मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 59, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ५७
ऐसा लिखा है वहां पर तीन ब्राह्मण लेना योग्य है । भगवान्
मनु ने भी कहा है कि-
‘ द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत् सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ ’
यद्यपि यह श्राद्ध का विषय है तो भी आतिदेशिक विधि
के अनुसार कर्मान्तर में भी इसका अनुरोध करना अनुचित
न होगा, यदि कोई प्रामाणिक विशेष वाक्य न उपस्थित हो।
यदि गृह्यस्मृति के अनुसार ब्राह्मण संख्या न्यून प्रतीत हो
तो इस यज्ञपार्श्व के वाक्य का आलम्बन करो-
‘ गर्भाधानादिसंस्कारे ब्राह्मणान् भोजयेद् दश ।
शतं विवाहसंस्कारे पञ्चाशन्मेखलाविधौ ॥
आवसथ्ये त्रयस्त्रिंशच्छ्रौताधाने शतात्परम् ।
अष्टकं भोजयेद् भक्त्या तत्तत्संस्कारसिद्धये ॥
सहस्रं भोजयेत् सोमे ब्राह्मणानां शतं पशौ ।
चातुर्मास्ये तु चत्वारि शतानि पञ्च सुराग्रहे ॥
अयुतं वाजपेये च ह्यश्वमेधे चतुर्गुणम् ।
आग्रयणे प्रायश्चित्ते ब्राह्मणान् दश पञ्च च ॥’
२ । उपासनाकाण्ड । सर्वोपास्य-परमेश्वर, निर्विशेष
और सविशेष अर्थात् निर्गुण (अवाङ्मनसगोचर), सगुण
( वाङ्मनसगोचर ) श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास में अनेक
प्रकार से वर्णित है ।
निर्विशेष-परमेश्वर ( ब्रह्म )-
‘ अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।