्थ-पूर्वपक्ष-पुरुष जिस शब्दमें जिस
अर्थ का संकेत करता है उस शब्द से उस अर्थ का ज्ञान होता है,
इस कारण शब्द और अर्थ का जो संकेतरूप संबन्ध है उसके
पुरुषकृत होने से जैसा शब्द का प्रत्यक्ष ज्ञान, सीप में रजत-
ज्ञान को; रस्सी में सर्पज्ञान को; तथा मृगतृष्णा में जलज्ञान को
उत्पन्न करने से विपर्यय (मिथ्याभाव ) को प्राप्त होता है
ऐसा शब्द में भी विपर्ययज्ञान संभव है। इस कारण विधिवाक्य
धर्म के विषय में प्रमाण नहीं हो सकते । सिद्धान्त-शब्द का
अर्थ के साथ शक्तिरूपसंबन्ध नित्यही है; किन्तु कृतक नहीं
है। वह धर्म का कारण है। अतएव प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से
अप्राप्त अर्थ में विधिवाक्य व्यभिचार को नहीं प्राप्त होता। इस
कारण प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों की अपेक्षा न रखने से (वह)
विधिवाक्य धर्म में बादरायण आचार्य को प्रमाण है। अर्थात्
जैसा ' पर्वतो वह्निमान् '=पर्वत अग्निवाला है, इत्यादि वाक्य
इन्द्रियदोषयुक्त पुरुष के (जिस को धुंध आदि कारण से
पर्वत में मिथ्या अग्नि का भान है) कहे हुए अर्थ (अग्नि)
४ मनुस्मृति ।
से व्यभिचरित होते हैं, इसलिये प्रमाण के विषय में प्रत्यक्ष
की आवश्यकता नहीं रखते हैं; ऐसा 'अग्निहोत्रं जुहुयात्
स्वर्गकामः' = सुख चाहनेवाला अग्निहोत्रद्वारा स्वर्ग की भावना
करै, इत्यादि वैदिक उपदेश-वाक्य पुरुषकृत न होने से दोषरहित,
किसी काल में भी अपने अर्थ से व्यभिचरित नहीं होते ।
अतएव उनकी सत्यता सिद्ध करने के लिये प्रत्यक्ष आदि
प्रमाणों की आवश्यकता नहीं है।
भगवान् मनु ने यह धर्म का लक्षण कहा है-
'विद्वद्भिः सेवितः सद्भिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत ॥' (२ । १)
और धर्मशब्द से यहां छः प्रकार का धर्म लिया गया
है। (१) वर्णधर्म (२) आश्रमधर्म (३) वर्णाश्रमधर्म
(४) गुणधर्म = शास्त्रोक्त अभिषेक आदि गुणों से युक्त राजा का
प्रजापालन (५) निमित्तधर्म = प्रायश्चित्त और (६) साधारण
धर्म = धृति आदि दश (मनु० ६ अ० ६२ श्लो०) अथवा
संक्षेप से अहिंसा आदि पांच (मनु० १० अ० ६३ श्लो०)
और सामवेदीय छान्दोग्योपनिषद् में धर्म के यज्ञ,
अध्ययन, दान ये तीन स्कन्ध कहे हैं।
'त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति।'
धर्म के बारे में मनुस्मृति में यह कहा है-
'यः कश्चित्कस्यचिद्धर्मो मनुना परिकीर्तितः ।
स सर्वोऽभिहितो वेदे सर्वज्ञानमयो हि सः ॥'
(२ अ० ७ श्लो०)
भूमिका। ५
' धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मानो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
( ८ अ० १५ श्लो०-)
धर्मके स्थान ।
भगवान् याज्ञवल्क्य ने कहा है—
' पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः ।
वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥ '
पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र और शिक्षा, कल्प,
व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष और ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद, अथर्ववेद ये चौदह; विद्या तथा धर्मके स्थान हैं।
वेद्आदि प्रमाणग्रन्थों का विचार ।
वेद ।
मन्त्र और ब्राह्मण यह दोनों भाग मिलकर वेद कहलाता
है। आपस्तम्ब-मुनि ने यही वेद का लक्षण किया है- 'मन्त्र-
ब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् ।' और यही अभिप्राय अन्यान्य-
मुनियों का भी है। वही कर्मसम्बन्धी अर्थ के बोधक मन्त्र
और बाकी के ब्राह्मण कहलाते हैं, यह बात जैमिनि मुनिने
मीमांसादर्शन में कही है- ' तच्चोदकेषु मन्त्राख्या ।
(शेषे ब्राह्मणशब्दः ।' उसका आशय आचार्यों ने यह कहा
है कि वेदमें जितने भाग का मन्त्र नाम से व्यवहार होता आया
है वह मन्त्रभाग और बाकी ब्राह्मणभाग है ।
वेदके भेद ।
वेद चार प्रकार का है- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और
अथर्ववेद । पहले तीन वेदों का नाम ऋक् आदि तीन प्रकार