मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
आठवां अध्याय । २५१
आठवां अध्याय । २५१
प्रणष्टस्वामिकं रिक्थं राजा त्र्यब्दं निधापयेत् ।
अर्वाक्त्र्यब्दाद्धरेत्स्वामी परेण नृपतिर्हरेत् ॥ ३० ॥
बालक के दायभाग का द्रव्य, तब तक राजा के अधीन (कोर्ट
आफ़ वार्डस) में रहे जब तक वह समावर्त्तनवाला अर्थात्
पढ़ लिखकर चतुर न हो और बालिग न होजाय । बन्ध्या स्त्री,
अपुत्रा, सपिण्डरहित, पतिव्रता, विधवा और बहुत दिन की
रोगी स्त्री का भी धन राजा की रक्षा में रहे । इन जीती हुई स्त्रियों
का धन भाई बन्धु हर लेना चाहें तो उनको चोरदण्ड के मुवाफ़िक़
दण्ड देवे । जिसका स्वामी बे पता हो उस लावारिस धन को
राजा तीन साल तक रखे, उसके भीतर आ जाय तो ले जाय,
नहीं तो वह राजा का ही होजाता है ॥ २७-३० ॥
ममेदमिति यो ब्रूयात्सोऽनुयोज्यो यथाविधि ।
संवाद्य रूपसंख्यादीन् स्वामी तद्द्रव्यमर्हति ॥ ३१ ॥
अवेदयमानो नष्टस्य देशं कालं च तत्त्वतः ।
वर्णं रूपं प्रमाणं च तत्समं दण्डमर्हति ॥ ३२ ॥
आददीतार्थषड्भागं प्रणष्टाधिगतान्नृपः ।
दशमं द्वादशं वापि सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ ३३ ॥
प्रणाष्टाधिगतं द्रव्यं तिष्ठेद्युक्तैरधिष्ठितम् ।
यांस्तत्र चौरान् गृह्णीयात्तान् राजेभेन घातयेत् ॥ ३४ ॥
ममायमिति यो ब्रूयान्निधिं सत्येन मानवः ।
तस्याददीत षड्भागं राजा द्वादशमेव वा ॥ ३५ ॥
अनृतं तु वदन् दण्ड्यः स्ववित्तस्यांशमष्टमम् ।
तस्यैव वा निधानस्य संख्यायाल्पीयसीं कलाम् ॥ ३६ ॥
२५२ मनुस्मृति ।
तीन वर्ष के भीतर उसका मालिक आकर कहै कि-यह मेरा
धन है, तब राजा उससे ठीक तौर से पूंछे कि धन कैसा है?
कितना है? जो वह रूप, रंग, संख्या बतला दे तो उसको दे
देना चाहिए। अगर खोई वस्तु का पता ठीक न बता सके तो
उस पर उतना ही धन जुर्माना करे। कोई खोई वस्तु उसके मा-
लिक को देते समय उसकी रक्षा के कारण उस धन का छठ्ठां,
दशवां या बारहवां भाग राजा ले लेवे। किसीकी कोई चीज़
गुम गई हो और मिले तो राजा उसे पहरे में रक्खे और वहां से
चुरानेवाला पकड़ा जाय तो उसको हाथी से मरवा देवे। जो
पुरुष सच्चाई से कहे कि 'यह निधि मेरा है' उसके निधि* से
छठ्ठां वां बारहवां भाग राजा ग्रहण कर लेवे। यदि वह दूसरे का
अपना लेने की इच्छा करे तो उस निधि का आठवां भाग अथवा
निधि गिनकर उसका कुछ भाग दण्ड देवे ॥ ३१-३६ ॥
विद्वांस्तु ब्राह्मणो दृष्ट्वा पूर्वोपनिहितं निधिम् ।
अशेषतोऽप्याददीत सर्वस्याधिपतिर्हि सः ॥ ३७ ॥
यं तु पश्येन्निधिं राजा पुराणं निहितं क्षितौ ।
तस्माद् द्विजेभ्यो दत्त्वार्धमर्धं कोशे प्रवेशयेत् ॥ ३८ ॥
यदि विद्वान् ब्राह्मण पुराने ज़माने की निधि पाजाय तो वह
सब ले लेवै। क्योंकि ब्राह्मण सबका स्वामी हैं और जो भूमि में
पुरानी निधि राजा पावे तो उसका आधा द्विजों को बाँट दे
और आधा अपने खज़ाने में रखवा देवे ॥ ३७-३८ ॥
निधीनां तु पुराणानां धातूनामेव च क्षितौ ।
अर्धभाग्रक्षणाद्राजा भूमेरधिपतिर्हि सः ॥ ३९ ॥
दातव्यं सर्ववर्णेभ्यो राज्ञा चौरैर्हृतं धनम् ।
राजा तदुपयुञ्जानश्चौरस्याप्नोति किल्बिषम् ॥ ४० ॥
- भूमि में गड़ा हुआ पुराना धन 'निधि' कहलाता है।